क्यों न इस बार दीपावली पर जलाये मिटृटी के दीपक ?
| - Saleem Raza - Oct 22 2019 4:54PM

ज्यों-ज्यों देश तरक्की के सोपान चढ़ रहा है त्यों-त्यों इंसान भोगवादी होता चला जा रहा है। बाजारवाद के दौर में शायद इंसान संस्कारों से विरक्त होता जा रहा है। आज आप देखें तो पायेंगे कि हिन्दुस्तान के बाजार पर विदेशी वस्तुओं का बाजार गर्म है। खास तौर से इलैक्ट्रानिक उपकरण सस्ते दामों में उपलब्ध हैं, इनके मुकाबले में भारत निर्मित वस्तुओं के दाम ऊंचे होते हैं, ऐसे में इंसान को जब सस्ते दामों में अच्छी चीज मिल रही है तो उसे संस्कार से सरोकार कम हो जाता है। अब आप देखियें हिन्दु धर्म के तीन बड़े त्योहार होली,दीपावली और रक्षाबन्धन हैं, इन त्योहारों पर पूरा बाजार विदेशी वस्तुओं से भरा रहता है यहां तक कि मिठाई के नाम पर भी कैडवरी और नेस्ले जैसी कम्पनियां अपनी साख जमा रही हैं अब होली को ही देख लीजिए रंग के साथ पिचकारी भी चायनीज,दीपावली हो तो बाजार में लड़ियों के साथ दीपक भी चायनीज, रक्षाबन्धन हो तो राखियां भी चायनीज अब आप खुद ही बतायें स्वदेशी अपनाओं का नारा लगाने वाले कहां और किधर हैं।

खैर ये पर्व दीपमाला का त्योहार है दीपावली क्योंकि नाम के अनुसार ही बताता है कि दीपावली का मतलब दीपों की श्रंखला से है। ये पर्व असत्य पर सत्य की जीत का अन्धेरे पर रोशनी का त्योहार है, लेकिन इस चकाचैंध और बाजारवाद की दुनिया में भोगवादी बन बैठा इंसान अब बहुत आगे निकल चुका है। मैं कहना ये चाह रहा था कि क्यों अब धीरे-धीरे दीपावली में मिट्टी के दीपक का चलन कम होता जा रहा है, सिर्फ पूजा स्थल को छोड़करं जिनमे ं चंद मिट्टी के दीपक ही इस्तेमाल होते है,ं बाकी घरों पर लोग रोशनी करने के लिए चाईना निर्मित लड़ियों का इस्तेमाल करते हैं उनकी नज़र में जो सस्ती भी होती हैं और बेहतर भी।

सनातन धर्म के अनुसार मिट्टी से बने दीपक को पवित्र माना जाता है, इसलिए इनका इस्तेमाल पूजा में किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मिटृटी को मंगल का प्रतीक माना गया है, और मंगल साहस और पराक्रम का संचार करता है। मिट्टी के दीपक में तेल डालते हैं वो या तो सरसों का होता है या फिर अलसी का तेल इसलिए तेल को शनि का प्रतीक माना जाता है और शनि भाग्य का देवता कहा जाता है इस लिहाज से मिट्टी का दीपक जलाने से मंगल और शनि देवता की कृपा बरसती है। दीपक जलाने का दूसरा मकसद ये भी है कि दीपक की रोशनी को सुख समृद्धि और स्फूर्ति का प्रतीक माना जाता है तो वहीं अंधेरे को दुःख ,आलस्य और निर्धनता का प्रतीक माना जाता है,इसलिए दीपावली में हर घर के कोने-कोने में दीपक जलाने की धर्मिक रिवायत थी। वैसे भी मंहगाई की मार ने त्योहारों का रंग फीका सा कर दिया है इसलिए मंहगाई की मार के चलते दीपक जलाना भी शायद अब रस्म बनकर रह गया है। आज से तीन दशक पहले की दीपावली और आज की दीपावली में एक बहुत बड़ा अन्तर देखा गया है।

पहले हर घर की मुडेर पर दीपक रोशन होते थे, दीपावली की शाम होते ही हर घर की छतों की मुडेरें दीपक की कतारों से रोशन हो जाती थीं।ये मंहगाई का असर ही कहा जायेगा कि अब मिट्टी के दीपक की जगह मोमबत्ती और झालरों ने ले ली क्योंकि ये सस्ती पड़ जाती हैं, क्योंकि बाजार में चाईनीज लड़ियां बहुतायत मात्रा में हैं और इनका दाम भी 25 रूपये है ऐसे में जितने में एक लड़ी आयेगी उतने पैसों में 250 ग्राम तेल आयेगा जिससे तकरीबन 50 या 60 दीपक ही रोशन होंगे। ऐसे में कुम्हार के कारोबार पर मंदी और मंहगाई दोनों की ही दोहरी मार पड़ रही है तो वहीं बाजार पर चाईनीज वस्तुओं ने मिट्टी के कारोबार पर ग्रहण ही लगा दिया है।

दरअसल मिट्टी के दीपक दोरस मिट्टी से बनाये जाते हैं और ये मिट्टी आज के दौर में मंहगी मिलने के साथ मुश्किल से उपलब्ध हो पाती है। जितनी तेजी से जनसंख्या बढ़ेगी उतनी ही तेजी से नदी नाले और तालाब कम होंगे। जानकारी के मुताबिक एक ट्राली मिट्टी अब तकरीबन 1600 रूपये से भी अधिक दाम में मिलती है, दोरस मिट्टी की खासियत ये होती है कि इसमें रेत का अंश नहीं होता साथ ही इस मिट्टी से बने दिये फटते भी नहीं हैं। मिट्टी के दीपक बनाने वाले बताते हैं कि एक ट्राली मिट्टी में लगभग 80 हजार के आस पास दीपक बनते हैं जो बाजार में 300 रूपये हजार बिकते हैं। अब आप अन्दाजा लगाईये कि दिन भर चाक चलाना मिट्टी को गुंधने दीपक पकाने और बाजार में जाकर बेचने तक जो खर्चा आता है वो आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है ऐसे में कुम्हार के चाक की रफ्तार निरंतर हल्की होती जा रही है।

ये ही वजह है कि आजकल कुम्हारों ने इस कारोबार से तौबा कर ली लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा सिंगल एूज पालीथिन पर प्रतिबन्ध लगा देने से इस व्यवसाय को आक्सीजन जरूर मिली है लेकिन सरकार को भी इस और ध्यान देना चाहिए कि ये वो व्यवसाय हैं जिनके चलते रहने से संस्कार और धार्मिक रीति रिवाज बरकरार रहते हैं। बहरहाल आज के दौर में बाजारवाद इस कदर हावी है कि इंसान थोड़े खर्च में ज्यादा तलाशने लगा है, ऐसे में तयोहार के आने की खुशियां वैसे ही हैं लेकिन रंग जरूर फीका हुआ है। लिहाजा हम अपनी धार्मिक रीति रिवाजों का कट्टरता और अक्षरशः पालन करें तो न जाने कितने लोगों की आजीविका पुर्नजीवित हो जायेगी। संदेश ये ही है कि उन बहू बेटियों के अथक परिश्रम को देखे जो धूप में इन चीजों को तैयार करते हैं तो इस बार दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलायें और अपने धर में सुख समृद्धि लायें क्योंकि आप के जागरूक होने से न जाने कितने घर दीपक से रोशन हो जायेंगे। 



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