दोषी हैं क्या हम..?
| -Priyanka Maheshwari - Oct 3 2019 11:52AM

सर्वत्र पानी ही पानी
फिर भी तरसते हम
दोषी हैं क्या हम..?
लांक्षन लगाते इस उस पर..
नहीं देखते धरती की पीड़ा हम...
भूखे अधनंगे लोग
छपरे की पन्नियों मे जीते जीवन..
कुछ बंजारे सा..
हैं ठंडी लकड़ियाँ जलने की चाह में...
ये भरा भरा सा पानी...
कब उतरेगा इस चाह में...
कैसे चूल्हा जले... कैसे बच्चे संभले...
हैं नून रोटी की चाह में...
छत से टपकता पानी
आंखों में लिए उलझन 
कब थमेगा.. इस राह में..



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