अजनबी हम अजनबी तुम
| -Priyanka Maheshwari - Nov 25 2019 12:13PM

"मयूर, मैं लाइब्रेरी जा रही हूं, तुम भी वहीं आ जाना। मुझे एक दो किताबें लेनी है। किताबें लेकर फिर साथ में चलेंगे"। फोन पर दीपा ने मयूर से कहा।
"कितने बजे निकलोगी?" मयूर ने पूछा।
"मैं एक बजे के आसपास निकलूंगी" दीपा बोली।
"ठीक है,  मैं पहुंचता हूं वहां पर"। यह कहकर मयूर ने फ़ोन काट दिया। निश्चित समय पर मयूर लाइब्रेरी में मेरे पास आ गया और बुक ढूंढने में मेरी मदद करने लगा। "तुम कभी भी बुला लेती हो, समय नहीं रहता है मेरे पास  कि किसी भी वक्त आ जाऊं तुम्हारे पास, आज शनिवार है और काम का लोड कम है तो आ गया"। मयूर जरा संजीदा होकर बोला।
"पता है मुझे कि तुम्हारे पास समय नहीं है यह तो रोज का रोना है, चलो अच्छी बात है कि आज काम कम है तो आज कोई मूवी देख आएं,  वैसे भी आज मेरी कुकिंग क्लास नहीं है तो आज मैं फ्री हूं"। दीपा बोली।
"अभी, इस समय" मयूर सोचने लगा। "इससे अच्छा तो किसी रेस्तरां में खाना खाने चलते हैं कल संडे है कल चलेंगे मूवी" मयूर ने कहा।
"ठीक है, पर दोपहर का शो। अब चलो किसी होटल में वहां कुछ देर बैठते हैं"। दीपा ने कहा।
"अरे बैठने के लिए होटल जाने की क्या जरूरत है, पार्क ही बहुत है, वहीं पर चल कर बैठते हैं, वहां पर चनाजोर गरम वाला भी मिल जाएगा, सिर्फ बैठने के लिए होटल में इतना खर्च क्यों करें, पार्क में सस्ते में निपट जाएगा"। मयूर दीपा को चिढ़ाते हुए बोला।
"कंजूस कहीं के इतना पैसा बचाकर क्या करोगे? मुझे होटल ही जाना है"। दीपा ने बनावटी गुस्से से कहा। फिर दीपा का हाथ थामकर मयूर गाड़ी में बैठा और मॉल की ओर बढ़ गये दोनों।
मॉल में कुछ देर तो वो दोनों घूमते रहे फिर फूडजोन में जाकर बैठ गए। कुछ देर इधर-उधर की बातें होती रही फिर दीपा ने पूछा कि "तुम्हारे पास कब समय है? पापा- मम्मी से मिलवाना है तुम्हें"।
"क्यों?" मयूर ने सवालिया नजरों से पूछा।
"क्यों क्या, हम कब तक इस तरह मिलते रहेंगे, किसी दिन कोई देख ले उससे अच्छा तो घर में सबसे मिलवा दूं तुम्हें"। दीपा ने कहा।
"तुमने आगे का क्या सोचा है?  मतलब पढ़ाई पूरी करने के बाद जॉब वगैरह?" मयूर ने पूछा।
"हां, एक कालेज में एप्लाई किया है लेक्चरर पोस्ट के लिए, देखो क्या होता है। तुम पहले मेरी बात का जवाब दो"। दीपा ने कहा।
"ठीक है, मिलवा दो कल सुबह आ जाता हूं मैं"। मयूर बोला।
"ठीक है, नाश्ते के समय तुम्हारा वेट करूंगी"। दीपा ने कहा।
अगले दिन दस बजे के करीब मयूर दीपा के घर पहुंचा। दरवाजा दीपा ने ही खोला। दीपा का मन बहुत घबराया हुआ था कि पता नहीं घर में मम्मी - पापा कैसा रिएक्ट करेंगे। उसने मयूर को बिठाया तभी दीपा की मां लिविंग रूम में आई और पूछने लगी कि यह कौन है। दीपा ने मां से मयूर का परिचय करवाया और बताया कि मयूर डीएवी कॉलेज में प्रोफेसर है। दीपा के पिताजी ऑफिस जाने की तैयारी में थे बाहर आकर वो मयूर को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे। दीपा ने जिस तरह अपनी मां से परिचय करवाया उसी तरह अपने पिताजी से भी मयूर का परिचय करवाया।
"हां... तो"?  पिताजी ने दीपा की तरफ देखकर कहा। दीपा क्या बोले उसे कुछ समझ में नहीं आया। मयूर ने बात आगे बढ़ाई "हम दोनों एक दूसरे को दो सालों से जानते हैं और अब.... शादी करना चाहते हैं"। यह कहकर मयूर ने बात खत्म की।
पिताजी ने दीपा की ओर देखा तो दीपा ने नजरें झुका ली। पिताजी ने मयूर के घर परिवार के बारे में पूछताछ की और कहा कि "अपने पापा से मिलवा दो मुझे"। मयूर ने हामी भर दी और कुछ दिन में अपने पैरेंट्स से मिलवाने का वादा किया। मयूर दीपा के मां - पिता को प्रणाम करके कॉलेज के लिए निकल गया।
एक हफ्ते के अंतराल से मयूर ने दीपा के माता-पिता को अपने माता पिता से मिलवाया। औपचारिक बातों के बाद दीपा के पिताजी ने बात आगे बढ़ाई, "भाईसाहब बच्चे एक दूसरे को काफी समय से जानते हैं और शादी की इच्छा रखते हैं, अब बच्चे जिसमें खुश रहे उसमें मैं भी खुश हूं अब आप रजामंदी दे देते तो बात आगे बढ़े"। दीपा के पिताजी ने कहा।
"देखिए वह सब तो ठीक है, बच्चे तो नासमझ होते हैं, जवानी में गल्तियां कर बैठते हैं, समाज के ऊंच नीच की जानकारी नहीं होती उन्हें, उसे सुधारना हमारा काम है, अगर हमने अपने जात समाज से बाहर शादी कर दी तो चार बातें होने लगेंगी और इतनी इज्जत जो बरसों में कमाई है वह मिट्टी में मिल जाएगी, इसलिए मैं तो इस शादी के लिए राजी नहीं हूं"। मयूर के पिताजी ने टका सा जवाब दिया।
दीपा के पिताजी अवाक रह गए। वह सोचने लगे कि अभी भी इंसान कितना रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है। वह कुछ नहीं बोले और घर वापस आ गये।
दीपा के पिताजी सोचने लगे कि व्यक्ति कितना भी शिक्षित क्यों ना हो ले, सामाजिक क्यों ना हो ले लेकिन विचारों से संकीर्णता नहीं जाती। लोगबाग जात पात से बाहर नहीं आना ही नहीं चाहते।
मयूर ने एक दो बार अपने पिताजी को मनाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी जिद पर अड़े रहे। वह मायूस हो गया अब उसके पास एक ही पर्याय था कि वह दीपा को भूल जाए या फिर अपने पिता से नाता तोड़कर दीपा से शादी कर ले, मगर वह अपने पिता का दिल नहीं दुखाना चाहता था। उसने दीपा से मिलना और बातचीत करना छोड़ दिया लेकिन मन ही मन घुटता जा रहा था। उसने अपने आप को काम में बहुत व्यस्त कर लिया ताकि मानसिक परेशानियों से दूर रह सके।
बीतते वक्त के साथ दीपा की शादी हो गई और वो अपने ससुराल चली गई। मयूर ने खुद को काम में व्यस्त कर लिया था। धीरे-धीरे सब अतीत की परछाई बनते जा रहा था, मगर अक्सर उसे दीपा की याद आ ही जाती थी।
मयूर का दोस्त दीपक जो उसके हर सुख दुख का साथी था वो उसे अकेला नहीं छोड़ता था। अक्सर उससे मिलने आता रहता था। दीपक ने मयूर को फोन किया और पूछा कि , "इस संडे  क्या कर रहे हो?"
"क्यों क्या है इस संडे को?" मयूर ने जवाब देने के बजाय वापस सवाल किया।
"कुछ नहीं, फ्री हो तो शाम को एक रेस्तरां में चलेंगे, सुना है कि वहां का खाना बहुत अच्छा है तो मैं सोच रहा था कि क्यों ना इसी संडे को चला जाए"। दीपक ने कहा। 
"ठीक है, चलते हैं संडे को, वैसे भी संडे छुट्टी होती है"। फाइलों के गट्ठे को जमाते हुए मयूर ने हामी भरी।
संडे की आलस भरी सुबह। मयूर जरा देर से ही उठता था यही दिन होता था जब वह घड़ी के कांटे के साथ नहीं चलता था। मयूर चाय की चुस्कियों के साथ अखबार की सुर्खियों पर नजर घुमा रहा था। जल्दी ही फ्रेश होकर नाश्ते की टेबल पर बैठ गया। वो अपनी दिनचर्या के बारे में सोच रहा था कि दोपहर तक फ्री हो जाऊंगा फिर आराम करूंगा, यही एक दिन होता है जब पूरे हफ्ते की थकान उतरती है।
ऑफिस पहुंचकर मयूर जल्दी-जल्दी काम निपटाने लगा। ज्यादा काम नहीं था इसलिए टेंशन नहीं थी। एक बजे के करीब वो फ्री हो गया और उसने दीपक को फोन किया कि, "चलो आज साथ में खाना खाते हैं घर पर आ जाओ"। दीपक उस समय व्यस्त था बोला, "शाम को मिलते हैं, पक्का"।
मैंने कहा, "ठीक है" फिर घर के लिए निकल गया और खाना खाकर सो गया। शाम होते-होते दीपक का फोन आ गया बोला, "चलो मार्केट चलते हैं कुछ खरीदी करनी है"।
मैंने कहा कि, "घर आ जाओ, जब तक मैं तैयार हो जाता हूं"। आधे घंटे में दीपक हाजिर हो गया और हम दोनों बाहर चल दिए पीछे से पिताजी की आवाज आ गई, "समय पर घर आ जाना, बहुत देर तक रात को बाहर मत रहा करो"। मैं जरा चिड़चिड़ा हो गया और बड़बड़ाने लगा कि "अभी भी बच्चा ही समझते हैं जैसे गोद में खेलता हूं।" दोनों गाड़ी में बैठे और मार्केट के लिए निकल गए।
"काफी समय हो गया था मैंने अपने लिए कपड़े नहीं खरीदे थे, समय ही नहीं मिल पा रहा था इन दिनों। चलो अच्छा हुआ तुम साथ आ गए हो तो खरीदना हो जाएगा। दीपक ने कहा।
मयूर ने कहा , "हूं, सोच रहा हूं कि मैं भी एक दो शर्ट ले ही लूं, अच्छी मिल रही है"। फिर मयूर ने भी अपने लिए दो शर्ट खरीदी।
माल में उन्हें घूमते घूमते रात के आठ बज गए और अब उन्हें भूख भी लगने लगी थी। मयूर ने कहा कि, "अरे दीपक तुमने बताया था ना कि कोई नया रेस्तरां खुला है, तुम वहां के खाने की तारीफ कर रहे थे, चलो वहीं चलते हैं खाने के लिए, अब कुछ कुछ भूख भी लगने लगी है"। 
दीपक बोला, "हां चलो, वहीं चलते हैं" और दोनों होटल पहुंच गए। बीच बाजार में एक छोटा सा रेस्तरां था। जहां बहुत भीड़ थी। एसी वाले केबिन में जाकर दोनों बैठ गये और खाने का आर्डर देने लगे।
बगल में ही होटल के मैनेजर का केबिन था जो कि कांच की दीवार का बना होने के कारण दूसरी तरफ का सब साफ-साफ दिखाई दे रहा था। मैनेजर की कुर्सी पर जो बैठी थी मयूर उसे देखते ही सकते में आ गया। वह दीपा थी। बेसुध सा वह अपनी जगह से उठा और सीधा दीपा के केबिन की ओर चला गया।
पीछे से दीपक ने आवाज दी, "मयूर कहां जा रहे हो? सुनो तो मयूर!" मगर मयूर को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मयूर केबिन  में दाखिल हो गया और बोला, "दीपा!"
दीपा जो एक फाइल में बिजी थी उसने सिर उठा कर देखा तो अचकचा गई और कुछ देर तक पलकें झपकाना भूल गई।
मयूर ने फिर से पुकारा, "दीपा!" अब वो जरा संभल कर बोली, "जी कहिए!"
मयूर ने पूछा, "कैसी हो दीपा?" मयूर लगातार उसे ही देखे जा रहा था या शायद उसे पढ़ने की कोशिश कर रहा था।  "ठीक हूं" दीपा ने जवाब दिया। "आपको कुछ काम है तो बोलिए"। दीपा अपने चेहरे को भावहीन बना कर बोली। "हां, तुमसे काम है जरा सा समय दोगी क्या? कुछ बात करनी है"। मयूर बोला।
"मयूर जो कहना है कहो"। दीपा ने कहा। मयूर बैठ गया और वो सोचने लगा कि बात कहां से शुरू करूं।  फिर वो बोला कि "तुम यहां कैसे? तुम यहाँ अकेली हो या तुम्हारा परिवार भी तुम्हारे साथ यहां आया है?"
दीपा अब तक संभल चुकी थी बोली, " यहाँ पर्सनल बातें नहीं की जाती है अगर आपको कोई शिकायत हो होटल की खाने से या किसी बात से तो हम आपकी सहायता करेंगे"।
मयूर बोला, "अब तक नाराज हो?"
दीपा कुछ बोली नहीं उसका चेहरा कठोर हो गया।
मयूर ने फिर पूछा, "कैसी हो दीपा?"
"एक साथ इतने सारे सवाल मैं ठीक हूं तुम्हारी बताओ तुम ने शादी की कि नहीं?" दीपा ने पूछा।
मयूर शांत भाव से बोला "अब उल्टा सवाल कौन कर रहा है मैं या तुम"? दोनों मुस्कुरा दिए फिर मयूर बोला, "शादी नहीं की, मन ही नहीं हुआ तुम्हारे जाने के बाद... बस बच्चों को पढ़ाने और ऑफिस के काम में ही दिन निकल जाता है। कभी काव्य गोष्ठी में बिजी रहता हूं तो कभी सोशल वर्क मैं बिजी रहता हूं। बस कट रही है, तुम बताओ अपनी। मयूर बोला
"कुछ नहीं जैसी थी वैसी ही अब भी हूं,  यहां आ गई हूं काम करने।" दीपा ने जवाब दिया।
मगर  तुम तो दिल्ली में थी ना यहां कैसे और यह काम? और तुम्हारे हस्बैंड वह कहां है? उनका तो कोई बिजनेस था ना? मयूर ने पूछा
दीपा कुछ देर तक खामोश रही फिर बोली, "विजय अब नहीं है इस दुनिया में... एक कार एक्सीडेंट में उनकी मौत हो गई। छोटे भाई ने बिजनेस संभाल लिया। घर में झगड़े होने लगे थे तो मैं यहां वापस आ गई, कहीं जॉब नहीं मिल रही थी, यहां पर पापा के दोस्त की पहचान से जॉब मिल गई तब से यहीं हूं"।
दोनों के दिल में एक चिंगारी फिर से जलने लगी थी मगर दीपा सतर्क थी।
मयूर बोला, "दीपा!" दीपा ने उसकी ओर देखा और जैसे शिकायत कर रही हो कि पहले जिस तरह से दिल तोड़ा था वह तकलीफ अभी खत्म नहीं हुई है या अभी कुछ करना बाकी है क्या? लेकिन वह कुछ बोली नहीं।
मयूर ने कहा, "मुझसे शादी करोगी?"
दीपा शांत स्वर में बोली, "हम अजनबी दोस्त ही रहें तो ज्यादा अच्छा है, तुम्हारे घर में जो समस्या पहले थी वही अब भी होगी, मुझे फिर से अपमानित नहीं होना है तुम्हें नहीं पता मैं कितना परेशान हुई हूं"। "मुझे पता है लेकिन अब नहीं होगा वैसा,  एक बार तुम्हें खो चुका हूं अब फिर से तुम्हें खोना नहीं चाहता। क्या तुम मेरी जिंदगी में फिर से वापस आओगी?" मयूर ने कातर भाव से कहा। दीपा कुछ नहीं बोली बस उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे और उसके हाथ पर मयूर ने अपना हाथ रख दिया।



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