समृध्द भाषाओं के बीच छलांग को बेताब ‘हिन्दी’
| -Rituparna Dave - Sep 14 2019 2:36PM

“भाषा का आर्थिक स्थिति से सीधा संबंध होता है. जो समृध्द देश हैं उनकी भाषा के पंख भी बड़े तेज होते हैं. इसलिए दुनिया के सारे लोग उसे सीखना चाहते हैं. इसकी वजह कारोबार में आसानी भी है. भाषा की ताकत इसी से समझी जा सकती है कि अगर कोई विदेशी आपकी भाषा में केवल नमस्ते ही कर ले तो उससे तत्काल गहरा जुड़ाव हो जाता है. निश्चित रूप से यह ताकत सिर्फ भाषा में ही होती है”. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह बात आज से 4 वर्ष पूर्व उज्बेकिस्तान की यात्रा के दौरान भारतीय मूल के विद्यार्थियों और निवासियों को संबोधित करते हुए कही थी. उनका इशारा साफ-साफ हिन्दी भाषा को लेकर था. लेकिन क्या आजादी के 73 बरसों के बाद भी हम भारत में हिन्दी को वह सम्मान दिला पाए हैं जिसकी वह हकदार है? इसका उत्तर न में है क्योंकि जहाँ अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है वहीं हिन्दी बोलने में हीनता महसूस करते हैं. यह भी नहीं पता कि कब हम इस मानसिकता को पूरी तरह से दूर कर पाने में सफल होंगे? 

दुनिया भर में तमाम दार्शनिक, लेखक और विचारक भी मानते हैं कि जहाँ भाषाएं अलग हैं वहाँ देश भी बंटा होता है. प्रसिध्द जर्मन विचारक और दार्शनिक योहान गॉटलिप फिटे ने भी भाषा की साझा कड़ियों पर काफी जोर दिया ओर माना कि जहां भाषाएं अलग होती है, तब वहां राष्ट्र भी धड़ेबाजी का शिकार होता है। उनका मानना है कि “एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को प्रकृति भी कई अदृश्य कड़ियों के जरिये एक दूसरे से बांध देती है, किसी भी मानवीय कला के आने से पहले ही वे एक दूसरे को समझते भी हैं और अधिक से अधिक स्पष्ट तरीके से समझा भी देते हैं।” जाने माने भाषा विज्ञानी एडवर्ड सैपिर भी मानते हैं कि “एक जैसी भाषा उन लोगों के बीच सामाजिक एकजुटता का खास संकेत बन जाती है, जो उस भाषा को बोलते हैं।” इस तरह भाषा देश को जोड़ने के साथ ही सांस्कृतिक भाईचारा को विकसित करने में मदद करती है।

यह विडंबना नहीं तो और क्या है जो दुनिया भर में तीसरे क्रम पर सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिन्दी को वो सम्मान या रुतबा आज तक नहीं मिल पाया है जिसकी वो काफी पहले से हकदार है. दुनिया में कितनी भाषाएं हैं इसके भी बड़े रोचक आंकड़े हैं और इन्हीं में छुपा है हिन्दी का वजन. यूनाइटेड नेशन्स के अनुसार दुनिया में बोली जाने वाली भाषाओं की अनुमानित संख्या 6809 है. इसमें नब्बे फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 1 लाख से भी कम है. वहीं लगभग 150 से 200 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 लाख से ज्यादा लोग बोलते हैं जबकि अंग्रेजी को लेकर एक भ्रम रहता है कि दुनिया की सबसे अधिक बोले जानी वाली भाषा है? ऐसा नहीं है, वास्तव में चीन की मेंडरिन जिसे आम तौर पर मंदारिन भी कहते हैं अकेली ऐसी भाषा है जो दुनिया में सबसे ज्यादा 1.12 अरब लोगों द्वारा बोली जाती है. इसके बाद दूसरे क्रम पर स्पेनिश भाषा तथा तीसरे क्रम पर अंग्रेजी आती है.

यदि इसे एक भाषाई विविधता के रुप में देखें और उर्दू मिली हिंदी बोलने वालों को छोड़ दें तो मेंडरिन, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद हिंदी दुनिया की चैथी सबसे बोली जाने वाली पहली भाषा है लेकिन उर्दू जुबान के साथ बोली जानी वाली उर्दू मिली हिन्दी को भी जोड़ लें देखें तो पाते हैं कि यह दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। 2011 की जनगणना के भाषा संबंधी आंकड़े बताते हैं कि हिंदी भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है. 2001 से 2011 के बीच के दस सालों में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या में करीब 10 करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई जो 25.19 प्रतिशत है. भारत में सबसे ज्यादा करीब 52 से 55 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं यानी हिन्दी को मातृ भाषा के रूप बोलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. अभी दुनिया में हिन्दी के तीसरे और चैथे क्रम को लेकर भी भ्रम बना रहता है जो 2021 की जनगणना के बाद निश्चित रूप से छंट जाएगा और हिन्दी दुनिया में तीसरे क्रम पर बोली जाने वाली भाषा के रूप में अपनी धमक दर्ज कराएगी. 

यह भी फक्र की बात है कि हमारे संविधान में 22 आधिकारिक भाषाएं शामिल हैं जिसमें 130 करोड़ की आबादी वाले भारत में हिन्दी भाषियों का प्रतिशत 41 है जो अगली जनगणना आंकड़ों में 50 या ऊपर भी जा सकता है. यही हिन्दी के वजूद को समझने के लिए काफी है. ऐसे में हिन्दी को देश की संपर्क भाषा बनाए जाने में हर्ज कैसा?  इस बात पर गर्व भी है कि हिन्दी भारत में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा होने के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, अमेरिका, जर्मनी, सिंगापुर में भी बोली जाती है वहीं न्यूजीलैण्ड में हिन्दी वहां की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली चौथी भाषा है. यह सब हिन्दी का दबदबा बताने को काफी है. रोमांचित करने वाला सच है यह भी है कि दुनिया में भारत अकेला देश है जहां सबसे ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. विविधताओं व विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के देश भारत में 461 भाषाएं बोली जाती हैं. उसमें भी हिन्दी का प्रतिशत लगभग 50 है. जिस पर गर्व के बजाए हम स्वतंत्रता हासिल करने के 73 वर्षों के बाद भी हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पाए हैं. 

हिन्दी को लेकर पूरे देश में एक आम राय बनानी होगी भले ही वह कोई भी राज्य हो. विशेषकर दक्षिण में क्योंकि वहां जब तब हिन्दी को लेकर उठती नफरत की आवाज से देश बंटा हुआ सा दिखने लगता है. इसे बहुत ही तरीके से दुनिया भर के उदाहरणों के जरिए दूर करना होगा ताकि हिन्दी देश की आधिकारिक भाषा बने. इसको लेकर क्षेत्रीय भाषाओं की गुटबाजी से हटकर सोचना होगा. यह भी समझना और समझाना होगा कि कई दूसरे देशों के उदाहरण सामने हैं जिनकी अपनी क्षेत्रीय भाषाएं तो अलग-अलग हैं लेकिन देश की एक ही भाषा है. दूर की बात क्या पड़ोसी देश चीन का ही उदाहरण काफी है।तेजी से विकसित हो रही दुनिया में राज्य, भाषा और बोली को लेकर धड़ेबाजी के नफे, नुकसान को बारीकी से देखना होगा और अंग्रेजी को तरक्की का जरिया मानने की जरूरत का भ्रम भी तोड़ना होगा.

इसी से हिन्दी के लिए ईमानदार पहल हो पाएगी वरना हिन्दी दिवस कैलेण्डर में पड़ने वाली एक तारीख से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएगा. साथ ही हिन्दी के नाम पर अभी के जैसे अंग्रेजी में ही खूब परिपत्र जारी होंगे, विचार विमर्श होगा और काफी कुछ लिखा और बोला जाता रहेगा जिसके नतीजे भी पहले से ही मालूम होते हैं. फिर भी हिन्दी के लिए हिन्दी में ईमानदारी से कुछ कहा और किया जाए यही उस हिन्दी के लिए बड़ी बात होगी जो बिना ईमानदार कोशिशों के बोलने और समझने के लिहाज से दुनिया की तीसरी और चौथी भाषा के बीच डटी हुई है. लगता नहीं कि थोड़ी सी ईमानदार कोशिश इससे अव्वल मुकाम पर भी पहुँचा सकती है. शायद हिन्दी को भी इसी दिन का इंतजार है और देखना है यह इंतजार कब पूरा होता है!



Browse By Tags



Other News