4 दिनों में 5 जजों का सुनवाई से अलग होना हैरानी भरा
| -Rituparna Dave - Oct 8 2019 1:04PM

यकीनन देश की न्यायिक व्यवस्था पर तनिक भी संदेह नहीं लेकिन पारदर्शिता को लेकर देशवासियों को जानने का हक तो बनता है कि आखिर वो कौन से कारण रहे जिससे एक-एक कर पाँच जजों ने खुद को चर्चित गौतम नवलखा के मामले से अलग कर लिया. कम से कम देश की सर्वोच्च अदालत के जजों का बिना कारण बताए अलग होना सबके लिए हैरानी से भरे होने के साथ अपने आप में एकदम अलग मामला बन गया है. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि देर सबेर इन कारणों का भी पता चलेगा. लेकिन सभी के मन में फिलाहाल तो यह सवाल कौंध ही रहा है कि आखिर लगातार 5 जज खुद को एक-एक कर क्यों अलग करते चले गए. 

यह भी सही है कि सार्वजनिक तौर पर जज कारण बताने को बाध्य नहीं हैं लेकिन कई ऐसे उदाहरण कहें या दृष्टांत वह भी सुप्रीम कोर्ट से ही निकल कर सामने हैं जिसमें वजहें बताई गईं. नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइन्टमेट्स कमीशन ऐक्ट को असंवैधानिक करार देने वाले जजमेंट में जस्टिस जोसेफ कुरियन ने जब ये लिखा था- "बतौर एक संस्था पारदर्शिता जिसकी पहचान है, उस सुप्रीम कोर्ट में बड़ी ज़िम्मेदारी निभा रहे जजों से इतनी उम्मीद तो की जाती है कि वे किसी केस की सुनवाई से अलग होने की वजह बताएं ताकि लोगों के दिमाग में गलतफहमी न पैदा हो." संभव है कि पारदर्शिता के लिहाज से कारण बताने की उम्मीद की गई हो. लेकिन किसी को इस तरह की उम्मीद न रही होगी कि एक दिन वही सुप्रीम कोर्ट गौतम नवलखा मामले में हैरान कर देने वाले सवालों से घिरेगा जिसमें जज बिना वजह बताए सुनवाई से अलग हो रहे हैं!

मजेदार बात यह है कि न तो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई न जस्टिस रवींद्र भट और न ही सुनवाई से अलग होने वाले सुप्रीम कोर्ट के ही बाकी तीन जजों ने ऐसा करने की कोई वजह बताई. किसी मामले में सुनवाई से किसी जज का अलग होना कोई नया और अनोखा मामला नहीं है. लेकिन इसकी न्यायिक परंपरा रही है जिसमें दलीलों के आधार पर अलग होने वाले अधिकतर जजों ने खुद ही आगे बढ़कर सफाई दी और वजह को वाजिब ठहराया. देश की तमाम अदालतों के कई वकीलों का मानना है कि मामले से खुद को अलग करते समय जजों को उसकी वजह बतानी चाहिए. स्वीकार्य वजहों में एक हितों का टकराव तो दूसरा अतीत में संबंधित जज बतौर वकील किसी पार्टी के लिए पैरवी कर चुके होते हैं या फिर जज को किसी से कोई सुरक्षा संबंधी खतरा हो. इसके अलावा मामले से किसी तरह का जुड़ाव या इससे जुड़ी किसी पार्टी से कोई संबंध हो तो यह भी वजह बन सकतीं हैं. लेकिन इस मामले में इसकी वजह नहीं मालूम है इसलिए यह थोड़ा जुदा बन गया है.

हालाकि न्यायिक मापदण्ड यानी ज्युडिशियल प्रोपराइटी के अपने कायदे पहले से ही हैं. जिसके चलते भी जजों से यह उम्मीद बनती है कि अगर वे पार्टी या मामले से किसी भी तरह से जुड़ें हैं या थे तो इसके बारे में पहले ही बता दें और अलग हो जाएं. ऐसा करने से न केवल इंसाफ होता है बल्कि होते हुए दिखता भी है. मुंबई हाई कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) पीबी सावंत का भी मानना है कि, "कोई जज किसी मामले से खुद ही अलग नहीं होते हैं, जब तक कि इसकी कोई वजह न हो. पहले भी कई बार एक या दो जजों ने सुनवाई से खुद को अलग किया है. इतना जरूर है कि पहली बार किसी मामले में पांच जजों ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया." इसकी क्या वजह हो सकती है, इस सवाल पर जस्टिस सावंत कहते हैं, "किसी केस से स्वयं को अलग करने के फैसले के पीछे कुछ निजी वजहें हो सकती हैं. संभव है कि जज इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक न करना चाहें. जजों की निजी ज़िंदगी में दखल का किसी को अधिकार भी नहीं है. संभव है कि इस मामले में जजों का पार्टी से, पहले से किसी तरह का कोई संपर्क रहा हो. यह भी संभव है कि कुछ लोगों ने उनसे संपर्क किया हो या अन्य वजहें भी हो सकती हैं जिसमें जज यह भी कह सकते हैं कि वो इसकी कोई वजह नहीं बताना चाहते ताकि अभियुक्त के साथ किसी तरह का पक्षपात हो."

हालांकि गौतम नवलखा को जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने   15 अक्टूबर तक गिरफ्तारी से अंतरिम राहत हुए महाराष्ट्र पुलिस को मामले से जुड़े जरूरी दस्तावेज पेश करने को कहा है। पुणे के भीमा कोरेगांव जिले में हिंसा भड़काने के लिए 31 दिसंबर 2017 को एल्गार परिषद पर आरोप लगा था। इसके बाद जनवरी 2018 में  इसी मामले में नवलखा और चार अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। बेशक भारतवासियों को अगर सबसे ज्यादा भरोसा किसी पर है तो वह है न्यायालय उसमें भी सुप्रीम कोर्ट तो न्याय का सबसे बड़ा और भरोसेमंद मंदिर है. ऐसे में जजों का लगातार अलग होना सबके लिए कौतूहल जरूर है. बहरहाल जब त्वरित न्याय और अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण को लेकर देश में बहुत तेजी से मंथन चल रहा है तो वहीं तकनीक के प्रयोगों से पेशियों में होने वाली देरी को भी टालने की मुहिम पर विचार तथा काम दोनों हो रहा है. ऐसे में बात फिर उठती है कि आखिर गौतम नवलखा मामले में जजों के पीछे हटने की वजह क्या है? चूंकि यह पहला मामला नहीं था जिसमें जजों ने खुद को अलग किया.

कई और उदाहरण हैं जैसे जस्टिस यूयू ललित भी राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई से इसलिए अलग हुए क्योंकि वो बाबरी मस्जिद ढांचा गिराने के आरोपी की ओर से वकील के रूप में कोर्ट में हाजिर हुए थे। वहीं पूर्व चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया ने खनन कंपनी वेदांता के एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की इच्छा जताई थी क्योंकि उनके पास कंपनी के कुछ शेयर थे. हालाकि वकीलों ने उन पर भरोसा जताते हुए कहा कि उनकी बेंच की सुनवाई पर कोई आपत्ति नहीं है. इसी तरह जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा भी खुद को नोवार्टिस मामले से अलग करने का भी उदाहरण है क्योंकि उन्होंने फार्मा पेटेंट्स के ग्रांट पर एक आर्टिकल लिखा था। यानी अलग होने वाले जजों ने कारण जरूर बताए थे.

लेकिन गौतम नलखा मामले में सबसे पहले 30 सितंबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने खुद को मामले से अलग किया. उनके बाद जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी, जस्टिस बीआर गवई की बेंच के सामने पेश हुआ तो सबसे पहले जस्टिस गवई सुनवाई से अलग हुए और शाम होते-होते बाकी दोनों जज भी अलग हो गए. जब तीसरी बार यह मामला जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रविंद्र भट्ट की बेंच के सामने पहुंचा तो इस बार जस्टिस रविंद्र भट्ट ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. इस तरह केवल 4 दिन में 5 जजों का मामले की सुनवाई से खुद को अलग करके कारण न बताना जजों का विशेषाधिकार जरूर है लेकिन साथ ही फिलाहाल एक अनसुलझी पहेली भी बन देश के न्यायिक इतिहास का पहला उदाहरण बन गया है जिसमें व्यवस्था पर किसी को संदेह नहीं लेकिन देश की सुप्रीम अदालत के जजों का कारण बताने से परहेज बड़ा अचरज बना हुआ है. यह एक ऐसा विषय बन गया है जो अभी नहीं तो कभी न कभी न्याय को लेकर बड़ी बहस का मुद्दा जरूर होगा.



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