सफलता हेतु कथनी और करनी में समानता आवश्यक
| Dr. Ravindra Arjariya - Sep 17 2019 12:24PM

समाज में सुव्यवस्था कायम रखने के लिए अनुशासनात्मक तंत्र की महती आवश्यकता होती है। ऐसी व्यवस्था के लिए स यता के बाद से प्रयास किये जाते रहे। कभी कबीलों के कायदे, तो कभी रियासतों के कानून। कभी राज्यों के संविधान तो कभी गणराज्य के स्वरूप की परिकल्पना का मूर्तरूप। भारत गणराज्य में भी विभिन्य राज्यों की अधिकार सीमा निर्धारित करते हुए केन्द्र और राज्यों के दायित्वों और कर्तव्यों को रेखांकित किया गया है। बडे ढांचे को स हालने से लेकर उसके विकास की संभावनायें, छोटे राज्यों के सापेक्ष काफी कम होती है। यही कारण है कि देश में छोटे-छोटे राज्यों का गठन किया गया। स्वाधीनता के बाद विंध्य प्रदेश के रूप में स्थापित रहने वाले इस क्षेत्र कों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमाओं में विभाजित कर दिया गया और इसी के साथ बुंदेलखण्ड की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का महात्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

तभी से इस भू भाग को गरीबी, लाचारी, पिछडापन, अभाव जैसी स्थितियों से दो-दो हाथ करना पड रहे हैं। अगर यूं कहे कि देश में गण का तंत्र स्थापित होने के कुछ समय बाद ही विंध्य प्रदेश के नाम से गणराज्य के राजनैतिक मानचित्र पर स्थापित बुंदेलखण्ड को भी कश्मीर की तरह विभक्त करके समस्याओं के सुसुप्त ज्वालामुखी पर बैठा दिया गया। अन्तर केवल इतना रहा कि कश्मीर की समस्या दो देशों से लेकर वहां के अतिविशिष्ठ अधिकारों के विकराल रूप में है वही बुंदेलखण्ड की स्थिति दो राज्यों के नियम-कानूनों के दायरे में है।  यहां की समस्याओं को चुनावी काल में समाधान देने की घोषणा वाले लालीपाप के रूप में हमेशा और हर पार्टी व्दारा दिया जाता रहा है। समाधान की कौन कहे, सभी राजनैतिक दलों और स्वार्थपरिता में लिप्त प्रभावशाली लोगों ने इस क्षेत्र को बंजर, अनुपयोगी और संभावनारहित क्षेत्र के रूप में प्रचारित करके इंवेस्टरर्स की नजरों में भी अछूत साबित कर दिया।

चौपालों की चर्चाओं में तो स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में यहां पर जवाहर लाल नेहरू की कार का झंडा एक खास रियासत में प्रवेश के दौरान उतरवा लिया था, जिसका खामियाजा आज तक यहां के लोगों को भुगतना पड रहा है। ऐसा ही कुछ कश्मीर समस्या के लिए तुष्टीकरण की व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं को भी उत्तरदायी ठहराने वाले कहते हैं। कारण चाहे जो भी रहे हों परन्तु निर्वाचन काल में मंचों की घोषणायें आज तक मूर्त रूप नहीं ले सकीं। भाजपा का छोटे राज्यों का पक्षधर होना, उमाभारती सहित विभिन्न कद्दावर नेताओं का बुंदेलखण्ड को पृथक राज्य के रूप में स्थापित करने की घोषणा करना, कांग्रेस का बुंदेलखण्ड प्रेम का प्रदर्शन, राहुल गांधी का बुंदेलखण्ड की समीक्षा हेतु गरीब के घर ठहरना और फिर राज्य बनना में सहयोग करने की बात कहना, बसपा व्दारा उत्तरप्रदेश में शासन के दौरान बुंदेलखण्ड राज्य की वकालत करना, सपा का इस क्षेत्र विशेष को महात्व देने जैसे कारक भी बरसाती मेंढक ही साबित हुए। एक समय ऐसा था जब उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और केन्द्र में भाजपा सरकारें थीं, परन्तु बुंदेलखण्ड राज्य के लिए प्रयास न किये जाने थे और न ही किये गये। विचार चल ही रहा था कि तभी हमारे सहयोगी ने चै बर में आकर सूचित किया कि बुंदेलखण्ड इंसाफ सेना के संयोजक और उत्तरप्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री बादशाह सिंह मिलने आये हैं। हम अपने को रोक न सके।

कई दशक बीत गये पुराने संबंधों की पुनरावृत्ति हुए। जैसे ही हम आमने सामने पहुंचे। उन्होंने बांहें फैैला दी। अपनत्व का पर्याय, भावनाओं का ज्वार और अतीत की स्मृतियां एक साथ छलक उठीं। गले मिलते ही मौन भाषा में अनुभूतियों ने कुशलक्षेम पूछ भी लिया और बता भी दिया। हमने उन्हें अपने मन में चल रहे विचारों से अवगत कराया। बुंदेलखण्ड क्षेत्र के विकास से लेकर पृथक राज्य तक के लिए उन्होंने अपने जीवन का एक बडा भाग समर्पित कर दिया है। राजनैतिक परिवेश को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्र विशेष का आम आदमी जब तक उठकर खडा नहीं हो जाता, तब तक परिणामों की कसौटी पर प्रयासों को तौलना संभव नहीं होता। बुंदेलखण्ड इंसाफ सेना धरती से जुडकर काम कर रही है। लोगों के साथ मिलकर नयी ऊर्जा जगाने का काम कर रही है। गांव की चौपालों से लेकर शहरों के चौराहों तक जागरूकता कार्यक्रम चला रही है। भावनात्मक संप्रेषण की गति बढाई जा रही है।

उत्तरदायी लोगों के साथ निरंतर बैठकें की जा रहीं है। उनका व्या यान ल बा होते देख हमने उन्हें बीच में ही टोकते हुए बुंदेलखण्ड के समग्र विकास और राज्य निर्माण की संभावनाओं पर ही केन्द्रित रहने के लिए कहा। एक  रहस्यमयी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर फैल गई। वक्तव्य की अनावश्यक भूमिका पर पूर्णविराम लगाने की हमारी पुरानी आदत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब छत्तीसगढ, उत्तराखण्ड, झारखण्ड बन सकते हैं। तेलंगाना अस्तित्व में आ सकता है, तो फिर बुंदेलखण्ड क्यों नहीं। बुंदेलखण्ड मे ंराज्य को संचालित करने वाले संसाधनों का भण्डार है। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश दौनों राज्यों को बुंदेलखण्ड से सर्वाधिक आय हो रही है। उनके लिए यह क्षेत्र किसी कामधेनु से कम नहीं है। यही कारण है कि दौनों राज्य और केन्द्र इस क्षेत्र विशेष को संभावनाओं के बाद भी पृथक राज्य के रूप में स्थापित होने नहीं दे रहे है।

राज्यों की इस मंशा को हमारे बीच के जयचंद अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति हेतु समय-समय पर पुष्ट करते रहते हैं। हमने उनसे राज्य निर्माण के लक्ष्य भेदन के लिए बनाई गई रणनीति उजागर करने को कहा तो उन्होंने कहा कि सफलता हेतु कथनी और करनी में समानता आवश्यक है। राजनैतिक दलों ने अब क्षेत्रों के मुद्दों को गौढ करते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की ओर लोगों को आकर्षित कर रखा है। क्षेत्रीय विकास की कीमत पर राष्ट्रीय परिदृश्य संवारने का संकल्प लिया जा रहा है और हम किसी तिलिस्म में फंसी स्थिति से गुजर रहे हैं। पूरे देश का धन कश्मीर के विकास में झौकने के पहले बुंदेलखण्ड जैसे शान्त, सरल और अभावग्रस्त गूंगे क्षेत्रों की वास्तविकता से भी आंखे चार कर लेना चाहिए।

उनका स्वर भर्रा गया। भावनायें उमडने लगीं। आंखों में खारा पानी तैरने लगा। आखिर हो भी क्यों न, अपनी भूखी मां की सूनी आंखों का सामना करने वाला व्यक्ति, पडोसी की पुकार निश्चित ही बाद में ही सुनेगा। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। लग रहा था कि वो शायद अब स्वयं से संघर्ष कर रहे थे। कुछ समय बाद उन्होंने आंखें खोली। हमने टेबिल पर रखा पानी का गिलास उनकी ओर बढाया। एक ही सांस में उन्होंने पूरा गिलास खाली कर दिया। हमें अपने चल रहे विचारों को दिशा देने का पर्याप्त साधन मिल गया था। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। जय हिंद।



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