तीर्थ पुरोहित उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् को आत्मसात करें
| Rainbow News Network - Oct 22 2019 1:58PM

उत्तराखंड लोक धार्मिक संस्थाएं विधेयक 2019 को लेकर कवायद तेज

राज्य सरकार की पहल पर राज्य के मंदिरों के विकास के लिए चार धाम विकास परिषद द्वारा तैयार उत्तराखंड लोक धार्मिक संस्थाएं, प्रबंधन एवं विकास विधेयक 2019 पर आम सहमति बनाए जाने की कवायद तेज हो गई है। परिषद की कोशिश इस विधेयक को दिसम्बर 2020 तक अम्ल में लाने की योजना है। अब तक तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों से दो दौर की वार्ता हो चुकी है। हालांकि इसको लेकर तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है। विकास परिषद ने इस बीच कुछ कदम आगे बढते हुए विधेयक को राज्य विधि आयोग को सौंप दिया है, जिस पर दोनों पक्षों की ओर से अपना अपना पक्ष रखा गया। विधि आयोग में हुई बैठक में गंगोत्री मंदिर समिति, बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति का कोई भी प्रतिनिधि मौजूद न रहने व केदारनाथ व बदरीनाथ धाम के तीर्थ पुरोहितों के एक्ट के मौजूदा स्वरूप को लेकर किए गए सवालों से सरकार की राह आसान नहीं दिखाई दे रही है। विदित हो कि पूर्व में भी इस तरह की कोशिश अलग अलग कालखंड में की जा चुकी है।

उल्लेखनीय है कि राज्य की पहली निर्वाचित तिवारी सरकार ने वर्ष 2006 में को लेकर चार धाम विकास परिषद का गठन किया। इसका मुख्य उददेश्य राज्य स्थित चार धामों, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री के अलावा गढवाल व कुमाऊं के प्रमुख मंदिरों के विकास था। इसके अलावा तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सोच थी कि राज्य के पास विकास कार्यों के लिए सीमित बजट था। इसके लिए चार धाम विकास परिषद के जरिए केन्द्र से वित्तीय सहयोग लेना था। तिवारी ने बदरीनाथ के विधायक डा. अनूसुइया प्रसाद मैखुरी को विकास परिषद का पहला उपाध्यक्ष नामित किया। मगर मैखुरी तीर्थ पुरोहितों व हकहूकूक धारियों के बीच सहमति नहीं बना पाए। बाद के सालों में परिषद महज औपचारिक रही। 

2017 में उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापसी हुई। विगत वर्ष धर्म व अध्यात्म्य के क्षेत्र में कार्य करने वाले शिव प्रसाद मंमगाई को चार धाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई। कुछ माह पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने परिषद को चार धाम विषयक नियमावली बनाने के आदेश दिए। परिषद उपाध्यक्ष ने इससे संबधित पूर्व एक्ट एवं नियमावली और बैष्णों देवी श्राइन बोर्ड के अलावा विशेषज्ञों से सलाह मशविरे के बाद मुख्यमंत्री को सौंपा। इसके बाद 16 अक्तूबर को राज्य विधि आयोग के अध्यक्ष राजेश टंडन को अध्यादेश की प्रति सौंपी गई। इस मौके पर केदारनाथ व यमुनोत्री के तीर्थ पुरोहितों का प्रतिनिधि मंडल मौजूद रहा, लेकिन गंगोत्री मंदिर समिति का कोई भी सदस्य बैठक में नहीं था। इसके अलावा बदरीनाथ धाम के तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों की मौजूदगी भी अपेक्षाकृत बेहद कम रही। सबसे दिलचस्प बात यह है कि बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष को बैठक में आंमत्रित नहीं किया गया। बैठक में केदारनाथ व बदरीनाथ के तीर्थ पुरोहितों ने एक्ट को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज की। कहा कि यात्रा बैष्णों देवी की तर्ज पर नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही चार धाम यात्रा के अनुसार ही होनी चाहिए। तीर्थ पुरोहितों ने उत्तराखंड लोक धार्मिक संस्थाएं प्रबंधन एवं विकास विधेयक 2019 के कुछ बिन्दुओं पर असमति जताई। 

यमुनोत्री मंदिर समिति की ओर से समिति के उपाध्यक्ष व कोषाध्यक्ष बैठक में शामिल हुए थे। यमुनोत्री मंदिर के तीर्थ पुरोहित बेट एंड वांच की रणनीति अपनाएं हैं। दरअसल समिति का अध्यक्ष एसडीएम बडकोट होता है। अपरोक्ष रूप से मंदिर समिति में सरकार की दखल पहले से ही है। शायद यही कारण है कि नए अधिनियम को लेकर यमनोत्री मंदिर समिति ज्यादा मुखर नही दिखाई देती है।

क्या है उत्तराखंड लोक धार्मिक संस्थाएं प्रबंधन एवं विकास विधेयक

यह उत्तराखंड लोक धार्मिक संस्थाएं प्रबंधन एवं विकास अधिनियम कहलाएगा। इसका विस्तार पूरे उत्तराखंड राज्य में होगा। इसके अंतर्गत राज्य के चार धामों के अलावा गढवाल व कुमाऊं मंडल के प्रमुख मंदिर भी रहेंगे। प्रमुख धार्मिक पवित्र स्थल का तात्पर्य उत्तराखंड राज्य के ऐसे पवित्र स्थलों से है, जहां एक यात्राकाल में 50,000 यात्री आते हैं। गढवाल मंडल के बदरीनाथ मंदिर और बदरीनाथ गांव, पट्टी तल्ला पैनखंडा, में उसके परिसर में समस्त मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, गरूड, हनुमानजी, घंटाकरण व अन्य लघु मूर्तियां भी शामिल हैंे। इसमें अनुसूची में 1 क बदरीनाथ मंदिर के अलावा 31 अन्य मंदिर व तीर्थ स्थल हैं। ख में केदारनाथ मंदिर, उसके अधीनस्थ मंदिरों के अलावा 17 अन्य मंदिर हैं। ग में खरसाली ग्राम में शनि महाराज महाराज के मंदिर सहित यमुनाजी मंदिर के अलावा यमुनोत्री तीर्थ के आसपास अन्य सभी छोटे मंदिर। घ में मां गंगा के मंदिर के अतिरिक्त गंगोत्री के तीर्थ स्थल, गंगा का उदगम स्थान गौमुख शामिल है। ड में चन्द्रवनी मंदिर, देवप्रयाग में रघुनाथ मंदिर, मुखेम रमोली में नागराज मंदिर, पौडी में राज राजेश्वरी मंदिर व सुभाई में भविष्यबदरी मंदिर। अनुसूची 2 में क महाराजा टिहरी व राज्यपाल टिहरी के बीच 22 फरवरी 1965 को नियपादित करार के अनुलग्नक उल्लिखित सभी मंदिर। ख में 14 मंिदर। ग में 22 मंदिर शामिल हैं। 

अधिनियम के अनुसार एक अध्यक्ष व एक उपाध्यक्ष होगा। अध्यक्ष राज्य का मुख्यमंत्री होगा। राज्य सरकार द्वारा दो नामित सदस्य, जो गढवाल व कुमाऊं से हिन्दू सांसद। उपाध्यक्ष के अलावा सरकार द्वारा नामित दस सदस्य। इसमें से दो सदस्य बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति से, 1 गंगोत्री मंदिर समिति 1 सदस्य यमुनोत्री मंदिर समिति से 1 सदस्य कुमाऊं क्षेत्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल से, गढवाल क्षेत्र से दो सदस्य, पर्यटन सचिव पदेन सदस्य होंगे। इसके अलावा पांच अन्य सदस्य होंगे, जो मुख्यमंत्री द्वारा नामित किये जाएंगे। 

पक्ष और विपक्ष 

शिव प्रसाद मंमगाई:  चार धाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष शिव प्रसाद मंमगाई का विधेयक को लेकर कहना है कि इससे चार धामों के अलावा राज्य के अन्य प्रमुख तीर्थ स्थलों में भी विकास होगा। केन्द्र से वित्तीय सहयोग मिलने से इन स्थलों में आधारभूत सुविधाओं का ढाचा खडा किया जाएगा। उनका कहना है तीर्थ पुरोहितों, हकहकूक धारियों के हितों की रक्षा की जाएगी। उपाध्यक्ष ने बताया कि एक्ट को अगले वर्ष दिसम्बर तक अम्ल में लाने की योजना है, लेकिन इससे पहले सभी पक्षों के सुझाव व उनकी भावनाओं को समझा जाएगा। कहा कि तीर्थ पुरोहितों को उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को आत्मसात करना होगा। 

सुरेश सेमवाल: गंगोत्री मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश सेवमाल ने इस एक्ट पर अपनी असहमति जताई है। उनका कहना है कि मंदिरों व तीर्थ स्थलों के सरकारीकरण का पुरजोर विरोध किया जाएगा। इसके लिए सभी धामों के तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों की बैठक की जाएगी। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने बडी मेहनत से गंगोत्री धाम व इसके आसापास के तीर्थ स्थलों का विकास स्वयं के संसाधनों से किया है। कहा कि गंगोत्री के विकास में राज्य सरकारों का कोई योगदान नहीं है। गंगोत्री मंदिर के संयोजक कृपाराम सेमवाल ने कहा कि राज्य सरकार पिछले उन्नीस सालों में शीतकालीन पूजा स्थल मुखवा तक सडक नहीं पहुंचा पाई है। इस संदर्भ में कई बार सरकार व शासन को लिखा जा चुका है, ऐसे में नए सक्ट से धामों के विकास की बात हवाई है।

महेश बगवाडी: केदारतीर्थ पुरोहित महासभा के पूर्व अध्यक्ष महेश बगवाडी का कहना है कि तीर्थ पुरोहितों के हित व न्यायालयों के निर्णय के अलावा गर्भगृह में पूजा से संबधित तथ्यों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में कहीं भी तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों के बारे में स्पष्ट नहीं किया गया है। बगवाडी ने बताया कि एक्ट के प्रभावी होने के बाद उनकी संपतियां परिषद के अधीन हो जाएंगी। 

बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति है बेखबर

नए एक्ट को लेकर विरोधाभास भी सामने आने लगा है। एक ओर चार धाम विकास परिषद दो दौर की वार्ता तीर्थ पुरोहितों व हकहकूक धारियों से कर चुकी है। विधि आयोग के अध्यक्ष को विधेयक की प्रति सौंप चुकी है, वहीं दूसरी ओर बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति इस सबसे बेखबर बनी हुई है। ताज्जुब की बात यह है कि मंदिर समिति के अध्यक्ष को न तो बैठक में आंमत्रित किया गया था और न हीं इसकी कोई लिखित व मौखिक जानकारी उन्हें दी गई थी।  

गौरतलब है कि पूर्व में बदरीनाथ मंदिर में रावलों के प्रभाव में रहा। तीस के दशक में क्षेत्रीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन किया। इसकी परिणित यह हुई कि तत्कालीन ब्रिटिश हूकूमत ने 1939 में बदरीनाथ मंदिर एक्ट बनाया। इसके बाद 1948 में इस एक्ट में केदारनाथ मंदिर को भी जोड दिया गया और यह बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम 1939 के नाम से अस्तित्व में आया। तब से लेकर इसी अधिनियम से बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर के अलावा अन्य 49 मंदिरों को संचालन किया जा रहा है। हालांकि इस बीच राज्य सरकारों ने एक्ट में कुछ आंशिक  संशोधन किए। उत्तर प्रदेश में रहते हुए इस एक्ट में मामूली संशोधन हो पाया था। 

अब चार धाम के अलावा राज्य प्रमुख मंदिरों के लिए नया अधिनियम पर कार्य किया जा रहा है, लेकिन इसके तहत आने वाले 49 मंदिरों को संचालित करने वाली महत्वपूर्ण बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति को इससे बेखबर है। बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष मोहन प्रसाद थपलियाल का कहना है कि इस अधिनियम के बारे में उन्हें कोई जानकारी नही है। उनका कहना है कि मंदिर एकट 1939 में संशोधन किया जाना आसान नहीं है। आज तक इस एकट के तहत काम करने में कोई दिक्क्त नहीं आई। इस एकट को खत्म करने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव लाना पडेगा। यदि सरकार चाहती है और इसमें कुछ अच्छाई देखती है तो वो निर्णय ले सकती है। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठक की कोई जानकारी नहीं थी। उन्हें चार धाम विकास परिषद द्वारा आयोजित बैठक का कोई आंमत्रण नहीं दिया गया। यदि आंमत्रित किया जाता तो वे जरूर इसमें शामिल होते। इतिहास बदलने की कवायद, बडे बडे दावे मगर बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति को बैठक में बुलाया न जाना, कई तरह के सवाल खडा करती है। यह पहला मौका नहीं जब इस तरह कोशिश की गई, इससे पहले तिवारी सरकार को इस मसले पर बैकफुट पर आना पडा था। अब देखना होगा कि राज्य सरकार व चार धाम विकास परिषद नए अध्निियम को कैसे अम्लीजामा पहनाती है।    



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