घुटती सांसें...
| Rainbow News Network - Nov 19 2019 2:36PM

-प्रियंका माहेश्वरी

सिर्फ खबरों के हवाले से नहीं वरन रूबरू देखा और महसूस किया है मैंने इलाहाबाद, झारखंड और लखनऊ में फैले हुए प्रदूषण को। पूरा दिन बदली बदली का मौसम और आसमान में एक धुंध सी छाई हुई। पहले मुझे लगा कि मौसम बदल रहा है और यह सुबह के वक्त का कोहरा है लेकिन काफी वक्त बीत जाने के बाद भी जब यह धुंध बनी रही तो महसूस हुआ कि यह कोहरा नहीं बल्कि जहरीली हवा है जिसे हम झेलने के लिए मजबूर है। मेरे दिमाग में तुरंत दिल्ली का ख्याल आया कि वहाँ तो इससे भी बुरा हाल है, जहां पर लोग मास्क लगाए हुए घूम रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किसी को जानकारी नहीं है आज के वातावरण की या यूं कहिए कि यह प्रदूषण क्यों फैल रहा है इससे लोग अनभिज्ञ हैं फिर भी हम इसे झेल रहे हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि अब सिर्फ बातों का नहीं बल्कि काम करने का समय आ गया है ताकि आने वाले वक्त में हम बिना मास्क के खुली हवा में सांस ले सकें। किसानों को पराली जलाने के लिए दोष नहीं दिया जा सकता है। सरकार को उसकी व्यवस्था करनी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक को फटकार लगाई है और प्रशासन व्यवस्था को गैर जिम्मेदार ठहराया है साथ ही पराली जलाने वाले किसानों के साथ सहयोग देने की बात भी कही है लेकिन जिस तरह के बुरे हालात हैं उसके मद्देनजर कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

दिल्ली के बुरे हालातों से आज कोई भी अनजान नहीं है हर साल इस प्रदूषण के चलते लाखों मौतें हो जाती हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के हवाले से दुनिया के 10 सबसे बड़े प्रदूषित शहरों में छह शहर भारत के ही हैं और भारत के किसी भी शहर में सेंट्रल प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है और आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत में सिर्फ चार शहर ही ऐसे हैं जहां एयर क्वालिटी इंडेक्स 50 से कम है मतलब सांस ले सकने योग्य स्वस्थ वातावरण। अन्य जानकारियों के अनुसार संयुक्त राष्ट्र समिति आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया को घेर रही इस आपदा से निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकना ही काफी नहीं है। इसके लिए खेती में बदलाव की जरूरत है, शाकाहार को बढ़ावा देना चाहिए और जमीन का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 23 फ़ीसदी कृषि योग्य भूमि खत्म हो चुकी है और भूमि का रेगिस्तानीकरण जारी है और भारत में तो यह 30 फ़ीसदी भूमि के साथ हुआ है। जलवायु परिवर्तन, कीटनाशक दवा और रासायनिक खादों की वजह से लगातार पैदावार में गिरावट आ रही है और खाद्य पदार्थों में से पोषक तत्व कम होते जा रहे हैं साथ ही गुणवत्ता में भी कमी आ रही है। यह जलवायु परिवर्तन, बढ़ता हुआ पारा, अत्यधिक ठंड हमें कठिन समय देखने के लिए मजबूर कर सकता है और भारत जैसे बड़े द्वीप के लिए तो बड़ी समस्या बनकर उभर सकता है। बेमेल मौसम के कारण हर साल बहुत सी जाने चली जाती हैं। और तो और मौसम विशेषज्ञ सलाहकार भी हैं जो इन कठिन समय में इस समस्या के लिए कोई सलाह नहीं दे पा रहे हैं। इसका समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं।

आंखों में जलन, खांसते हुए मास्क लगाए हुए चेहरों को इस घुटन से निजात पाने के लिए दृढ़ निश्चय और एक मजबूत कोशिश की जरूरत है ताकि स्वस्थ सांस लेने में किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सके। जरूरत है कठोर निर्णय की और इनके कार्यपालन की साथ ही जिम्मेदारी तय करने की। यदि समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया तो इस समस्या से छुटकारा संभव नहीं। मुख्य बात यह भी है कि वाहनों की संख्या भी इसकी जिम्मेदार है। दिनोंदिन वाहनों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वाहनों से निकलता धुंआ, कंपनियों की चिमनियों से निकलता हुआ धुंआ वातावरण को दूषित कर रहा है। सरकार द्वारा इन पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है।



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