नवभारत के पोषणहार थे चाचा नेहरू
| Rainbow News Network - Nov 15 2019 1:22PM

स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू को दुनिया आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में याद करती है.स्वतंत्रता उपरांत जो विखंडित भारतीय धरा,गरीबी और बेकारी से त्रस्त लोग मिले थे उन्हें बहुत ही जतन के साथ सजा संवार कर नेहरू ने आधुनिक एवं संगठित भारत के नीव डाली थी.यही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के लड़ाई में भी नेहरु जी ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.भारत को विदेशी दासता से मुक्ति दिलाने के लिए नेहरू और और उनके परिवार ने अनेकों कष्ट सहे थे!

15 अगस्त 1947 को अंग्रेज देश छोड़कर चले तो गए और भारत भी स्वतंत्र हो गया,पर भारत से जाते जाते अंग्रेज देश दो भागों में बांटने के अलावे सामाजिक  राजनीतिक  लोकतांत्रिक  एवं आर्थिक रूप से पूरी तरह खोखला बनाकर गए.संसाधनों के भीषण अभाव के बीच देश को एक बार फिर नए सिरे से सोने की चिड़िया बनाने की जिम्मेवारी नेहरू और उनके सहयोगियों पर आन पड़ी थी जिसमें सारा देश उनका साथ निभा रहा था.आधुनिक भारत के निर्माण के सामने हिमालय जैसी चुनौती मुँह बाए खड़ी थी, लेकिन इन तमाम चुनौतियों एवं परेशानियों के बीच भारतीय प्रधानमंत्री पंडित ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और भारतीय समाज एवं  देश के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक एवं भौगोलिक बनावट के  बारे में  बेहतरीन सूझबूझ रखने के कारण नेहरू देश को प्रगति के मार्ग पर लाने में केवल सफल ही नही हुये बल्कि उसे दुनिया के अन्य विकासशील देशों के अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया!

नेहरू हमेशा शांति पूर्वक काम करने में विश्वास करते थे उनका मानना था देश के विकास समावेशी तरीके से ही किया जा सकता है ताकि वह टिकाऊ हो और जिसमें संपूर्ण भारतवर्ष के निवासियों का सहयोग प्राप्त हो ताकि उन्हें लग सके कि आधुनिक भारत के निर्माण में हमारी भी अहम भागीदारी है.विकास का ढोल पिटे बिना ही उन्हीने देश का चहुमुखी विकास किया!देश को भुखमरी की हालत से निकाल कर आत्मनिर्भर बनाया.इसके लिए देश मे अनगिनत कल कारखाने खुलवाये,कई नीतिगत फैसला लिए कृषि बागवानी पशुपालन आदि तमाम क्षेत्रों को उन्होंने समृद्ध किया.

अंग्रेजों को भारत छोडने के अंतिम वक्त तक यह अटूट विश्वास था कि भारत अपनी आजादी को ज़्यादा दिन संभाल नही पायेगा, और अंततः उसे फिर से अंग्रेजों के सहयोग की जरूरत पड़ेगा,परन्तु जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल  एवं उनके अन्य सहयोगियों के कुशल नेतृत्व ने अंग्रेजों के इस मंसूबों पर पानी फेर दिया और पूरे विश्व को दिखा दिया कि भारत स्वयं अपना भाग्य का निर्माता है और  भारत अपने सूझबूझ आंतरिक संसाधन बेहतर समन्वय और देशवासियों के मेहनत के बल पर ही वैश्विक जगत मे अपना महत्वपूर्ण मुकाम फिर से हासिल कर सकता है.
अपनी इस्पाती इच्छा शक्ति के लिए जाने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 500 से अधिक देश रियासतों को एक साथ मिलाकर भारतीय संघीय गणराज्य का निर्माण किया जिसके सूत्रधार नेहरू थे.
दूसरी ओर प्रधानमंत्री के रूप में प. नेहरू ने देश को ज्ञान-विज्ञान, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी एवं  जानकारियों से लैस कर भारत को विश्व के उन्नत देशों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया.

दुर्भाग्य वश, कुछ लोग पंडित नेहरू के उपलब्धियों को नकारने का प्रयास करते हैं पर उन्हें मालूम नहीं पंडित नेहरू के उपलब्धियों को नकारने का मतलब हिमालय के ऊंचाई से कूदकर आत्महत्या करने के बराबर है.जिस तरह से हिमालय को कभी मिटाया नहीं जा सकता उसी तरह से आधुनिक भारत एवं भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के विकास में दिए गए नेहरू के योगदान को मिटाया नहीं जा सकता. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू के समन्वयकारी प्रवृत्ति अंतरराष्ट्रीय समझ प्रगतिशील सोच समाजवादी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने के कारण ही  विश्वास जताते हुए  स्वतंत्र भारत की बागडोर  सौंपा था.

आज़ कुछ लोग नेहरू जी की तुलना सरदार वल्लभ भाई पटेल जी से करते हैं और उन्हें कमतर बताते हुये इस बात पर जोर देते हैं कि जवाहरलाल नेहरू की जगह यदि सरदार पटेल देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने होते तो देश को उन ढ़ेर सारी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, जिनका सामना आज़ उसे करना पड़ रहा है. पर यह आरोप नितांत बेबुनियाद है क्योंकि उस वक्त के परिस्थितियों के अनुसार जो फैसला लिया गया था वह सर्वश्रेष्ठ फैसला था.आज जब परिस्थितियां बदल गई हैं तो हम सबके देखने का दृष्टिकोण बदल गया है अन्यथा उस वक्त की जैसी परिस्थितियां थी उसके अनुरूप हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के महारथियों ने और स्वतंत्र भारत के बागडोर संभालने वाले महान लोगों जिसमें राजनेता अधिकारी वैज्ञानिक अभियंता प्रबंधक कर्मचारी साहित्यकार बुद्धिजीवी एवं करोड़ों जागरूक एवं मेहनती भारतवासियों ने बखूबी अपने जिम्मेदारियों को निभाते हुए भारत को सजाया एवं संवारा जिसका नेतृत्व नेहरू जी ने किया.

राजनैतिक कारणों से आज़ यह दिखाने के प्रयास किये जा रहे हैं कि नेहरू और पटेल एक दूसरे के विरोधी थे,पर यह सच से परे है. किसी किसी मुद्दे पर दोनों कांग्रेसी नेताओ मे मत भिन्नता हो सकता है पर इसका कतई मतलब नही की ये आपसी एक दूसरे के प्रतिद्वंदी या विरोधी थे.वास्तविकता यह है कि देश के निर्माण में सरदार पटेल और नेहरू की भूमिका दो शरीर एक आत्मा के समान था.वे एक दूसरे के विरोधी नही बल्कि ताउम्र एक दूसरे के पूरक रहे. जवाहरलाल नेहरू जी आदर्शों, विचारों और वैश्विक दृष्टिकोण से ओत-प्रोत व्यक्ति थे जबकि सरदार वल्लभ भाई पटेल कांग्रेस के संगठन और देश की आंतरिक व्यवस्था के बारे में गुढ समझ रखने वाले नेता थे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बहुत सोच समझकर ही नेहरू जो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था.विश्वयुद्ध के बाद दुनिया तेजी से  बदलाव की ओर अग्रसर था  उस दौर में देश को वैश्विक दृष्टि से परिपूर्ण नेता की ज़रूरत थी,जिसमें नेहरू जी सर्वमान्य थे.

एकबार किसी व्यक्ति ने नेहरू जी से कहा कि पटेल जी ने आपके विषय में कुछ तीखी टिप्पणी की है, इसपर तड़के जवाब दिया कि "तो क्या हुवा ? वे मेरे बड़े भाई हैं" उन्हें मुझपर व्यंग करने का पूर्ण हक प्राप्त है.1948 में नेहरू जी के जन्मदिन पर पटेल जी ने लिखा था : "अनेक प्रकार के कार्यों में साथ रहने के कारण और एक दूसरे को अंतरंग रूप से जानने के कारण हमारे बीच का स्नेह प्यार बढ़ता गया है  इस परिपक्वता, निकटता, अंतरंगता और भ्रातिभाववत स्नेह के कारण उनकी (नेहरू) उपलब्धियों का लेखा जोखा करना मेरे लिए मुश्किल है!देश के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक प्रगतिशील भारतीय समाज के जननेता के रूप में नेहरू जी की उपलब्धियों को कभी कम करके आंका नहीं जा सकता है.

उन्होंने अपने दौर में बेहतरीन कार्य संपादित किया.देश को अनेक अंतरराष्ट्रीय स्तर के औद्योगिक वैज्ञानिक शोध सामाजिक सांख्यिकी  बैंकिंग प्रणाली डाकघर प्रणाली संचार संसाधन  प्रबंधकीय रक्षा अंतरिक्ष विज्ञान प्रौद्योगिकी न्यायिक संस्थान स्वतंत्र मीडिया स्वास्थ्य एवं शैक्षणिक संस्थान प्रदान किए साथ ही सबसे बढ़कर देश को एक ऐसा सर्वोच्च स्तरीय संविधान प्रदान किया जिसके बदौलत आज भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य एवं देश के रूप में याद किया जाता है.उस वक्त उनके पास जो भी सीमित संसाधन मौजूद थे उसके अनुरूप उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ भारतीय वसुंधरा को लौटाया जिसके लिए युग युग तक भारत उनका ऋणी रहेगा.



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