ऐसे थे ईश्वर चन्द विद्यासागर
| Rainbow News Network - Sep 27 2019 12:47PM

26 सितंबर 1820 को जिला मेदिनीपुर, बंगाल प्रेसीडेंसी में आज ही के दिन जन्मे ईश्वर चंद्र विद्यासागर 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षाविद, समाज सुधारक और लेखक थे। उनकी माता का नाम भगवती देवी और पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय था।

विद्यासागर जी के बचपन का नाम ईश्वर चंद्र बन्दोपाध्याय था।संस्कृत भाषा और दर्शन में ज्ञाता होने के चलते उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही कोलकाता के संस्कृत कॉलेज ने ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की थी। विद्यासागर जी ने महिलाओं व बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने में अहम योगदान दिया था। वह बाल विवाह के प्रखर आलोचक और विरोधी थे।

विद्यासागर जी ने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देते हुए उन्होने कलकत्ता सहित राष्ट्र के अनेक स्थानों पर बालिका विद्यालयों की स्थापना की। विद्यासागर जी ने बांग्ला भाषा को सरल एवं आधुनिक बनाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए।

इतना ही नहीं उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रयास किया। अधययन पूर्ण करने के पश्चात कलकत्ता के 'संस्कृत कॉलेज' में विद्यासागर जी को संस्कृत के प्राध्यापक  की नौकरी मिल गई और अरसे बाद उन्हें प्रिंसिपल बना दिया गया। महान समाज सुधारक विद्यासागर जी का कट्टरपंथियों ने काफी विरोध किया और जान पर खतरा भी आ गया।

विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे विद्यासागर जी। शास्त्रीय प्रमाणों और आख्यानों से उन्होंने विधवा विवाह को वैध प्रमाणित किया। अपने प्रयास से तत्कालीन सरकार को विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने पर मजबूर कर दिया और सन  1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ।

दृढ़ निश्चय धनी उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से ही करवाया था। समाज व्याप्त बुराइयों और कुप्रथाओं के अन्त के लिए लड़ाई लड़ने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर 29 जुलाई, 1891 को इस संसार से प्रस्थान कर गए।



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