न्यायिक सक्रियता से ही रूकेगी सीवर में होने वाली मौत
| Rainbow News Network - Nov 18 2019 3:01PM

राजस्थान में सीकर जिले के फतेहपुर में सीवरेज की खुदाई के दौरान हुई तीन मजदूरों की मौत के मामले में वहां के अपर जिला एवम सेशन न्यायाधीश शिवप्रसाद तम्बोली ने कुछ दिनो पूर्व ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने इस मामले में कंपनी के इंजीनियर सहित तीन लोगों को गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुये दस-दस साल के कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने माना कि काम कर रहे मजदूरों के लिए सुरक्षा का इंतजाम करना कम्पनी और ठेकेदार की जिम्मेदारी थी। कोर्ट ने माना कि उस दिन कम्पनी की ओर से सीवरेज का काम किया जा रहा था और सुरक्षा संबंधी उपाय नहीं करने के कारण तीन मजदूरों को जान गंवानी पड़ी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ समय पहले हाथ से मैला साफ करने के दौरान सीवर में होने वाली मौतों पर चिंता जताने के साथ ही सख्त टिप्पाणी की थी। देश के सबसे बड़े कोर्ट ने कहा था कि देश को आजाद हुए 72 साल से अधिक समय हो चुका है। लेकिन देश में जाति के आधार पर भेदभाव जारी है। मनुष्य के साथ इस तरह का व्यवहार सबसे अधिक अमानवीय आचरण है। इस हालात में बदलाव होना चाहिए। जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से सवाल किया कि आखिर हाथ से मैला साफ करने और सीवर के नाले या मैनहोल की सफाई करने वालों को मास्क व ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण क्यों नहीं मुहैया कराई जाते हैं? दुनिया के किसी भी देश में लोगों को गैस चैंबर में मरने के लिये नहीं भेजा जाता है। इस वजह से हर महीने चार से पांच लोगों की मौत हो जाती है। कोर्ट ने कहा संविधान में प्रावधान है कि सभी मनुष्य समान हैं लेकिन प्राधिकारी उन्हें समान सुविधाएं मुहैया नहीं कराते।

पीठ ने इस स्थिति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई करने वाले लोग सीवर और मैनहोल में अपनी जान गंवा रहे हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि देश में नागरिकों को होने वाली क्षति और उनके लिए जिम्मेदार लोगों से निपटने के लिये अपकृत्य कानून बना नहीं है। ऐसी घटनाओं का स्वत: संज्ञान लेने का मजिस्ट्रेट को अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सडक़ पर झाड़ू लगा रहे या मैनहोल की सफाई कर रहे व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला दायर नहीं किया जा सकता, लेकिन ये काम करने का निर्देश देने वाले अधिकारी या प्राधिकारी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में कुछ दिनो पूर्व सीवर टैंक की जहरीली गैस की चपेट में आने से 5 लोगों की मौत हो गई थी। कुछ माह पूर्व गुजरात के वड़ोदरा जिले के डभोई तहसील में एक होटल की सीवेरेज टैंक साफ करने उतरे सात मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई थी। घटना की रात सात मजदूर एक होटल की सीवरेज टैंक साफ करने के लिए उतरे थे। लेकिन टैंक सफाई के दौरान दम घुटने से उन सभी मजदूरों की मौत हो गई थी।

मई में उत्तर पश्चिम दिल्ली के एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई थी। इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आई थी कि मजदूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे। नोएडा स्थित सलारपुर में सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी। गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर जिले के पालमनेरू मंडल गांव में एक गटर की सफाई करने के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से सात लोगो की मौत हो गयी थी। देश के विभिन्न हिस्सो में हम आये दिन इस प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित खबरें समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं।

देश के विभिन्न हिस्सो में पिछले एक वर्ष में सीवर की सफाई करने के दौरान 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत हो चुकी है। इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं। इस कारण इनके मरने पर कहीं विरोध दर्ज नहीं होता है। देश में 27 लाख सफाई कर्मचारी हैं जिसमें 20 लाख ठेके पर काम करते हैं। एक सफाईकर्मी की औसतन कमाई 6 से 10 हजार रुपये प्रति माह होती है। आधे से ज्यादा सफाई कर्मी अनेको बिमारियों से पीडि़त होते हैं। इस कारण 90 फीसदी गटर-सीवर साफ करने वालों की मौत 60 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाती है। इस कार्य को करने वालों के लिये बीमा की भी कोई सुविधा नहीं होती है। कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजेंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से सम्बंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, नियमित प्रशिक्षण के नियम का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।

सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर, गंदी हवा को बाहर फेंकन के लिए ब्लोअर, टॉर्च, दस्ताने, चश्मा और कान को ढंकन का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवश्यक है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है। दिनों दिन सीवर लाइनों की लंबाई बढ़ रही है वहीं मजदूरों की संख्या में कमी की जा रही है। गटर की सफाई करने वालो की मौत होने के साथ ही उनपर निर्भर उनका परिवार भी बेसहारा हो जाता है। परिवार की आमदनी का स्रोत अचानक से बंद हो जाता है। देश में जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान प्रतिवर्ष दम घुटने से काफी लोग मारे जाते हैं। इससे पता चलता है कि हमारी गंदगी साफ करने वाले हमारे ही जैसे इंसानों की जान कितनी सस्ती है। सीवर सफाई के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना पड़ता है।

आमतौर पर सीवर में उतरने से पहले सफाईकर्मी शराब पीते है। शराब पीने के बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है। सफाई का काम करने के बाद उन्हें नहाने के लिए साबुन, नहाने को पानी तथा पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है। इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं इनको अभी तक नहीं मिल पा रही है। भारत में इसे प्रतिबंधित किये जाने के उपरान्त भी यह गंभीर समस्या बनी हुई है। अब देश की सर्वोच्च अदालत ने गटर की सफाई करने वालों की सुध लेते हुये सरकार की खिंचाई की है। इससे लगता है कि सफाई करने वाले इन स्वच्छता सिपाहियों के भी जल्दी ही अच्छे दिन आयेगें व सरकारी अकर्मण्यता से होने वाली उनकी असामयिक मौत पर रोक लग पायेगी।



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