आखिर कब तक उदासीन रहेगी सरकार...
| -Priyanka Maheshwari - Aug 26 2019 2:27PM

हर साल बारिश होती है, हर साल बाढ़ आती है, लोग मरते हैं, बेघर होते हैं, जान माल का नुकसान होता है। इन सब घटनाओं पर सरकार द्वारा विचार मंथन भी होता है लेकिन इनके कारणों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। सरकार की उदासीन व्यवस्था इन आपदाओं को बढ़ावा दे रही है ये साफ जाहिर होता है। मुंबई में भारी बारिश के कारण पूरे शहर में पानी भर जाना, बिल्डिंगों का गिरना और लोगों की मौत होना। बरोड़ा में पानी का भरना नदी का उफान चढ़ना, लोगों के घरों में मगरमच्छ का आ जाना।

अहमदाबाद में बारिश के कारण जलाशयों का छलक जाना, रास्ते, पुल, हाईवे सब जगह पानी ही पानी। नर्मदा, ओरसंग, विश्वमित्री, तापी नदी में उफान का आना। सौराष्ट्र, कच्छ, मध्य दक्षिण गुजरात, वडोदरा में पानी भराव के कारण रास्ते नदियों का स्वरूप ले रहे हैं। हाईवे, पुल बंद, ट्रैफिक जाम। पंजाब, हरियाणा, जम्मू प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त है। उत्तराखंड भी अछूता नहीं है, भूस्खलन से जानमाल की हानि पुल और रास्ते गायब हो गए हैं, सड़कें टूट गई हैं।

मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोवा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा राज्य में भी भारी बारिश के कारण बहुत जान माल की हानि हुई है। साथ ही लोगों का जनजीवन भी अस्त व्यस्त हो गया है। शायद ही देश का कोई हिस्सा बचा हो जहां बारिश ने अपना कहर ना बरपाया हो। जब हर वर्ष इतनी बारिश और इतनी हानि होती है तो सरकार इतनी उदासीन क्यों? हम दोष ग्लोबल वॉर्मिंग को देते हैं लेकिन इनके पीछे के कारणों को हम नहीं देखना चाहते हैं। सरकार मंथन करती रहती है, आंकड़े पेश करती है और मरने वालों के लिए मुआवजा की राशि घोषित करती है, राहत बचाव कार्य होते हैं लेकिन इनसे निपटने के उपायों की कोई बात नहीं करना चाहता।

हम जो प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं उस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. खेतों को पाटकर एयरपोर्ट बनाया जा रहा है। नदियों की गंदगी को रोका नहीं जा रहा। कोई सख्त कानून की व्यवस्था नहीं है। नदियों के बचाव के लिए हम आंदोलन की बात सुनते तो हैं लेकिन ध्यान नहीं देते। मेधा पाटकर एक अरसे से नर्मदा बचाओ आंदोलन कर रही है, क्यों उनकी आवाज नहीं सुनी जाती? उनकी आवाज को अनदेखा क्यों किया जा रहा है? सरकार और हम खुद कब तक चुप और उदासीन रहेंगे इसके प्रति?  सरकारी नीतियां और व्यवस्थाओं की उदासीनता कब तक? क्यों हम इन आंदोलनकारियों का मजाक उड़ाते  उड़ाते हैं?

स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल, ऑफिस बंद पड़े हैं। जीवन अव्यवस्थित हो गया है, करोड़ों की संपत्ति का नुकसान, जानवर बहे जा रहे हैं, बच्चे बह जा रहे हैं। केरल मे पिछले साल 400 से ज्यादा लोगों के मरने की रिकॉर्ड लिया गया। 25000 करोड़ से ज्यादा की नुकसानी हुई। इस साल भी केरल का बुरा हाल है 14 जिलों में स्कूल-कॉलेज बंद करवा दिए गए 23000 लोगों को बचाया गया। इसी तरह और भी बहुत से शहरों के आंकड़ें हैं। रेड अलर्ट जारी कर दिए जाते हैं लेकिन यह स्थिति क्यों उत्पन्न हो रही है इस पर गंभीर चिंतन नहीं किया जाता? विकास का यह मॉडल बहुत खतरनाक है।



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