छींक के राष्ट्रीयकरण में शिक्षा का हाथ
| Rainbow News Network - Oct 29 2019 3:58PM

जब हमें एक प्यारी सी छींक आ गई तो हम किसी एक अर्द्धसरकारी हॉस्पिटल में जमा हो गए। घर से रुपयों के तीन सूटकेस भरे और चल दिए उस गुफा में छींक के इलाज के लिए। खून, मल, मूत्र, पसीना, बाल, खाल आदि के टेस्टिंग करने के 10,000 रुपये चुकाने के बाद हम अस्पताल की गुफा के मुख्य द्वार की जगह पहुँच गए। वहाँ तीन चार जगह भाग-भाग कर समस्त प्रकार के परीक्षण इकट्ठे किए। डॉ बीमार मल जी सरकारी अस्पताल से लंच के बहाने अपने निजी अस्पताल में आ धमके। भीड़ सुबह के मुकाबले 4 गुनी हो गई थी। हमने चपरासी अधिकारी जी को 500 रपट्टी भेंट किए और हम तुरंत ही मुख्य गिरोह के मुखिया के सामने थे।

उस गिरोह अधीक्षक ने तमाम परीक्षणों की एक सेकंड में ही खोजबीन कर ली। वे दूर दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, महीन दृष्टि और अभूतपूर्व दृष्टि वाले टोटल्ली दृष्टिहीन व्यक्तित्व दृष्टिगोचर हो रहे थे। जो सकल समय में वाट्सअप की दुनिया में ही खो रहे थे। संप्रति फेसबुक में अपना मुँह धो रहे थे। उन्होंने सोनोग्राफी, एंडोग्राफी, सेंटोग्राफी व एक्स-रे की महत्ता प्रतिपादित की। छींक की गहराई पर सोडियम लाइटें बिखेरी। तभी एक अन्य वरिष्ठ सदस्य ने मुझे संभाला और मुझे वह सीधे एक्सरे रूम की ओर ले गया। चंद मिनट में ही मेरे हजार रपट्टी एक्स-रे बनकर उनकी पेटी में समा गए। सोनोग्राफी बनकर 2 हजार का नोट उसके नोटों में जा मिले। इस काली गुफा के नोट रूपक में बड़ी शक्ति थी। गुफा के मोटे नोटों में मेरे छोटे नोटों को चुंबकीय शक्ति से अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया।

वे एक-एक करके गुफा गिरोह के गल्ले में अपने भाइयों से गले मिलने लगे। उस वरिष्ठ सदस्य ने शाम 5:00 बजे रिपोर्ट मिलने की बात कह दी। इससे पूर्व हमें स्वयं को लुटाने का कोई स्कोप नहीं था। लिहाजा हम पास ही जूस की दुकान पर बैठ गए। जूस वाले को एक पाइनएप्पल का आर्डर दिया। तभी पीछे से मुझे लक्ष्मी मल ने थपकाया। स्वयं को लुटवाने का एक उत्तम मौका पाकर मैंने 14 पाइनएप्पल का ऑर्डर दे दिया; क्योंकि लक्ष्मी मल के साथ उनकी निजी पत्नी और चार निजी ट्रांजिस्टर भी रोकड़ मौजूद थे। वे सब डबल राउंडेड थे। जूस वाले ने मुझे पाइनएप्पल के बहाने पानी में एप्पल डालकर उसका घोल पिलाया। बदले में जूस अधीक्षण अभियंता ने इस अभियान से मुझसे मात्र 1645 रुपये ही लिए। चेंज न होने का गीत गाकर उसने 1700 रुपये लेना उचित समझा। हमने आराम से लुटने-पिटने में अपनी सक्रियता दिखाई।

इस बीच मेरे अस्पताल जाने की शुभ सूचना पूरे मोहल्ले में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। मोहल्ले वालों ने मुझे जूस के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया था। शाम 5:00 बजने तक हमने जूस वाले को पूरे 10,000 रुपयों से नवाजा। पूरे मोहल्ले की खैर खातिर में हमने जूस वाले को पूरा व्यापार दिया। तब फिर हम अर्द्ध सरकारी अस्पताल में जा पहुँचे। दो-तीन जगहों पर घूम-घूम कर उछल-उछल कर रिपोर्टें इकट्ठी की। पाँच नश्वर शरीर मेरे साथ उन रिपोर्टों को ढोने वाले हो गए थे। दिन भर में फिर से 500 समकक्ष रोगियों की कृपा से हम अस्पताल गिरोह के मुखिया जी के पास खड़े थे। उन्होंने एक नजर में ही पल भर में सभी रिपोर्टों पर अपनी दृष्टि का पात कर ही दिया। फिर पर्ची के सीने में दवाइयां गोदते गए। मेरी छींक को जड़ से मिटाने के लिए डॉक्टर बीमार मल ने गोलियाँ, कैप्सूल, सिरप, इंजेक्शन के ई-मेल एड्रेस लिखने के लिए अन्य कनिष्ठ पर्ची देव की सहायता ली।

पूरे डेढ़़ घंटे तक डॉक्टर साहब पर्ची के साथ पूर्ण मनोयोग से बलात्कार करते रहे। उनकी गुफा में जितनी भी मेडीसन थी उनके पूरे कुनबे का पता पर्ची के सीने पर गुदा था। तत्पश्चात तत्काल ही तत्परता से त्वरित वेग पूर्ण रीति से अवतरित होकर एक गरिष्ठ गिरोह सदस्य ने हमसे पर्ची झपट ली। तब हम हमारे साथ मोहल्ले की पूरी फौज के साथ उनके पीछे मेडीसन मार्च पास्ट करने लगे। पूरे 39 मिनट 15 सेकंड के बाद हम उस गुफा के एक अन्य कलात्मक गुफाई गुंबद के सामने खड़े थे। जिसके नाम पर दवाई घर लिखा हुआ था। यह दवाई घर भी उसी गिरोह के अन्य सदस्य का था। इस दवाई घर में सरकारी अस्पताल की दवाइयां बड़ी इज्जत-आबरू के साथ बिकती थी। इस प्राइवेट लूटेरालय में हमने 15,000 रुपये देकर पाँच जनों के हाथों में दवाइयों के कार्टून थमाए। अब मेरे इंजेक्शन लगने की बारी थी। पूरे 20 मिनट 40 सेकंड चलने पर इंजेक्शन पति जी मुझे मिले।

उन्होंने मुझे सिर्फ 4 घंटे रुला कर पांच इंजेक्शन मेरी नश्वर काया में प्रविष्ट करा दिए। इस एवज में 565 रुपये जमा करवाने पड़े। रोज 5 इंजेक्शन लगवाने का वायदा किया। फिर 5 ऑटो करके दवाइयों के कार्टूनों, रिपोर्टों और चादर-तकिए के साथ हमने मोहल्ले वासियों को लेकर घर आने की होशियारी दिखाना शुरू किया। मेरे छींक आने पर इसके कुशलक्षेम पूछने के लिए घर पर रिश्तेदारों की भारी भीड़ जमा थी। फोन से इन्हें मेरी छींक की सूचना दे दी गई थी। व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर मेरी छींक की आवाज रिकॉर्ड करके मेरे सभी डिजिटल-अडिजिटल फ्रेंडों को सूचना दे दी गई थी। अब मैंने घर में कुशल क्षेम पूछने वालों का मेला भरवा दिया। झूले-चकरी के साथ गोलगप्पे व जलेबियों की दुकानें सज गई थी। सब कुशलक्षेम-बाज घर में थे और मेरे बच्चे बाहर किसी पेड़ के नीचे बैठे अपने बाल नोचने का सांस्कृतिक कार्यक्रम कर रहे थे। मेरी खाट मकान के बाहर सड़क पर पटक दी गई।

एयर कंडीशनर में कुशलक्षेम पूछने वाले सारे फ्रेंड आराम फरमा रहे थे। रसोई में उनके लिए हलवा-पूरी बनने लगे थे। मेरे लिए एक कटोरी में एंटीबायोटिक टेबलेट की सब्जी। कैप्सूल का भरवां साग। सिरप का रायता और विभिन्न प्रकार की ट्यूबों से बनी रोटियां परोसी गई। मैंने कैप्सूल व टेबलेट से पेट भर अस्पताल की पट्टियों से हाथ पौंछे। मेरे रिश्तेदारों-दोस्तों ने पूरे 30 दिनों तक मेरा पूरा-पूरा ख्याल रखा और मेरी छींक का जबरदस्त ध्यान रखा। इस बीच मैंने शहर के चार अन्य लुटेरालयों से भी लूटने का लाभ उठाया। बारी-बारी से मैंने सभी को मौका देखकर लोकतांत्रिक रोगी होने का गौरव पाया। मेरी छींक से देश के सभी डॉक्टरों का परिवार चलाया। इधर एक काले कौए ने मेरी छींक को शिक्षा बतलाया। शिक्षा के बाजार में बार-बार लूटने-पिटने के फरमान को मेरी छींक की बीमारी बताया। मेरी छींक के राष्ट्रीयकरण में शिक्षा का हाथ जताया। सच्ची! झूठ बोलूँ तो काला कौआ काट खाए!

-रामविलास जांगिड़



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