वायु प्रदूषण: बचने के लिए बचा है केवल कुछ वक्त
| Rainbow News Network - Nov 7 2019 1:10PM

वायु प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को लताड़ा- 'आप सड़क की धूल निर्माण, ध्वंस और कूड़े के निस्तारण से नहीं निपट सकते हैं तो आप इस पद पर क्यों बने हुए हैं? आपको लोगों के अरमानों को पूरा करना है। अगर आप ये नहीं कर सकते तो आप यहाँ क्यों रहेंगे? आप अपनी ड्यूटी निभाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। आपने किस तरह का रोडमैप अपनाया है? क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या ही जवान सब बीमार हो रहे हैं। क्या आप लोगों को प्रदूषण की वजह से ऐसे मरता छोड़ सकते हैं? हम कीमती जीवन खोते जा रहे हैं। हम केवल आदेश जारी करते हैं। ऐसे वातावरण में कोई कैसे जीवन जी सकेगा? सरकारें क्या कर रही हैं?

लोगों को इस तरह मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। यह सब हैरान कर देने वाला है। आप लोगों ने सब चीजों का मजाक बना दिया है। प्रदूषण पर काबू पाने में नाकाम रहने पर जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होगी। लोग रोजाना मर रहे हैं, मरते रहेंगे, क्या किसी सभ्य देश में ऐसा नहीं होता है? हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लोगों को जीने का अधिकार है। इस देश में दुख की बात है, लोग केवल नौटंकी में रुचि रखते हैं। ऐसा हर साल हो रहा है। इसके लिए सरकारें जिम्मेदार हैं।'

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 20 प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण का गहरा संबंध हृदय रोग, श्वसन रोगों और कैंसर से है। भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जहाँ वायु प्रदूषण उच्चतम स्तर पर है। भारत में वायु प्रदूषण सामान्य मानकों से काफी अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को वायु प्रदूषण के उच्चतम एकाग्रता वाले देशों में सूचीबद्ध किया है। भारत में वायु प्रदूषण के कारण 25 फीसदी लोग हॉस्पिटल जाते हैं। भारत में वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2017 में 12 लाख लोगों की मौत हुई। वायु प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा मौत 65.85 फीसदी होती है।

वायु प्रदूषण के 3 कारक ज्यादा जिम्मेदार रहे। सबसे ज्यादा 38.15 फ़ीसदी मौतें आउटडोर प्रदूषण यानी चिमनी, वाहनों और आग से निकलने वाले धुएं से फैले प्रदूषण के कारण हुई। इसके बाद घर से निकलने वाले प्रदूषण से 21.47 फ़ीसदी मौतें और ओजोन गैस क्षरण के कारण 6.23 फ़ीसदी मौतें हुईं। अकेले दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण 10 में से 4 बच्चों में फेफड़ों की समस्याएं होती हैं जिसमें 2 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों में पुराने अस्थमा की समस्या पायी जाती है। दिल्ली में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में ब्रोंकाइटिस की समस्या भी बढ़ गई है। नीदरलैंड में वायु प्रदूषण से बचने के लिए यहाँ के लोग साइकिल चलाते हैं। नीदरलैंड सरकार 2025 तक सभी वाहनों को बिजली और हाइड्रोजन वाहनों में बदल रही है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से प्रमुख लंदन ने टॉक्सिक चार्ज नाम से वायु कर लेना शुरू कर दिया है।

2003 से ही यहाँ मध्य लंदन में कोई भी पेट्रोल-डीजल से चलने वाला वाहन प्रवेश करे तो उसे जुर्माना देना पड़ता है। पेरिस में बहुत पहले ही सम-विषम प्रणाली लागू कर दी गई। यहाँ सार्वजनिक परिवहन को मुफ्त कर दिया गया। अब हर माह एक रविवार को कार मुक्त दिन मनाया जाता है। जर्मनी ने जलवायु प्रदूषण से निपटने के लिए यातायात जैसे क्षेत्रों के लिए कार्बन शुल्क शुरू किया है। बीजिंग में सम-विषम सिस्टम शुरू किया गया। डीजल वाहन बंद किए गए। यहाँ अब एप आधारित मिनीबस सुविधा चलाई जा रही है। वर्तमान में बिजली से चलने वाले हल्के वाहनों के प्रयोग को बढ़ावा देना बहुत आवश्यक है जो आने वाले भविष्य में ईंधन से चलने वाले वाहनों की जगह लेंगे। इससे वायु प्रदूषण को कुछ हद तक खत्म करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ कचरा प्रबंधन में भी आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना चाहिये, जिससे कचरा पर्यावरण के लिये खतरा ना बने।

थर्मल पावर प्लांट चालू, निर्माणाधीन और नए पावर प्लांट आदि से निकलने वाले उत्सर्जन को लेकर कठोर मानक बनाए जाने चाहिए। ईंट भट्टी में जिग जैक का प्रयोग हो।गाड़ियों से निकलने वाले धुंए को नियंत्रित करें। डीजल जेनेरेटर के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगे। निर्माण उद्योग के लिए भी सख्त मानक होने चाहिए और मानकों पर खरा न उतरने पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। पराली व कचरा को जलाने का विकल्प अपनाएं। इसके लिये जन जागरूकता के जन अभियान चलाए जाने चाहिए। दिन में प्रति व्यक्ति को कम से कम 5 किमी पैदल चलना चाहिए। बाजार, घर, स्कूल, अफिस आदि की कम दूरियाँ पैदल ही तय करनी चाहिए। कम से कम वाहन चलाने की कोशिश करो।

पैदल चलिए फिट रहिए के मंत्र को जीवन में उतारना होगा। चलते जाओ, साइकिल चलाओ, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करो, या कार्यस्थल पर पहुचने के लिए कारपूलिंग का उपयोग करो। स्कूलों में पर्यावरण केवल विषय के तौर में न पढ़ाकर, बच्चों में एक चेतना के तौर पर लिया जाना चाहिये। पर्यावरण के प्रति जन सामान्य में चेतना का विकास करना अति आवश्यक है। शहरों पर जन दबाव को कम करना चाहिए। जहरीली हवा लोगों को मौत के घाट उतार रही है। दुनिया भर में हर साल 50 लाख से ज्यादा लोग वायु प्रदूषण से मर रहे हैं। वायु प्रदूषण मानव जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। वायु प्रदूषण के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और स्वस्थ हवा में सांस लेने के लिए प्रभावी कदम उठाने आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण मामले में कड़ा रुख बरकरार रखते हुए सरकारों को लताड़ लगाई। यह आसन्न मौत की गूँज है। दुनिया के विभिन्न सर्वे एवं रिपोर्टें वायु प्रदूषण को मौत का सबसे बड़ा कारण मान रही है। ऐसे में हमें वायु प्रदूषण से बचने के लिए कई तरह के उपायों पर एक साथ काम करना पड़ेगा और सच में ही इससे बचने के लिए जन आंदोलन बनाना होगा। सच तो यह कि मैं जब भी किसी शहर जाता हूँ घबराकर गाँव लौटने के घंटे गिनता हूँ। सोचता हूँ ये शहरी कैसे रहते होंगे? विकास के बदले भागमभाग, हॉस्पिटल, दवाइयाँ, जिमबाजी ये सब आखिर है क्या? अगर ऐसे ही चलता रहा तो हम पूरे देश को शीघ्र ही एक मौत के गैस चेंबर में बदल देंगे। फिर क्या फायदा होगा ऐसे विकास का? खबरदार सामने मौत नजर आ रही है। बचना है तो अब केवल आखिरी वक्त बचा है।



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