भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रेरक प्रहरी थे भगत सिंह
| Rainbow News Network - Sep 27 2019 5:15PM

-भगत सिंह जी के विचार आज भी प्रासंगिक है

-भगत सिंह क्रांतिकारी देश भक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक थे

-क्रांतिकारी भगत सिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे

बिहार शरीफ संवाददाता संजय कुमार की रिपोर्ट-

बिहार शरीफ नालंदा स्थानीय मध्य विद्यालय ककड़िया में विद्यालय के चेतना सत्र में प्रधानाचार्य शिवेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने महान क्रांतिकारी, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, कलम के धनी, प्रखर पत्रकार, दार्शनिक, सरदार भगत सिंह की 112 वीं जयंती समारोह मनाई गई। विद्यालय के बच्चों व शिक्षकों ने उनकी तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित व माल्यार्पण कर नमन करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। बच्चों ने उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प भी लिया।

मौके पर बिहार अराजपत्रित प्रारम्भिक शिक्षक संघ के राज्य परिषद सदस्य राकेश बिहारी शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि शहीदे आज़म भगत सिंह सरदार किशन सिंह और विद्यावती कौर के घर बहुमुखी प्रतिभाशाली बालक का जन्म 27 सितम्बर 1907 को हुआ, यही बालक आगे चल कर शहीद-ए-आज़म भगत सिंह कहलाये। शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के परिवार में वतन परस्ती कूट-कूट कर भरी हुई थी। भगत सिंह का सपना जातिविहीन, शोषणविहीन समाज का निर्माण करना था। इस अन्याय पूर्ण व्यवस्था की जगह न्यायपूर्ण व बेहतर समाजवादी व्यवस्था के बिना हमारा देश सशक्त स्वावलंबी व समृद्ध नहीं बन सकता।

भगत सिंह क्रांतिकारी देश भक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार और महान पुरुष थे। उन्होंने 23 वर्ष की छोटी सी आयु में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का विषद अध्ययन किया था। हमें इनके बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए। जिन सपनों को सच करने के लिए वे लड़ रहे थे, वे सपने आज भी अधूरे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारी भगत सिंह की बहादुरी से घबराए अंग्रेजों ने फाँसी की नियत समय से 12 घटे पूर्व यानी 23 मार्च सन 1931 को सायंकाल 7.33 बजे पर लाहौर की जेल में फासी दे दी। लाहौर कास्पिरेसी केस में जेल के वार्डेन चरत सिंह और वकील प्राण नाथ मेहता के अनुसार कोठरी नंबर 14 में फासी के पूर्व भगत सिंह बंद पिंजरे में शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे।

शाहदरा लाहौर निवासी जल्लाद मसीह को दिए संदेश में साम्राज्यवाद मुर्दाबाद-इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे थे और भगत सिंह, शिवराम हरिनारायण राजगुरु तथा सुखदेव थापर तीनों मिलकर साथ-साथ गा रहे थे “कभी वह दिन भी आएगा, कि जब आजाद हम होंगे ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना आसमा होगा।” श्रीशर्मा ने कहा कि भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं बल्कि एक अध्ययनशील विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार और महान देशभक्त थे। उन्होंने 23 वर्ष की छोटी-सी आयु में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का विषद अध्ययन किया था।

हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ चिंतक और विचारक भगत सिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे। भगत सिंह अच्छे वक्ता, पाठक और लेखक भी थे। उन्होंने 'अकाली' और 'कीर्ति' दो अखबारों का संपादन भी किया। उनके रचनाओं में आत्मकथा 'दि डोर टू डेथ' (मौत के दरवाज़े पर), 'आइडियल ऑफ़़ सोशलिज्म' (समाजवाद का आदर्श), 'स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार' है। 

इस दौरान विद्यालय के शिक्षक सच्चिदानन्द प्रसाद ने कहा कि भगत सिंह जैसे देशभक्तों की बदौलत ही हमें आजादी मिली है। हमें उनके पदचिह्नों पर चलना चाहिए। भगत सिंह बचपन से ही आजादी के दीवाने थे।वे पंजाबी रहते हुए भी बाल और दाढी कटवा लिये ताकी अँग्रेजी सिपाही से बचते हुए इस मुल्क को आजादी दिलवा सके।उन्होंने कहा कि भगत सिंह अँग्रेजी संसद में बम नहीं फेंके बल्कि संसद भवन के एक कोना में फेंका ताकी बहरी और गूंगी सरकार सुन सके कि आजादी के लिये भारतीय सिपाही तैयार है। भगत सिंह हंसते-हंसते अपने देश की स्वतंत्रता के लिए स्वयं को न्योछावर कर दिया था। आज हम युवाओं को उनसे प्रेरणा लेते हुए उनके बलिदान को नहीं भूलना चाहिए तथा हमें राष्ट्र की अखंडता के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।  

इस अवसर पर बाल संसद के प्रधानमंत्री रौशन कुमार ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि राजनीति के कारण छात्र-छात्राओं का नेतृत्वकर्ता की राह बिगड़ता जा रहा है। जिससे उनमें भटकाव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। जो समाज के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। ऐसे में हमें राजनीति से ऊपर उठकर तथा वीर शहीदों के विचारों से प्रेरित होकर समाज निर्माण का कार्य करना चाहिए। वहीं भगत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने सकारात्मक व राष्ट्र हित की भावना के साथ छात्र हित के लिए कार्य करने पर बल दिया। आज हमारे बीच में नहीं है, परन्तु वे अब भी हर भारतीय के तन, मन, प्राण, दिल में मौजूद हैं तथा हर स्वतन्त्रता प्रेमी के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

इस मौके पर विद्यालय के शिक्षक अरविन्द कुमार शुक्ला, जितेन्द्र कुमार मेहता, अनुज कुमार, सुरेश कुमार, शुधांशु कुमार, शिक्षिका खुशबू कुमारी, बाल संसद के उपप्रधानमंत्री कुमकुम कुमारी, मेनका कुमारी, मोनी कुमारी, काजल कुमारी, नेहा कुमारी, रानी कुमारी, मुस्कान कुमारी, रिंकी कुमारी, आरती कुमारी, वर्षा कुमारी,शोभा कुमारी, रागनी कुमारी, माधुरी कुमारी, धर्मशीला कुमारी, अंजनी कुमारी, निगम कुमार, प्रताप कुमार, चंद्रमणि कुमार, गुड्डू कुमार, नवलेश कुमार, सौरभ कुमार, उजाला कुमार, गौतम कुमार गौरव कुमार आदि सहित सैकड़ों छात्र-छात्रा मौजूद थे।



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