ख्वाब
| Rainbow News Network - Oct 14 2019 3:50PM

झूठे ख्वाबो को कोस रहा
अपने मंसूबो को रोक रहा।

देखता रोज ही ख्वाब वो
अकेला कर रहा राज वो।

अंधेरे का है मालिक वो
ऊजाले का देखता ख्वाब वो।

बचपन से करता आया संघर्ष वो
आज भी कर रहा संघर्ष वो।

बूझते दीपक की लौ की भाँति बूझ रहा
जैसा आज है उसका वैसा कल रहा।

पंख अरमानो का लगाकर
उड़ना चाहा ऊँचाईयों पर

बादलों से टकराकर वो
फिर गिरा जमीन पर।

पंख उसके ढीले पड़े
अरमानो को विराने मिले।

ख्वाब टूटे तो पता चला
आज सारे अपनो में बेगाने हुए।



Browse By Tags



Other News