हाय महंगाई, तुझे मौत क्यूँ न आई..........
| - Reeta Vishwakarma - Sep 25 2019 5:39PM

मर्ज मारने के बजाय मरीज मारो और गरीबी हटाने के बजाय गरीब हटाओ.........रोटी उलटने के बजाय तवा ही उलट दो................यह सब सूत्र-वाक्य सरकार को बतान की जरूरत नहीं है अपितु इसी को मूलमंत्र मानकर देश की सरकारें चल रही हैं। आम जन से किया गया उनका वादा सर्वथा मिथ्या। वास्तविकता कहीं दूर-दूर तक भी दृष्टिगोचर नहीं होती। रोटी, कपड़ा और मकान ये तीनों मानव जीवन के लिए आवश्यक आवश्यकताएँ कही जाती हैं। परन्तु इस समय आक्सीजन यानि प्राणवायु और पेयजल से भी वंचित मानवों में जिन्दा रहने की ललक देखी जा रही है। मानव जो समस्याग्रस्त है, संघर्ष करता हुआ जीवन जी रहा है। संघर्ष किसी एक वस्तु की प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि हर उस चीज की प्राप्ति के लिए है जो जिन्दा रहने के लिए मायने रखता है। 

प्राणवायु (आक्सीजन)- प्रदूषण की वजह से प्राणवायु नहीं मिल पा रही है। इसका कारण बताया जाता है कि मानव स्वयं है। बढ़ती आबादी, जनसंख्या वृद्धि और स्वयं के आस-पास बिखरे कचरे, धुएँ से आच्छादित वातावरण आदि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। जब समूचा वायुमण्डल ही प्रदूषण की चपेट में है तब ऐसे में शुद्ध प्राणवायु कहाँ से मिल पायेगा.........। 

जल- विज्ञानियों के अनुसार मानव शरीर के लिए 70 प्रतिशत जल की आवश्यकता होती है। यह भी शुद्ध की जगह अशुद्ध व दूषित मिल रहा है। धनी वर्गीय लोग आर.ओ. सिस्टम से पानी शुद्ध करके उपयोग में ला रहे हैं और कथित रूप से स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। हो सकता है कि ऐसा ही हो, परन्तु बहुसंख्य मानव प्राणी साधारण जल का ही उपयोग कर रहे हैं। इनका स्वास्थ्य राम भरोसे ही कहा जाएगा। 

रोटी- यानि ठोस आहार..........जो मानव जीवन के लिए आवश्यक है। रोटी- एक ऐसा नाम जिसकी प्राप्ति के लिए हर मानव संघर्षरत है। निम्न, मध्यम और उच्च वर्ग के सभी लोग विभिन्न प्रकार से रोटी के लिए प्रयासरत रहते हैं। रोटी- क्या कुछ नहीं कराती। पहले जब यह सुना जाता था कि पापी पेट का सवाल है या पेट न होती तो भेंट न होती तो बड़ा अजीब लगता था, परन्तु समय के साथ धीरे-धीरे उक्त बातें सत्य और प्रासंगिक लगने लगी हैं। 

कपड़ा (वस्त्र)- आक्सीजन, जल और रोटी के उपरान्त मानव को तन ढकने के लिए वस्त्र की जरूरत होती है। यह वस्त्र कल कारखानों और मिलों में निर्मित होता है। इसकी प्राप्ति सबके लिए आसान नहीं है। यहाँ भी संघर्ष की आवश्यकता होती है। जिसकी जेब में नोट है उसके लिए वस्त्र प्राप्त करना कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु अर्थाभाव की स्थिति में तन ढकने के लिए कपड़े की व्यवस्था कर पाना काफी कठिन है। 

मकान- भरे पेट जिन्दा रहने वाले मानव को एक अदद मकान की भी आवश्यकता होती है। वही मकान जो पात्रता के अनुसार सरकारों द्वारा ग्रामीण और शहरी अंचलों में लोगों को दिये जा रहे हैं, जिसको लेकर सरोकारियों द्वारा धन उगाही की जा रही है। यानि कफन खसोटी............जी हाँ..........इसे यही कहा जाएगा, क्योंकि पात्र आर्थिक रूप से कमजोर होता है और उसके लिए मिलने वाले अनुदान में हिस्सा बांट करने वाले लोग अवश्य ही कफन खसोट कहे जाएँगे। 

प्रायः यह सुनने में आता है कि दाल महंगी, चावल महंगा, सब्जी महंगी.........इनकी बढ़ती कीमतों से जनता बेहाल.........। ऐसी खबरें शत-प्रतिशत सच होती हैं। इनका प्रकाशन व प्रसारण ऐसे लोग करते हैं जो स्वयं भुक्तभोगी होते हैं। जाके पाँव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई.................जी हाँ भौतिक सुख-सुविधा सम्पन्न लोग इस तरह की महंगाई की अनुभूति नहीं करते हैं और न ही उसका विरोध। आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग कभी-कभार जायका बदलने के लिए शहर के होटल, रेस्तराँ व ढाबों पर जाया करते थे। अब वह लोग भी बढ़ती कीमतों के चलते अब अपना रूख उधर नहीं कर रहे हैं। साथ ही सामान्य घरों की थाली भी काफी महंगी हो गई है। इसका कारण आटा, दाल से लेकर मसाला, सब्जी तक की बढ़ती कीमतें हैं। मण्डी मंें दाल की कीमत 100 रूपए तो सब्जियों की कीमत में कई गुना इजाफा। आलू, टमाटर, प्याज, मिर्च के दामों में भारी इजाफा होने से छोटा सा थैला भी भरने में सैकड़ों रूपए खर्च करने पड़ रहे हैं। 

फास्ट फूड की तरफ जोर-शोर से आकर्षित हुए ग्राहक भी अब उससे तौबा करने लगे हैं। स्पाइसी और फास्टफूड रेस्तराँओं में प्रवेश करने के पूर्व ग्राहक एक नहीं अनेकों बार सोचता है। अपने पॉकेट में रखी मनी का गुणा-गणित करता है। इस सबके पीछे बढ़ती महंगाई ही मुख्य कारण है। 

गाँव का किसान हो, या फिर शहर का व्यवसाई सभी महंगाई की मार से दबे हुए कराह रहे हैं। सरकारों की नीतियों को कोष रहे हैं। यहाँ तक कि लाखो रूपए प्रतिमाह वेतन पाने वाले सरकारी/गैर सरकारी मुलाजिम भी महंगाई की वजह से परेशान हैं। बच्चों का निजी स्कूलों में भारी फीस दे पाना दिक्कत तलब हो गया है। ऑनलाइन व्यवस्था हो जाने से ये लोग मनचाही ऊपरी कमाई नहीं कर पा रहे हैं। हर तरफ महंगाई का रोना ही सुनाई पड़ रहा है। महंगाई से त्रस्त तो सभी हैं परन्तु बड़े लोगों का क्या कहना..........व्यवसाइयों का क्या कहना............सरकारी मुलाजिमों की बल्ले-बल्ले...........(अपवादों को छोड़कर)। 

लब्बो-लुआब यह कि हम फिर भी जिन्दा हैं...........। अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। मसलन- प्राणवायु के लिए तरस रहे हैं, आर.ओ. का पानी पी रहे हैं, किसी तरह रोटी की व्यवस्था कर रहे हैं, शरीर को ढकने के लिए कपड़ा पहन रहे हैं, रहने के लिए मकान की तलाश में हैं। कुल मिलाकर सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष जारी है। संघर्ष ही जीवन है जो जन्म से लेकर वर्तमान तक चल रहा है। आगे कब तक चलेगा.................इसे हम कौन होते हैं बता पाने वाले। 

जिस रोटी के कारण एक अच्छा-खासा, सीधा-सादा व्यक्ति अपराधी बन जाता है उसकी व्यवस्था हम अपने अन्दाज में कर रहे हैं। संघर्ष झेल रहे हैं। लूटने वाले लूट रहे हैं, तिजोरियाँ भर रहे हैं। मियाँ की जूती, मियाँ के सर कर रहे हैं। प्रतिरोध करने वालों को बन्दर घुड़की मिलती है। हंसी आती है उन नादानों पर जो यह नहीं जानते कि हम भी जागरूक हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारे ही धन का हर तरह से उपयोग करने वाले ये सरकारी अहलकार अपने को पाक-दामन न कहें। हमारी तरह वायु, जल, रोटी, कपड़ा और मकान तक ही रहें। ज्यादा सुख-सुविधा भोगी बनने पर जीवन और भी कष्टकारी साबित होगा। 

हम महंगी आलू, टमाटर, प्याज, लौकी, कोहड़ा, परवल आदि के साथ चावल, आटा की व्यवस्था करने में ही एड़ी का पसीना चोटी कर रहे हैं। इन सबकी प्राप्ति होने पर बड़ा सुकून मिलता है। सुकून की प्राप्ति करनी हो तो जीवन में संघर्ष करो, चाहे वह किसी से भी करना पड़े.............। फिलवक्त हम बढ़ती महंगाई से संघर्ष करते हुए जूझ-जूझ कर जीवन जी रहे हैं। आप लोग भी महंगाई से प्रभावित होंगे और मानव उपयोगी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से परेशान होंगे.........ऐसे में 1974 में प्रदर्शित भारतकुमार उर्फ मनोज कुमार द्वारा निर्मित व निर्देशित फिल्म रोटी, कपड़ा और कमान के इस सारगर्भित, सदाबहार व प्रासंगिक गाने पर नजर दौड़ाइये एक-एक शब्द वाक्य पर विचारिये..........लगेगा कि आप वर्तमान जी रहे हैं। ‘‘हाय महंगाई, महंगाई महंगाई, दुहाई है दुहाई, दुहाई है दुहाई, तू कहाँ से आई, तुझे मौत क्यूँ न आई..........हाय महंगाई, महंगाई महंगाई.............।’’

-रीता विश्वकर्मा



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