तेज बहादुर यादव का मैदान-ए-सियासत से बेआबरू होना
| -Nirmal Rani - Oct 30 2019 4:13PM

                                           हमारे देश की सीमाओं के प्रहरी भारतीय सैनिकों व सीमा बल के जवानों द्वारा चौबीसों घंटे विपरीत एवं दुर्गम परिस्थितियों में भी की जाने वाली सीमा की निगरानी की बदौलत ही देश के 125 करोड़ लोग  चैन की नींद सो पाते हैं। हांड़ कंपकंपाने वाली भीषण सर्दी,ग्लेशियर के बर्फ़ीले तूफ़ान,गर्मी में तपते हुए रेगिस्तान,बारिश के मौसम में पूर्वी सीमाओं पर या फिर हज़ारों किलोमीटर लम्बी समुद्री सीमाओं पर,गोया हर जगह हमारे देश के रक्षक 12 महीने 24 घंटे अपने कर्तव्यों का पालन करते दिखाई देते हैं। इनकी हौसला अफ़ज़ाई के लिए एक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह कहते सुने गए थे कि भारतीय नागरिक जब कभी सेना के जवानों को आता जाता देखें तो उनके सम्मान में खड़े होकर तालियां बजाया करें। ऐसा करने से उनका मनोबल बढ़ता है। कई देशों में ऐसा होता भी है। जहाँ बच्चे,बूढ़े,महिलाऐं छात्र सभी सैनिकों के सम्मान में तालियां बजाते हैं,उनपर पुष्प वर्षा करते हैं तथा उनकी शान में गीत भी गाते हैं। ऐसे देशों में सैनिकों का सम्मान केवल जनता ही नहीं बल्कि वहां की सरकारें भी करती हैं। सैनिकों को अच्छी व संतोषजनक तनख़्वाहें दी जाती हैं,उन्हें उनकी सैन्य यूनिट में यहाँ तक कि युद्ध के मोर्चे पर भी अच्छे व पौष्टिक भोजन व नाश्ता आदि दिया जाता है। मौसम के लिहाज़ से अच्छी वर्दी व जूते आदि दिए जाते हैं। उनके मनोरंजन व स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जाता है। नतीजतन हर फ़ौजी अपनी निर्धारित ड्यूटी पूरी कर्तव्य निष्ठा के साथ करता है। यही वजह है कि ऐसे देशों के जवान प्रायः हर वक़्त हँसते मुस्कुराते तथा बिना किसी मानसिक दबाव के ड्यूटी देते दिखाई देते हैं।

                                            परन्तु क्या हम अपने देश की फ़ौज के रहन सहन की हक़ीक़त और उनको मिलने वाली सुविधाओं की तुलना दूसरे पश्चिमी देशों की सेनाओं से कर सकते हैं?और राजनीति का यही दोहरा चरित्र जो देश से सैनिकों के सम्मान की उम्मीद तो पाले बैठा है परन्तु सत्ता में बैठकर यही राजनीति इन्हीं जवानों के साथ कैसे पेश आती है और इनका क्या हश्र करती है कभी इस पर भी ग़ौर करने की कोशिश की गयी है? इस तरह के सवालों का सबसे ठोस जवाब देने वाला तथा भुक्तभोगी तेज बहादुर यादव नाम का एक चेहरा गत तीन वर्षों से भारतीय जनता के मध्य छाया रहा। जिन दिनों देश की सेना के साथ दीपावली मनाने व उनकी हौसला अफ़ज़ाई में तालियां बजाने जैसी सीख प्रधानमंत्री देश को दे रहे थे उसी दौरान अर्धसैनिक बल के एक जवान तेज बहादुर यादव ने 2017 में सोशल मीडिया पर एक वीडिओ वायरल की जिसमें उन्होंने  सेना में जवानों को कथित तौर पर मिलने वाले घटिया क़िस्म  के भोजन की पोल खोली और अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार  के गंभीर आरोप लगाए । यादव ने उस समय पूरे देश में ख़ूब सुर्ख़ियां बटोरीं तथा जनता की ओर से भी उन्हें भरपूर समर्थन मिलता नज़र आया। परन्तु इस प्रसिद्धि का परिणाम  यह हुआ कि उन्हें सच बोलने की सज़ा दी गई और  उन्हें अपने विभाग बी एस एफ़ से बर्ख़ास्तगी का सामना करना पड़ा।

                                            सोशल मीडिया पर हो रही अपनी प्रसिद्धि से अभिभूत तथा बी एस एफ़ से अपनी बर्ख़ास्तगी से आहत इस जवान ने उस समय जोश व उत्साह में आकर देश में फैले ख़ासकर सेना में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करने की ठानी। 2019 में हो चुके लोकसभा चुनाव को  तेज बहादुर यादव ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी आवाज़ को बुलंद करने का एक उपयुक्त अवसर समझा। यही नहीं बल्कि यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध ही चुनाव लड़ने की ठानी और वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में कूद पड़े। वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतरने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी रही समाजवादी पार्टी ने यादवको हाथों हाथ लिया तथा उन्हें समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी बना डाला। परन्तु यहाँ अंतिम समय में उन्हें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के उस  प्रावधान का सामना करना पड़ा जिसके तहत केंद्र या राज्य सरकार का प्रत्येक ऐसा कर्मचारी जिसकी सेवा किसी भी आरोप में बर्ख़ास्त की गयी हो, वह पांच वर्षों तक चुनाव नहीं लड़ सकता। तेज बहादुर यादव को ज़िला निर्वाचन अधिकारी वाराणसी का इसी से संबंधित एक नोटिस मिला जिसमें उनसे कहा गया था कि वो बीएसएफ़ से एक चिठ्ठी लेकर आएँ जिससे पता चले कि उन्हें क्यों बर्ख़ास्त किया गया था। इस क़ानूनी दांव पेंच के चलते उनकी उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई। हालाँकि यादव ने इसे अपने विरुद्ध एक बड़ी साज़िश बताया और सर्वोच्च न्यायलय के दरवाज़े भी खटखटाए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस पूर्व सैनिक द्वारा छेड़े गए अभियान के दौरान यादव को सोशल मीडिया पर ही अपने विरोधियों का शिकार भी बनाया जाने लागा। उसकी शराब पीते हुए झूठी सच्ची वीडिओ वॉयरल की जाने लगी। इसी बीच जनवरी 2019 में तेज बहादुर यादव का 22 वर्षीय बेटा रोहित, हरियाणा के रेवाड़ी की शांति विहार कॉलोनी स्थित आवास में संदिग्ध रूप से मृत अवस्था में मिला। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाला रोहित अपने घर आया हुआ था।
                                          इन सभी विपरीत हालात का सामना करते हुए भी तेज बहादुर ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने संघर्ष की मुहिम जारी रखी। और पिछले दिनों वे हरियाणा विधान चुनाव के दौरान करनाल विधान सभा सीट से राज्य के मुख्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर के विरुद्ध ताल ठोक बैठे। उत्तर प्रदेश में वाराणसी से चुनाव लड़ने के दौरान जिस तरह समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया था उसी तरह हरियाणा में भी इंडियन नेशनल लोकदल से टूट कर कुछ ही समय पूर्व बनी जननायक जनता पार्टी ने भी उन्हें मुख्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर के विरुद्ध करनाल से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। अपने पूरे चुनाव अभियान में यादव व  उनकी पार्टी जे जे पी ने सेना तथा अन्य क्षेत्रों में फैले भ्रष्टाचार का मुद्दा बड़े ही पुरज़ोर तरीक़े से उठाया। परन्तु चुनाव परिणाम आते ही पूरा का पूरा राजनैतिक परिदृश्य ही बदल गया।  जे जे पी ने अपनी राजनैतिक व व्यक्तिगत मजबूरियों के तहत भारतीय जनता पार्टी से ही हाथ मिलाने का फ़ैसला किया। गोया जिसको भ्रष्टाचारी बताकर जनता से वोट मांगते फिर रहे थे उसी के साथ सत्ता की साझेदारी तय हो गयी। दूसरी ओर मायूस तेजबहादुर यादव जो कि भले ही फ़ौज का एक जाँबाज़ सैनिक तो रह चुका था परन्तु राजनीति के इस बदरंगी दुनिया से नावाक़िफ़ था,असहाय होकर ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा और जे जे पी की भाजपा से 'सगाई' की घोषणा के साथ ही उसने जेजेपी से भी ख़ुद को अलग करने की घोषणा कर डाली। तेज बहादुर का व्यक्तित्व व मैदान-ए-सियासत से उसका बेआबरू होकर निकलना ही अपने आप में जहाँ देश में सैनिकों की वास्तविक दशा को दर्शाता है वहीँ यह सत्ता के लिए राजनैतिक लालसा की पराकाष्ठा को भी प्रदर्शित करता है।



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