उत्सव
| -Priyanka Maheshwari - Oct 25 2019 1:53PM

"उत्सव" यह शब्द ही मन और शरीर दोनों में उत्साह भर देता है। धार्मिक कर्मकांडों के अलावा भी हम उत्सव मनाते हैं। खुशी और नई ऊर्जा के लिए हम इन त्यौहारों या उत्सवों पर ही आश्रित होते हैं। एक सुखद पहलू यह भी है कि त्यौहार हमारे जीवन में उन्नति, पूर्णता के साथ साथ सामाजिक संरचना, मान्यताओं, परंपराओं और संस्कारों को भी जीवित रखती है। विविधता हर जगह है इंडिया बन चुके भारत में विविधता ही विविधता है जो अक्सर देखने को मिल जाती है।

सुखद पहलू यह भी है कि हमारे उत्सव सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक दूसरे के संपर्क में आकर कुछ नया सृजन करते हैं तो नई पीढ़ी कुछ नया सीखती भी है और सामाजिक बनती है। त्यौहार या उत्सव ही है जो सामाजिक दायरा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उत्सवधर्मिता, आतिथ्य और भोजन की परंपरा हमारे समाज का मुख्य घटक है इसके बिना हमारे उत्सव पूरे नहीं होते और तो और अंत्येष्टि भी पूर्ण नहीं मानी जाती।

उत्सव द्वारा दान पुण्य, पूजा पाठ  समाज में समरसता, जीवंतता और निरंतरता को बनाए रखती है। कहने का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि सामाजिक होने के लिए, अपनी परंपराओं को जीवित रखने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए उत्सव या त्यौहार जरूरी हैं। हर उत्सव के अपने नियम भी होते हैं। ध्यान, सादगी और पवित्रता का होना बहुत जरूरी है। त्यौहार ईश्वर को धन्यवाद करने का और ईश्वर की प्रार्थना का एक तरीका भी है।

हाल फिलहाल रोशनी का त्यौहार दीपावली है। दीपावली का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। कहा जाता है कि नरक चतुर्दशी के दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर राक्षस को मारा था और सुख समृद्धि के लिए  के लिए भी इस त्यौहार का खासा महत्व है। तो उत्साह के साथ उत्सव जरूर मनाया जाना चाहिए।



Browse By Tags



Other News