आर्गेनिक खेती की ओर लौटना
| Dr. Avinash Kumar Jha - Oct 26 2019 2:25PM

आर्गेनिक खेती या जैविक खेती पर्यावरण अनुकूल है। मूलतः यह रासायनिक खादो, पेस्टीसाइड के विरोध मे है ।इसे इस कारण हम वापस प्रकृति की ओर लौटने की विधा भी कह सकते हैं। गांवों मे खेतों मे गोबर, कंपोस्ट डालने और बनाने की परंपरा बहुत पहले से रही है। सभी किसानों के पास बैल- भैंस अवश्य होता था ,उससे कई लाभ थे ,जैसे जानवर खेतों मे धान और गेंहूँ के बने भूसे खाते थे ,इससे खेतों मे पराली जलाने की समस्या नही थी।दूसरे गोबर को खेतों के एक हिस्से मे जमा किया जाता और इससे बने कंपोस्ट को जैविक खाद के रुप मे उपयोग किया जाता।लेकिन बढ़ती जनसंख्या को खिलाने के लिए बढ़ते खाद्यान्न की आवश्यकता ने यांत्रिक खेती को बढ़ावा दिया।

अधिक उत्पादन लेने के लिए खादों का अंधाधुंध उपयोग प्रारंभ हुआ।इससे न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होने लगी बल्कि फसल कीटों के प्रति सेंसिटिव होने लगे, फलतः पेस्टीसाइड का उपयोग बढ़ा। लेकिन इस सबसे के प्रयोग से उत्पादन तो बढ़ा पर खाद्यान्न का स्वाद और पौष्टिकता घटी, साथ ही इसने मानवीय शरीर पर भी दुष्प्रभाव छोड़ा। मजबूरन लोग पुनः जैविक खेती की ओर ध्यान देने लगे। अब यह हमपर है कि आर्गेनिक खाद्यान्न का खाना खाकर शरीर और पर्यावरण को स्वस्थ रखें या अंधाधुंध उत्पादन पर जोर डालकर बिमारियों के सागर मे डूबकी लायें। अंधाधुंध खाद और पेस्टीसाइड का ही नतीजा है कि पीलीभीत मे इसबार धान कामन की प्रजाति पी आर 113 पर ऐसा रेड ब्लाइट रोग लगा।

चाहे कितना भी रोगनाशक का छिड़काव किया गया, फसलें बरबाद हो गई। वहीं जिन खेतों मे जैविक खाद डाला गया, वह यथावत रहा। अंधाधुंध दौड़ का यह आलम है आज सिर्फ फसलों मे चमक लाने के लिए 600 रूपये प्रति एकड़ खर्च कर दवा छिडकाव करते हैं। क्या करें चमक दमक की दुनिया मे आर्गेनिक अन्न देखने मे सुंदर नही लगता पर स्वाद बेमिसाल है।कोई भी चीज विदेशो के माध्यम से वापस अपने यहाँ लौटती है तो उसे हाथोंहाथ लिया जाता है ,जबकि हम सदियों से इस जैविक खेती को करते आये हैं। फसल चक्र हमारे बड़े बूढ़े शुरू से अपनाते रहे हैं। फसलों के बीच दलहन बोना हमने छोड़ा तब भारत मे दालों का अकाल हो गया और आज हमें इसके लिए विदेशों पर आश्रित रहना पड़ता है।

जब हाथ से फसलें काटी जाती थी तब पराली से भूसे बनते थे शेष को खेतों मे “मसान” कर दो चार दिन छोड़ दिया जाता था और वो सब सड़ गलकर कंपोस्ट खाद बन जाता था। इससे केंचुआ खेतो मे पनपता था, मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती थी, लेकिन रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड ने खेतों से केंचुओं को मार डाला। पराली जलाना किसानों की मजबूरी है, वो क्या करें इसका? पराली निस्तारण एक अतिरिक्त व्यय बोझ है उनपर। आज फिर उन्हें” रीपर “और ” मल्चर” मशीन दिया जा रहा है जो हम पहले ” मसान”कर खेतों मे छोड़ देते थे।

पराली जलाने से खेतों के आवश्यक बैक्टीरिया जल जाते हैं और वायु प्रदूषण पृथक से होता है। इसके विकल्प ढूंढना आवश्यक है। साथ ही ऐसे फसलों का उत्पादन भी रोकना होगा जो अत्यधिक पानी का उपयोग कर जलस्तर को नीचे गिरा रहे हैं। “साठा” या “चैनी” की खेती भयंकर जलदोहन करती है। खाद्यान्न उत्पादन के अंधाधुंध दौड़ मे कहीं हम पर्यावरण के साथ ऐसी छेड़छाड़ कर दें कि पृथ्वी मनुष्यों के रहने लायक न रह जाय। ऐसे मे आर्गेनिक या जैविक खेती ही मात्र विकल्प है।



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