व्यक्तिवाद "लोकतंत्र व विकास" के लिए खतरा : गौतम
| Rainbow News Network - Nov 13 2019 2:04PM

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से एक-एक कर सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमतर दिखाने का जो प्रयास हो रहा है वह व्यक्तिवाद की ओर बढ़ते कदम का इशारा है एवं लोकतंत्र एवं विकास के लिए खतरा. अब देशवासियों को तय करना है कि देश में व्यक्तिवाद को बढ़ावा देना है या विकासवाद को अंधविश्वास के साथ चलना है या वैज्ञानिक सोच को अंगीकार करना है.इस पर ही भारतीय लोकतंत्र का भविष्य आधारित है.आज देश में वैसे कलमकारों की कमी खल रही है जो अपनी बात मुखरता के साथ देश हित में रखते थे आज एक अलग प्रवृत्ति का जन्म हुआ है दरबारी रिपोर्टिंग जो देश की सारी समस्याओं को भुलाकर सत्ता केंद्रित हो गया है ताकि इसके बदले में पद पैसा और प्रतिष्ठा प्राप्त किया जा सके चाहे देश गर्त नहीं क्यों न चला जाए इन्हें कोई चिंता नहीं!

    व्यक्तिवाद ने विकास के मुद्दे को गोल कर दिया अब हर पल व्यक्ति विशेष की चर्चा होने लगा है,कुछ लोग उसे अच्छा बताते हैं तो बाकी अयोग्य.अब लोग शिक्षा स्वास्थ्य बिजली पानी सड़क सुरक्षा सामाजिकता भाईचारा शांति प्रेम मेल भाव गरीबी मजदूरी कृषि खनन उद्योग व्यवसाय रिक्शावाले खोमचे वाले फुटपाथ वाले पशुपालक आदि की बात नहीं हो रहा.अब सिर्फ और सिर्फ बात व्यक्ति के होने लगा है कुछ साल पहले तक परिवारवाद से बचने का नारा लगता था अब व्यक्तिवाद हावी हो गया जातिवाद और संप्रदायवाद का पकड़ जब ढीला हुआ तो उसका जगह व्यक्तिवाद ले लिया जैसे पूरे सवा सौ करोड़ भारतीयों में एक-दो व्यक्ति के पास ही भारत के नेतृत्व करने की क्षमता है.

     मुझे तो  लगने लगा है कहीं भारत नाजीवाद फासीवाद के रास्ते पर तो नहीं चल पड़ा.राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टरवाद हावी तो नहीं होने लगा.बदलाव के नाम पर विकृत सोच तो नहीं लादा जाने लगा.जब फिर से लोगों को मजबूर कर दिया जाएगा वह अपने नाम के सामने अपने जाति का जिक्र करें.अगर जातिवाद पर चोट करना है तो फिर जाति को मेंशन करना क्यों आवश्यक. विज्ञान के क्षेत्र में हम पिछड़ रहे हैं कृषि के क्षेत्र में हालत खराब है आधारभूत संरचना आज भी आधे अधूरे.सड़क गाड़ियों से अटा पड़ा है प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है पर्यावरण की चिंता नहीं नदिया मैली हो रही है पर्वतों का अस्तित्व मिटाया जा रहा है जंगल संकट में है.अस्पतालों का हाल सर्वविदित है शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो चुका है अब केवल परीक्षा पास करने के लिए और करवाने के लिए होता है.अधिक बच्चे पास हो इसके लिए बहुविकल्पीय व्यवस्था किया गया बच्चे अच्छा करें इसके लिए लघु और दीर्घ उत्तरीय सवाल नहीं दिए जाएंगे.अब सब कुछ रेडीमेड होने लगा है.

      बहुत वर्षों बाद फिर से चारों तरफ आडंबर को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि लोग शिक्षा से विमुख हो मूलभूत समस्याओं की ओर उनका ध्यान न जाए.बेरोजगारी पर बात ना हो न्यूनतम मजदूरी के बात ना हो सरकारी संस्थाओं में लोगों जाने से रोकने के लिए निजी करण को बढ़ावा दिया जा रहा है नियोजन कॉन्ट्रैक्ट पेंशन आदि की बात नहीं हो रहा सिर्फ और सिर्फ लोगों में गलतफहमी फैलाकर डर पैदा कर कभी किसी समुदाय विशेष के बारे में कभी किसी देश के बारे में और भावनात्मक रूप से देशवासियों को ब्लैकमेल कर वोट लेने की राजनीति पर काम चल रहा है.इस हालात में विकास की बात बस गोलम गोल हो गया है.संघवादी मानसिकता के कारण आज सामाजिक भेदभाव बहुत तेजी से पैर पसार रहा है अब समाज के उत्थान की बात करना भी गुनाह माना जाने लगा.

       जो लोग समाज और देश के उत्थान की बात करते हैं उन्हें विखंडन वादी सोच वाले लोग गलत ठहराने का काम करने लगते हैं.वे हर हाल में अपनी ठसक बनाए रखना चाहते हैं इन्हीं सब कारणों से विकास की बात कहीं कोने में सिसकी लेने लगा है. जिस देश में कभी विवेकानंद महात्मा गांधी सुभाष चंद्र बोस डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सरदार पटेल बी पी मंडल कर्पूरी ठाकुर जगदेव प्रसाद आदि के नाम पर चुनाव में चर्चा होता था उनके विचार पर वाद विवाद होता था लेकिन आज किन लोगों के नाम पर चर्चा हो रहा है इसी से समझा जा सकता है हम किस ओर जा रहे हैं.क्या हम समतावादी विकास की तरफ बढ़ रहे हैं या पूंजीवादी विकास की तरफ ?

      आज देश में जिस तरह से पूंजी का केंद्रीकरण कुछ मुट्ठी भर लोगों के पास हो रहा है वह क्या कह रहा है .हर महीने सुनने को मिलता है कोई सरकारी फार्म एजेंसी कंपनी किसी निजी व्यक्ति को सौंप दिया गया यह क्या हो रहा है यही विकास है ? जिस देश के निजाम चुनाव जीतने के लिए अपने प्रांतों के निजामों को भला बुरा कहता हो वहां किस बात की गुंजाइश है समझा जा सकता है अगर किसी प्रांत का निजाम गलत कर रहा है तो उसे हटा दिया जाना चाहिए ना की देश के निजाम उस प्रांत के निजाम को जलील करे.अगर वह गलत है तो उसे न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए.निजाम को अपने सारे प्रांतों के मुखिया पर एतबार करना चाहिए.

     मगर यहां क्या हो रहा है उनके द्वारा किए गए विकास को कभी महत्व नहीं दिया जा रहा बस किसी प्रकार से सत्ता हासिल हो जाए इसके लिए सरकारी धन पानी की तरह बहाया जा रहा है. वर्ष के शायद कोई ऐसा महीना ना हो जिसमें हमारे देश में किसी न किसी प्रांत में प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा यहां तक की प्रधानमंत्री और मंत्रियों द्वारा रैली नहीं किया जाता और उसमें धन को पानी की तरह बहाया नहीं जाता.वहां विकास की बात करना बेमानी नहीं तो और क्या? इसलिए मेरा मानना है कि विकास के लिए व्यक्तिवाद परिवारवाद जातिवाद धर्म और संप्रदाय वाद संघवाद विखंडन वाद से सर्वप्रथम छुटकारा पाना होगा,और सामाजिक राष्ट्रवाद के साथ विकास का नारा बुलंद करना होगा.


-गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम 
देवदत्तपुर दाउदनगर औरंगाबाद बिहार 
व्हाट्सएप नंबर 95 07 341 433
सामाजिक और राजनीतिक चिंतक



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