हाँ! हम गुनाहगार है
| Dr. Arpan Jain 'Avichal' - Oct 31 2019 12:46PM

ठीक पढ़ा आपने कि ये पीढ़ी सचमुच गुनाहगार है, अपने भविष्य की। जहाँ अंधेरा अपनी जद फैला रहा है। जहाँ शुचिता मुँह बाहे खड़ी है। ज्ञान का अभाव और व्यर्थ का दबाव दोनों ही हावी है परिवर्तन के नाम पर थोपे हुए लबादों से। हाँ, हम वैसे ही गुनाहगार है, न जल, न पर्यावरण, न संस्कृति, न भाषा, न ही सामान्य जनजीवन हम शेष रहने दे रहे हैं। समकालीन साहित्य में तो इतनी गंदगी घर करती जा रही है कि स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर कमर के नीचे का लेखन, पुरुष प्रधानता के नाम पर पाश्चात्य अनुगामी बहु स्त्रीवादी दृष्टिकोण, बचपन के नाम पर टूटते-बिखरते सपने आदि यही तो हम छोड़ रहें हैं।

कैसे हमारे गुनाहों की भरपाई होगी? वैचारिक शक्तियां राजनीति के बोझ तले कमजोर साबित हो रही है। लगता है कि हर जूते का तला केवल राजनीति से ही बना हुआ है यानी तलवे से केवल राजनीति की दुर्गन्ध ही आती है। कोई राह बदल कर सही करने निकले तो ज्ञानी यह ज्ञान देते है कि पहले तो आप भी सम्मिलित थे, भागीदार थे, साथी थे। अरे भाई अंगुलीमाल पहले डाकू था, बुद्ध के सदुपदेश के उपरांत ही तो वह डाकू से सन्यासी बना, जब जागो तब सवेरा भी तो हमारे ही यहाँ कहा जाता है।

खैर अधिक ज्ञान वालों के समझ में आना भी नहीं है, पर उन्हें उनके हाल में छोड़ कर भी बहुधा लोग शुचिता की ओर क्यों कम बढ़ रहें, यानी वे भी सम्मिलित है गुनाहों के देवता का मंदिर बनाने में। हिन्दी साहित्य की बात करें तो वर्तमान पीढ़ी अपने आने वाले भविष्य के लिए क्या छोड़कर जाएगी उसे देखकर ही डरावनी छवि सामने आ जाती है। आज सैकड़ों हजारों सम्मान खरीदने वाले और बीसियों किताबें लिखने वालों का आने वाली पीढ़ी किस गाली से सम्मान करेगी ईश्वर जाने, किन्तु इतना तो तय है कि वो खाली हाथों से गुणगान तो कतई नहीं करेगी।

हमारी पूर्ववर्ती साहित्यिक पीढ़ी ने हमें उद्देश्य,मूल्य और आदर्श सौंपें थे, हाँ उसने बीमारी से दम तोड़ते निराला भी दिए थे पर स्वाभिमान के सम्मुख भीख मांगते साहित्यकार नहीं दिए, न ही सम्मान खरीदते या ढोंगी, नौटंकीबाज रचनाकार दिए। उस पीढ़ी ने सृजन दिया जो कालजयी है। उस पीढ़ी ने जनता के स्वर को अग्नि देने वाले शिखर कलश दिए, अग्निधर्मा कवि दिए, प्रेम में पुजारिन की तरह अमृता भी दी, पर कभी हाशिए पर साहित्य को ले जाने की शिक्षा नहीं दी, इसीलिए वे आज भी याद रखें जा रहें है। परंतु हम क्या देंगे भविष्य के गर्भ में पल रही उस पीढ़ी को? विधाओं की असामयिक मृत्यु या फिर नवाचार के नाम पर परोसी गई फुहड़ता, खंड-खंड विखंडित संस्कृति या मलिन होती भाषा। विचारणीय किन्तु अत्यंत आवश्यक कि हम गुनाहगार है।



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