पीठ पर ढ़ोलक हाथ में कटोरा ये हैं देश के भविष्य
| Rainbow News - Jun 4 2017 5:19PM

सरकार कागजों में शिक्षा व्यवस्था को सूदृढ़ करने के दावे चाहे जितने करले धरातल पर जो है उसे इस तस्वीर के माध्यम से देखा और समझा जा सकता है। जिनको  नेता भाषणों के जरीये देश का भविष्य बताने से नहीं चूकते उनपर उनके परिवार को रोटी देने का जिम्मा है। इन्हें नहीं मालूम की देश के प्रधानमंत्री या शिक्षा मंत्री कौन हैं। पर इतना जरूर मालूम है कि किस गायक का कौन सा फूहड़ गाना नया आया है। कई गाने ऐसे हैं जो आपको पहली बार ट्रेन में इन बच्चों के मुंह से सुनने को मिल जायेंगे।

गोरखपुर, वाराणसी मंण्डलों से लगायत पूरे बिहार में चल रही ट्रेनों में देखा जाय तो पीठ पर ढोलक, हारमोनियम व हाथ में कटोरा थामें तमाम किशोर मिल जायेंगे जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा और ना ही इन्हें अभी क ख ग का ज्ञान है। कुदरत ने इन्हीं कमजोर कंधो पर परिवार के भरण पोषण का जिम्मा जो दे दिया है। हालांकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इन बच्चों के बचपना का नाजायज लाभ उठा रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो देवरिया, सीवान व आजमगढ़ मऊ समेत तमाम जगहों पर बच्चों को भिखारी बनाने के पीछे बड़ा रैकेट काम कर रहा है। वे लोग मासूमों को पहले बहला फुसलाकर खिलाते पिलाते हैं और बाद में धीरे-धीरे नशीले पदार्थ का आदि बना देते हैं। लत लगने के उन बच्चों से पैसों की डिमांड की जाती है। वहीं से शुरू होता है भिखारी बनाने का काला खेल। वही बच्चे पहले झुनझुना के सहारे गाना गाकर रेलवे स्टेशन से लगायत ट्रेनों में चढ़कर भीख मांगते हैं। अच्छी आमदनी बॉस तक पहुंचाने वाले किशोरों को ढोलक हारमोनियम भी मुहैया करा दिया जाता है।

हैरानी तो तब होती है जब सरेआम इन मासूमों के भविष्य की नीलामी देखकर जिम्मेवार लोग मनोरंजन करते देखे जाते हैं। घर का बच्चा स्कूल से लौटकर घर पर भोजपूरी बोल दे तो वही लोग डांट-फटकार या प्यार से हिन्दी या अंग्रेजी में बोलना सिखाते हैं जबकि उन्हीं लोगों का पाला जब भीख मांग रहे उन मासूमों से पड़ता है तो हर फूहड़ गानों पर सिक्के उछालते नजर आते हैं। हालांकि इस व्यवस्था के पीछे पूरा सिंस्टम जिम्मेवार है। नाच-गाकर भीख मंाग रहे इन बेसहारे मासूमों को पुलिस भी नहीं रोकती। आखिर रोके भी तो कैसे उन बच्चों को सही जगह पहुंचाने की जिम्मेदारी जो मिल जायेगी।

शायद सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं के बारे में इन मासूमों को ज्ञान हो जाय तो सैकड़ो पंक्तियों के गाने पल भर में याद करने वाले इन बच्चों को जल्दी ही इतिहास भूगोल भी ज्ञात हो जाता। जिस भूख को मिटाने की खातिर वह तरह तरह के लोगों की डांट व पुचकार सुनते हैं। उनका पेट मिड-डे मिल से भर जाता तो उन्हें ना भीख मांगने की नौबत आती और ना ही उनके संस्कारों पर गंदी परछांई पड़ती।

-बैकुण्ठ नाथ शुक्ल, देवरिया



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