मन की व्यथा
| Rainbow News Network - Oct 31 2019 1:07PM

रोटी  के इंतजार में भूखे सो रहे  लोग,
धन कुबेरों की कमी कहते नहीं बनता!
पराए का  दिया दर्द हो तो सह लें हम,
अपनों का दिया दर्द सहते नहीं बनता!
इंसान ही इंसान  के प्राण का भूखा है,
इस बेरहम दुनिया में रहते नहीं बनता!
एक तरफ खा खा कर मर रहे हैं लोग,
भूखे बच्चों  का दर्द देखते नहीं बनता!
सड़क पर कुत्ते से शौच कराते हैं लोग,
इनकी हरकत पर पछताते नहीं बनता!
कार्यालय में बैठ घूस खा रहे हैं साहब,
नैतिकता पाठ देख हंसते नहीं बनता!
चपरासी बनने को पीएचडी तैयार बैठे,
युवाओं की आंसू  देखते  नहीं बनता!
बेटी बेटियां विदेश  नौकरी कर रहे हैं,
माता-पिता को दिन गुजारे नहीं बनता!
एक  तरफ  है त्योहारों की पवित्रता,
बजते अश्लील गाने सुनते नहीं बनता!
निजीकरण निगल रही है नौकरियां,
सरकार को कुछ कहते  नहीं बनता!



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