आस्था, अस्मिता और गौरवशाली अतीत का प्रतीक है 'शीतलनाथ' मन्दिर
| Rainbow News Network - Sep 17 2019 12:29PM

शीतलेश्वरम शीतलनाथः, वन्दे अहं भैरवं सदा। (मैं शीतलेश्वर भैरव शीतलनाथ की सदा-सर्वदा वंदना करता हूँ।) यह सूक्त 'नीलमनपुरण' का है जिसमें श्रीनगर/कश्मीर के प्रसिद्ध मंदिर शीतलनाथ की महिमा का वर्णन है। कश्मीरी पंडितों की आस्था, अस्मिता और गौरवशाली अतीत का प्रतीक है 'शीतलनाथ'। बचपन में मित्रों के साथ इस धार्मिक स्थल को देखने का कई बार सुअवसर मिला है मुझे।

1990 में कश्मीरी पंडितों के घाटी से निष्कासन के बाद देवभूमि कश्मीर के अधिकांश मन्दिर और धार्मिक स्थल जर्जर अवस्था में ही रहे। कुछेक की सुरक्षा का ज़िम्मा सरकार ने अवश्य लिया अन्यथा बाकी वीरान ही रहे।

मुझे यह जानकर अतीव हर्ष हुआ कि इस बार कश्मीरी पण्डितों के बलिदान-दिवस यानी 14 सितम्बर 2019 को जहां देश-विदेश में कश्मीरी पंडित समुदाय ने विस्थापन के दौरान शहीद हुए पण्डितों को जगह-जगह भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

वहां जम्मू कश्मीर बीजेपी के वरिष्ठ नेता और कश्मीर मामलों के जानकार एवं प्रवक्ता श्री अश्विनी चरंगुजी ने अपने सहयोगियों सहित कश्मीर जाकर शीतलनाथ मन्दिर में दिवंगत शहीदों को न केवल भावांजलि अर्पित की अपितु यह निर्णय लिया कि शहीद हुए कश्मीरी पंडितों के शीतलनाथ परिसर में भव्य स्मारक बनेंगे ताकि आने वाली पीढियां इन शहीदों के बलिबान को याद रखे।

यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि 'शीतलनाथ' का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है।सुना है शीतलनाथ के मंच से पंडित जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी, बलराज मधोक आदि जैसे राजनेताओं ने कश्मीरियों को संबोधित किया है। यों, शीतलनाथ हमेशा ही कश्मीर में पण्डितों की अभिव्यक्ति का सशक्त मंच और माध्यम रहा है।

-शिबन कृष्ण रैणा, अलवर राजस्थान



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