सड़क निर्माण:जनहितकारी या जनकष्टकारी?
| -Nirmal Rani - Nov 28 2019 12:20PM

                                 यदि हम मैट्रो रेल अथवा विदेशी कंपनियों द्वारा किये जाने वाली बड़ी निर्माण परियोजनाओं को छोड़ दें तो इसके अतिरिक्त पूरे देश में केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा किया जाने वाला शायद ही कोई ऐसा निर्माण कार्य अथवा निर्माण परियोजना ऐसी हो जिसपर भ्रष्टाचार की छाया न पड़ी हो। ऐसी अनेक ख़बरें अक्सर आती रही हैं कि भ्रष्टाचारियों के नेटवर्क ने किसी ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दी जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा था। इनमें अनेक ईमानदार अधिकारी से लेकर,आर टी आई कार्यकर्त्ता,सामाजिक कार्यकर्ता,पत्रकार आदि शामिल रहे हैं। इस तरह की घटनाएं यह साबित करती हैं कि भ्रष्टाचार के हाथ केवल बहुत लंबे ही नहीं हैं बल्कि यह भ्रष्ट व ख़ूनी हाथ सीधे सत्ता के शीर्ष तक अपनी पहुँच रखते हैं। इतना ही नहीं बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि यह भ्रष्ट तंत्र सत्ता के नेटवर्क का ही एक हिस्सा है। अन्यथा क्या वजह है कि जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें जनता का हित करने के बजाए जनता को कष्ट पहुँचाने या अहित करने में ही व्यस्त रहती हैं तथा सत्ता के चहेते गुर्गे जनता को बार बार तकलीफ़ों व परेशानियों में डालकर ख़ुद करोड़पति व अरबपति बनते रहते हैं?
                                इस सन्दर्भ में एक उदाहरण राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सड़कों,गलियों,नालियों व नालों के निर्माण का है। देश में इन दिनों बड़े पैमाने पर अनेक निर्माण परियोजनाएं चल रही हैं। कई कार्य तो ऐसे हो रहे हैं जिनकी कोई ज़रुरत ही नहीं थी। मगर सौंदर्यीकरण अथवा रखरखाव के नाम पर कई पार्कों,तालाबों तथा स्मारकों का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। उनकी मूल डिज़ाइन बदली जा रही हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर ख़र्च करने के लिए तो सरकार उनपर हॉस्टल फ़ीस बढ़ने का दबाव डाल रही है जबकि सरकारों के पास बने बनाए कई मज़बूत स्मारक तोड़ कर उसे पुनः बनाए जाने के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है? कई शहरों में पानी की निकासी के लिए नए नालों व नालियों का निर्माण किया जा रहा है। अनेक शहरों में नई सड़कें व गलियां भी बन रही हैं। सड़कों व गलियों का बनना निश्चित रूप से सुनने में  तो यही लगता है कि यह जनता के आराम के लिए तथा जनसुविधाओं की ख़ातिर ही यह किया जा रहा होगा। परन्तु सरकार व संबंधित स्थानीय प्रशासन की मिली भगत का परिणाम यह है कि जनता अब चाहती ही नहीं है कि उसके शहर में नालों-नालियों,गली मोहल्ले की सड़कों या शहर के मुख्य मार्गों का निर्माण किया जाए।
                              इसका एकमात्र कारण यही है कि बार बार होने वाले इस सड़क,गली व नाले नालियों के निर्माण में  सड़कों-गलियों व नालों-नालियों को पहले से और अधिक ऊँचा कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप जनता द्वारा उसके ख़ून पसीने की कमाई से बनाया हुआ मकान या दुकान बार बार नीचे के स्तर तक पहुँचता जाता है। और धीरे धीरे एक दिन सड़कें गलियां,व नाले नालियां तो ऊँचे हो जाते हैं तथा लोगों के मकान,दुकानें,शोरूम व गोदाम आदि का स्तर सड़क गली या नाले के नीचे हो जाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि जो ढोंगी राजनीतिज्ञ बात बात में स्वयं को 130 करोड़ जनता का प्रतिनिधि होने की दुहाई देते हैं वह लोग इतना भी नहीं समझ पाते की जिस आम आदमी ने अपने पूरे जीवन की कमाई जोड़ कर या बैंक से ऋण लेकर अपने जीवन का सपना पूरा करते हुए एक भवन बनाया है कुछ ही समय बाद सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से उसी माकन में बाहर का पानी घुसने लगे,बरसाती व नालों नालियों का गन्दा व प्रदूषित पानी प्रवेश करने लगे, तो आख़िर उस पर क्या गुज़रेगी ? ख़ास तौर पर बरसात के दिनों में तो ऐसे इलाक़ों का पूरा जनजीवन ही ठप्प हो जाता है।अनेक लोगों को इस तरह के होने वाले जलभराव के चलते न केवल भरी परेशानी का सामना करना पड़ता है बल्कि उनके मकान,दुकान,गोदाम या शोरूम आदि डूबने के चलते उन्हें आर्थिक नुक़सान का सामना भी करना पड़ता है। देश के कई राज्यों से तो ऐसी ख़बरें भी आ चुकी हैं कि इसी जलभराव के चलते अनेक सरकारी कार्यालय यहाँ तक कि उपायुक्त या ज़िलाधीश कार्यालय,पुलिस कार्यालय अस्पताल तथा बैंक आदि सबकुछ जलमग्न हो गए। पिछले बरसात में तो पटना में राज्य के मुख्यमंत्री सुशील मोदी स्वयं निकर पहने अपने परिवार के साथ सड़क पर परेशानहाल खड़े नज़र आए क्योंकि शहर में हुए जलभराव की वजह से उनका अपना घर भी जलमग्न हो गया था।
                              पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा पहली बार एक घोषणा की गयी कि भविष्य में राज्य सरकार द्वारा किये जाने वाले किसी भी सड़क निर्माण परियोजना में पहले पुरानी सड़क अथवा गली को तोड़ा जाएगा। उससे निकली गयी सामग्री का इस्तेमाल नई सड़क बनाने में किया जाएगा। और पुरानी सड़क का स्तर वही रखा जाएगा जो पहले से था। अर्थात दिल्ली की गलियां व सड़कें अब और ऊँची नहीं होंगीं। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने यह भी दावा किया की ऐसा करने से निर्माण लागत में भी 30 प्रतिशत की कमी आएगी। केजरीवाल ने स्वयं यह स्वीकार किया कि वे लोगों से उनकी सड़कें व गलियां बनवाने के लिए पूछते तो लोग उन्हें यही कहकर मना कर देते थे कि -'सड़क बनने से उनके मकान नीचे हो जाएंगे और बरसात में पानी उनके घरों में घुसेगा इसलिए वे अपनी सड़क या गली बनवाना ही नहीं चाहते'। जनता की यही बात सुनकर केजरीवाल सरकार ने सड़क निर्माण हेतु यह नया फ़ार्मूला निकाला कि पहले पुरानी गली या सड़क तोड़ी जाए फिर पुराने लेवॅल पर ही नए निर्माण को पूरा किया जाए।
                           क्या केजरीवाल का यह फ़ार्मूला शेष अन्य 'तथाकथित राष्ट्रवादी मुख्यमंत्रियों' की समझ में नहीं आता ? क्या जनता के दुःख की यह आवाज़ कि उनका भवन,दुकान या गोदाम ग़ैर नियोजित सरकारी निर्माण के चलते डूब रहा है, 130 करोड़ जनता के तथाकथित सरपरस्तों को सुनाई नहीं देती ?यह कोई साधारण विषय नहीं बल्कि एक गंभीर मामला है। इसके तार सीधे तौर पर भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। सड़क ऊँची करने के नाम पर मिटटी पत्थर भर कर गली व सड़क की मोटाई के हिसाब से ठेकेदारों द्वारा सरकार से पैसे वसूले जाते हैं। उधर जो निर्माण कार्य होता है वो भी मज़बूत व टिकाऊ नहीं होने के चलते जल्द ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। इस तरह बार बार उन्हें उसी निर्माण कार्य का ठेका दिया जाता है जो हर बार ऊँचा और ऊँचा यानी बार बार ऊँचा होता जाता है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के निर्देश दिए जाने चाहिए कि गांव से लेकर मुहल्लों,क़स्बों,शहरों बाज़ारों,मुख्य मार्गों तथा राजमार्गों पर बनने वाली सभी सड़कों व गलियों को दिल्ली की तर्ज़ पर पहले खोद कर उनका स्तर नीचे किया जाए। बाद में उसपर नई सामग्री डाल कर गली सड़क के पुराने स्तर तक ही सड़क निर्माण को पूरा किया जाए। यदि सरकार यथाशीघ्र इस संबंध में नीति नहीं बनाती तो इसका सीधा सा अर्थ होगा की सरकार व प्रशासन की दिलचस्पी जनता को रहत देने में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने तथा जनता को कष्ट  पहुँचाने में ही है।



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