अपनो के निशाने पर गहलोत सरकार
| Rainbow News Network - Nov 7 2019 1:14PM

-रमेश सर्राफ धमोरा

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपनी ही कांग्रेस पार्टी के नेताओं के निशाने पर आ रहे हैं। कुछ दिनों पहले गहलोत सरकार ने प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव में हाइब्रिड फार्मूला लागू किया था जिसको लेकर प्रदेश भर में बवाल मचा था। राजस्थान कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष व राजस्थान सरकार में उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के उस फार्मूले का डटकर विरोध किया था। परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, खाद्य आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा, सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना सहित कांग्रेस के कई विधायकों ने भी सरकार के फैसले को जन विरोधी बताते हुए पायलेट का समर्थन किया था।

सचिन पायलेट का कहना था कि कांग्रेस विधायक दल की बैठक में या केबीनेट की मिटिंग में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया था। यहां तक कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भी इस बाबत कभी कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। ऐसे में जन विरोधी फैसले को राज्य में कैसे लागू होने दिया जा सकता है। पायलेट का कहना था कि इस फार्मूले से तो कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव लड़े ही पैसों के बल पर नगरीय निकायों का प्रमुख बन जायेगा। फिर वर्षों से पार्टी में काम करने वाले कार्यकर्ताओं का क्या होगा। उस वक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने हाइब्रिड फार्मूले का बचाव भी किया था मगर अंतत: मामला कांग्रेस आलाकमान के पास दिल्ली तक पहुंचा और अशोक गहलोत को अपना हाइब्रिड फार्मूला वापस लेकर फिर से चुने गए पार्षदों में से ही नगरीय निकायों के अध्यक्ष बनाने का नियम लागू करना पड़ा था।

हाल ही में गहलोत सरकार ने भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश में सडक़ों पर चलने वाले निजी वाहनों को टोल टैक्स से दी गई छूट को वापस लेने का निर्णय किया है जिसका भी कांग्रेस सहित सभी दलों में विरोध हो रहा है। नगरीय निकायों के चुनाव से पूर्व टोल टैक्स लागू करने के फैसले का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। टोल टैक्स को फिर से लागू करने के फैसले का भी गहलोत ने बचाव करते हुए कहा है कि टोल टैक्स की छूट निजी वाहन चलानेवालों को को दी जा रही थी जो टैक्स टोल टैक्स चुकाने में सक्षम है। भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार द्वारा टोल टैक्स में दी गई छूट नियम विरुद्ध है। इसलिए राज्य सरकार ने इसे फिर से लागू करने का फैसला किया है।

इसी तरह अक्टूबर 2018 में वसुंधरा राजे सरकार ने प्रदेश के किसानों को उनके कृषि कुओं के बिजली बिलों में 833 रूपये प्रतिमाह का अनुदान देना का निर्णय किया था। जिस में भी अब बिजली कंपनियों के अधिकारी दिक्कत पैदा करने लगे हैं। बिजली विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कृषि उपभोक्ता पहले बिजली का पूरा बिल चुकाये फिर अनुदान की राशि उसके बैंक खाते में भेजी जायेगी। उपभोक्ता के खातों में जमा कराने के नियम से प्रदेश के आधे से अधिक किसान इस छूट का लाभ नही उठा पायेगें। प्रदेश में कई किसानों के भूमि का नामांतरण नहीं हुआ है तो कई किसानों के आपस में पारिवारिक विवाद चल रहे हैं। इसलिए एक साथ बैंक खाता नहीं खुल सकता है। इसमें किसानों को विभिन्न तरह की समस्या आ रही है। किसान संगठनों का कहना है कि पूर्व की भाजपा सरकार ने किसानों को मिलने वाले अनुदान को बिजली बिलों में ही समायोजित करने का जो फैसला किया था उसे ही बरकरार रखना चाहिए। बैंक खाते में अनुदान की राशि जाने से काफी किसानो को परेशानी उठानी पड़ेगी। अधिकतर किसानो का सामूहिक कृषि कनेक्शन है। कई कृषि कनेक्शन मृतको के नाम से ही चल रहे हैं उनका अभी तक नामान्तरण दर्ज नहीं हो पाया है। ऐसे में उनको अनुदान से वंचित रहना पड़ सकता है।

राजस्थान रोडवेज ने प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन करीब 2 लाख किलोमीटर रूट पर बसों के परिचालन में कटौती कर दी है। जिससे गांव में परिवहन सेवा की पहुंच कम हो गई है। जिसका असर आम ग्रामीण पर पड़ रहा है। इससे गांवों के लोगों को आवागमन के साधनों की कमी महसूस होने लगी है। प्रदेश सरकार के इन फैसलों का सीधा असर गांव के गरीब, किसान, मजदूरों पर पड़ रहा है। प्रदेश में खनन माफिया पुलिस, प्रशासन पर भारी पड़ रहा हैं। प्रदेश भर में अवैध खनन जोरों पर हैं। खनन माफियाओं का दुस्सास इतना बढ़ गया है कि वह सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों पर भी हमला करने से नहीं चूक रहे हैं। पत्थर, रोड़ी, बजरी की ठेकेदारों द्धारा मनमानी कीमत वसूली जा रही है। प्रतिबंधित क्षेत्र में भी खनन का कार्य धड़ल्ले से जारी है।

बसपा से कांग्रेस में आए 6 विधायकों का विधायक दल में तो विलय हो गया है लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी कलह की वजह से अभी तक उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय में विधिवत रूप से कांग्रेस की सदस्यता नहीं प्रदान की गई है। जबकि उनको कांग्रेस में शामिल करने से पूर्व इस बात का वायदा किया गया था कि उन्हें सम्मान के साथ कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। उनमें से कुछ विधायकों को मंत्री व कुछ विधायकों को विभिन्न निगम बोर्ड का अध्यक्ष बनाया जाएगा। लेकिन उनके साथ किया वायदा भी अभी अधर झूल में लटका हुआ है। मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की मांग भी लंबे समय से चल रही है लेकिन अभी तक उस पर भी कोई निर्णय नहीं हो पाया है। प्रदेश में सत्ता व संगठन के गतिरोध के कारण विभिन्न निगम, बोर्ड, आयोग में गैर सरकारी सदस्यों,अध्यक्षों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है।

हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव व राजस्थान के प्रभारी अविनाश पांडे ने जयपुर के एक निजी होटल में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलेट के बीच सुलह कराने के उद्देश्य से लम्बी चर्चा की लेकिन उसके अभी कोई नतीजे सामने नहीं आयें है। उस मीटिंग में बसपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले पांच विधायकों से भी फेस टू फेस चर्चा की गई थी। उनकी शिकायत थी कि कांग्रेस ने उनसे किया वादा अभी तक पूरा नहीं किया है।

राजस्थान में विधानसभा की दो सीटो मंडावा व खींवसर के उपचुनावों में में कांग्रेस ने मंडावा सीट तो जीत ली मगर कांग्रेस के दिग्गज नेता हरेंद्र मिर्धा खींवसर सीट पर सांसद हनुमान बेनीवाल के भाई नारायण बेनीवाल के हाथों से हाथों पराजित हो गए। कांग्रेस की आपसी फूट मिर्धा की हार की प्रमुख वजह मानी जा रही है।

प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर हो रही है। आए दिन जगह-जगह बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं। कांग्रेस सरकार के आने के बाद भी प्रदेश में कर्ज से परेशान होकर करीबन एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है। दिन दहाड़े सरेआम दुकानदारों को गोली मारकर लूटा जा रहा है। अपराधियों में बिल्कुल भी भय नहीं है। प्रदेश में अपराधी बेखौफ होकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं। प्रदेश की जनता भय के साए में जीने को मजबूर हो रही है। इन सब परिस्थितियों के कारण प्रदेश की आम जनता को लगने लगा है कि उन्होंने कांग्रेस को वोट देकर कहीं गलती तो नहीं कर दी है।

यदि समय रहते कांग्रेस अपने सत्ता व संगठन के झगड़े को नहीं सुलटा पाती है तो उसका खामियाजा उसे आगे आने वाले निकाय व पंचायती राज चुनाव में उठाना पड़ेगा। आगे चलकर प्रदेश में सरकार के खिलाफ एक नकारात्मक वातावरण बनेगा जो सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित होगा।



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