आधी आबादी को कब मिलेगी पूरी आजादी....!!
| -Rituparna Dave - Dec 2 2019 12:30PM

देश की आधी आबादी का सच बहुत ही दर्दनाक और खौफनाक होता जा रहा है. बात सिर्फ महिला उत्पीड़न ही नहीं उससे भी आगे की है. यौन हिंसा, धमकाना और जान ले लेना बहुत ही आसान सा हो गया है. ऐसा लगता है कि समाज में रहकर भी सुरक्षित नहीं है महिलाएं. कहीं हवस तो कहीं रसूख के आगे जान की सुरक्षा और इज्जत के कोई मायने नहीं रह गए या फिर कानून के खौफ का भी डर भी बिल्कुल खत्म हो चुका है! 

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के शादनगर की वैटनरी डॉक्टर सपना (बदला हुआ नाम) रोज क्लीनिक जाती थी जो उनके घर से 30 किलोमीटर दूर शमशादबाग में था. आधा रास्ता स्कूटी से जाती और आधा टोंडूपल्ली टोल प्लाजा की पार्किंग में अपनी स्कूटी पार्क कर कैब से तय करतीं. यह रोजाना की बात थी. 27 नवंबर को भी काम खत्म कर क्लीनिक से निकल गईं क्योंकि अन्य डॉक्टर से खुद के इलाज खातिर वक्त ले रखा था. यहां उन्हें देर हो गई और घरवालों को पता था इसलिए वो देरी पर निश्चिंत थे. जब वह टोल प्लाजा पार्किंग पहुंचीं, तो पाया स्कूटी का एक टायर पंक्चर है. वो परेशान हो गईं क्योंकि रात हो चुकी थी और वहाँ मदद भी नहीं मिल पा रही थी और अकेली लड़की को आने जाने वाला हर शख्स घूर रहा था. उसे सूझ नहीं रहा था कि वो करे तो करे क्या? कुछ लोग पूछने भी आए, मदद की पेशकश भी की, लेकिन वह समझ चुकी थी कि मदद के लिए पूछने वालों के इरादे नेक नहीं हैं.

शायद उसकी छठी इन्द्री ने आगाह करा दिया था कि वह भारी मुश्किल में है. रात 9 बजकर 22 मिनट पर उसने बहन को फोन कर पूरी बात बताई. बहन ने कहा कि गाड़ी छोड़कर कैब से घर आ जाओ. लेकिन अनजानों के बीच गाड़ी कैसे छोड़ती, फिर सुबह क्लीनिक भी आना था. उसने कहा देखती हूं कि शायद स्कूटी ठीक हो जाए लेकिन तुम फोन पर ही बनी रहो क्योंकि मुझे डर लग रहा है. बहन 9 बजकर 42 मिनट तक लगातार फोन पर रही कि एकाएक फोन कट जाता है और स्विच ऑफ बताने लगता है. वह डरी जरूर थी पर ऐसी दरिंदगी और मौत से सामना होगा इसका जरा भी अंदाजा नहीं था. घरवाले इस मुगालते में थे कि शायद कैब मिल गई हो और बैटरी खत्म हो गई हो. लेकिन 2 घण्टे बीतने के बाद भी जब वह नहीं लौटी तो घरवाले टोल प्लाजा पहुँचे. वहां न तो स्कूटी मिली न ही वह खुद. अब सभी को अनहोनी की आशंका होने लगी. तुरंत नजदीकी पुलिस थाना साइबराबाद पहुँचे पुलिस ने उनका इलाका न होने की बात कह लौटा दिया.

थोड़ी देर में शमशाबाद थाना पहुंचे जहाँ पुलिस ने ढ़ुलमुल रवैया अपनाया फिर टोल प्लाजा गई जहां कुछ नहीं मिला. इस तरह रात बीतती गई. सुबह 7 बजे एक किसान पुलिस को खबर करता है कि एक महिला की 100 फीसदी जली लाश पड़ी है. गले का लॉकेट और स्कॉर्फ के टुकड़े से तस्दीक होती है. खबर फैलते ही देश में एक और निर्भया काण्ड पर उबाल शुरू हो जाता है. पोस्टमार्टम से पता चला है कि उनके साथ बलात्कार ही नहीं हुआ बल्कि गला दबाकर हत्या करने से पहले बुरी तरह टॉर्चर भी किया गया था. उसी इलाके में तीन बाद एक और महिला की अधजली लाश फिर मिलती है. इन दो घटनाओं से महज एक और राजधानी फिर शर्मसार भर नहीं हुई बल्कि बहुत सारे अनुत्तरित प्रश्न भी उठ खड़े हुए हैं कि आखिर निर्भया कब तक भय में जीती रहेंगी?

सवाल बस यही है कि रुकती क्यों नहीं महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं और क्या कभी रुक पाएंगी भी या नहीं? तथाकथित जागरूक समाज और इसके ठेकेदार कब तक इसे हल्के से लेते रहेंगे? सुरक्षा, कानूनी मदद व व्यवस्था के तमाम दावे यूं ही खोखले रहेंगे या कभी असरकारक भी होंगे? घरों के अन्दर, बस, रेल, सड़क, पार्क, शौचालय यहां तक कि पुलिस थानों में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, यक्ष प्रश्न यह कि कब, कहां होंगी महिलाएं सुरक्षित? ये बढ़ रही मानसिक विकृतियां ही हैं जो विक्षिप्त, विकलांग और उम्र दराज स्त्रियां तक सुरक्षित नहीं हैं. इन सबका मूल कारण प्रथम दृष्टया एक ही है, कानूनी पेचीदगियां और न्याय में देरी.  भारत में साल दर साल तेजी से बढ़ते आंकड़े चिन्ता का विषय हैं. जहां 80 के दशक में प्रति लाख आबादी पर यह आंकड़ा 700 यानी 0.17 था जो 90 में 1800 होकर 0.70 पर पहुंचा. 2000 के दशक बलात्कार का आंकड़ा 6000 हजार होकर 1.6 हुआ और वर्तमान लगभग 20000 हजार के आसपास होकर 2.5 पर पहुंच गया है जो कि बेहद चिन्तनीय है.

कुछेक घटनाओं की वीभत्सतता के बाद हो हल्ला खूब मचता है, सभाएं होती हैं, लोग हाथों में मोमबत्तियां लेकर जुलूस निकालते हैं और महिला सुरक्षा के नाम बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, बड़ा फण्ड भी सहेजा जाता है. लेकिन उससे बड़ी सच्चाई यह कि इसका कब और कितना असर हो पाता है, जगजाहिर है. देश में विकास की बातें होती हैं, होनी भी चाहिए लेकिन इस पर भी मंथन जरूरी कि देश की आधी आबादी को कब मिलेगी पूरी आजादी? भारत में सन् 2009 से 2011 के बीच करीब 122292  यौन शोषण के मामले दर्ज किए गए, लेकिन जेल की सजा सिर्फ 27408 दोषियों को ही हो सकी. ऐसे अपराध त्वरित निराकरण के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में ही जाएं और हर राज्य में इनके फौरी निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट की बेंच हो जिससे कानून का भय दिख सके. लेकिन उससे भी जरूरी यह कि ऐसे अपराधों, विकृतियों, सोच और इन्हें पोषने वालों से तुरंत, कठोरता से निपटना ही होगा चाहे वह कितना भी प्रभावी, पहुंचवाला क्यों न हो. 

ऐसे अपराधों से निपटने के लिए चीन का उदाहरण देखना होगा. एक बार बीजिंग के एक मुहल्ले में एक लड़की से बलात्कार हुआ. यह बात चीन की सफल क्रान्ति के क्रान्तिकारी जनक और जनवादी गणतन्त्र चीन के स्थापक चेयरमेन माओत्से तुंग तक पहुंची. वह खुद पीड़ित लड़की से मिले. उन्होंने पूछा "जब तुम्हारे साथ जबरदस्ती की जा रहा थी तो तुम मदद के लिये चिल्लाई थी?" उसने हां कह सर हिलाया. माओ ने उस लड़की के सर पर प्यार से हाथ फेरा और नरमी से कहा, "मेरी बच्ची! क्या तुम उसी ताकत के साथ दोबारा चिल्ला सकती हो?" लड़की ने फिर हाँ कहा. माओ के आदेश पर कुछ सिपाहियों को आधे किलोमीटर के सर्कल में खड़ा कर दिया गया फिर लड़की से कहा गया कि अब तुम उसी ताकत से चीखो. उसने ऐसा ही किया.

माओ ने सभी सिपाहियों को बुलाया और अलग-अलग पूछा कि लड़की की चीख सुनाई दी या नहीं? सभी ने कहा कि चीख सुनाई दी. तब माओ ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि घटना स्थल के आधे किलोमीटर के इलाके के सभी पुरुषों को गिरफ्तार कर लिया जाये और तीस मिनट में यदि मुजरिम की पहचान न हो तो सबको गोली मार दी जाए. आदेश का तुरंत पालन हुआ और बमुश्किल दस मिनट के अन्दर ही मुजरिम की पहचान हो गई. अगले बीस मिनट में अपराधी माओ के सामने था जहाँ लड़की ने शिनाख्त की मौके पर फैसला हुआ और सरेआम मुजरिम का सिर गोलियों से उड़ा दिया गया. जुर्म से सजा की दूरी केवल तीन घण्टे रही. तुरंत इंसाफ की मिशाल ही है जो आज चीन हर क्षेत्र में तरक्की पर है.

काश कुछ ऐसा ही अपने देश में होता तो शायद बलात्कार की इतनी घटनाएं न होती. लेकिन  यहां तो पीड़िता अगर जिंदा है तो वर्षों तक अदालत का चक्कर और अगर जला दी गई तो उसके नाम पर केवल कैंडल मार्च. 2013 में बलात्कार पीड़ितों की सहायता करने और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बने निर्भया फण्ड में अब तक लगभग 3600 करोड़ का आवंटन हुआ लेकिन खर्च बमुश्किल 20 प्रतिशत ही हो पाया यह भी चिन्ताजनक   और सवालों के घेरे में है. लेकिन सवाल फिर भी वही कि कब तक महिलाएं यूं ही अपने सम्मान को व्यभिचारियों के हाथों तार-तार होता देखेंगी वह भी तब, जब समाज इन्हें बराबरी का दर्जा देने का ढ़ोंग करता हो!  क्या यह बस खोखलेबाजी है? क्या यही बराबरी है? इसका सही जवाब शायद ही मिल पाए.



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