शहर की स्वच्छता व उत्तम स्वास्थ्य के मंदिर
| -Ram vilas jangid - Dec 28 2019 4:42PM

ठंड से ठिठुरते सूरज ने भरी दोपहरी में एक करवट ली। शहर की सड़कें धुआं-धुआं सी हो रही है। एक हलवाई सड़क को आगे से 10 फुट तक घेरे हुए धूल, धंकड़़ व शोर के साथ कचोरियां बेचने में व्यस्त है। उसकी दुकान का पिछला हिस्सा एक गुफा नुमा दिखाई दे रहा है। इस गुफा के पिछवाड़े में चार-छह मजदूर कई-कई प्रकार की खाद्य सामग्रियां बनाते हुए बीड़ी, तंबाकू, जर्दा, गुटखा या ऐसी ही कुछ खाद्य सामग्रियां अपने मुंह में डाले हुए फिल्मी गाना गुनगुना रहे हैं। दुकान के इस पिछवाड़े में तीन लंबी-मोटी डोरियां पसरी है। इन पर कारीगर मजदूरों के कपड़े बेतरतीब तरीके से लटक-अटक रहे हैं। कई प्रकार के मैल और चटनियों से मुटाते इन कपड़ों का वास्तविक कलर अगर कोई बता दे तो उसे इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटर का अवार्ड मिलना पक्का तय है।

बरमूडा, बुश्शर्ट, जांघिया, बनियान, स्वेटर, मफलर आदि गंदगी, मैल और कीचड़ के धागों से बनाए हुए ये विशेष कपड़े हैं। इन कपड़ों पर चटनियों के धब्बे कोई विशेष प्रकार की पेंटिंग भी बना रहे हैं। दुकान की दीवारों का रंग बताना नामुमकिन है क्योंकि इस समय जो कुछ भी रंग है वह केवल धूसर, मिट्टी और राख का रंग ही जमा है। यह बहुत ही भद्दा, कसैला और बदबूदार दिखाई दे रहा है। इन कपड़ों में मक्खी, मच्छर, कीट, पतंगों के साथ में कई तरह की छिपकलियां खुले आम बड़ी मुश्किल से जीवन यापन कर रही है। या यूं कह लीजिए कि ये सब यहां पर एक प्रकार का सामूहिक नरक भुगत रहे हैं।इन्हीं कपड़ों की विशाल बंदनवार के नीचे ही तीन कारीगर चार कड़ाहियों को घेरे हुए, बीड़ी फूंकते, जर्दे की पीक होटों-गालों पर लहराते हुए समोसा, कचोरी, पकौड़ी आदि की तैयारी में व्यस्त हैं। दीवारों पर कई तरह की छिपकलियां इधर-उधर आ-जा रही है।

मकड़ियों के जालों की अद्भुत वास्तुकारी पूरे विश्व में चर्चित है। दीवार पर लगी जगह-जगह चीकट से एक छिपकली नीचे फिसलकर कड़ाही में गिरी दिखाई पड़ी। इसी समय एक मजदूर का मोबाइल बजने लगा और उसने अध-जली बीड़ी बनने वाले समोसे के मसाले को समर्पित करते हुए उठना चाहा। उसका सिर झपाक से कपड़े की बंदनवार से टकरा गया। बहुत सारे कपड़े नीचे गिर गए। इसी समय उन कपड़ों से धूल-धंकड़ का एक बड़ा सा बगुला ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं सभी दिशाओं की तरफ बढ़ने लगा। बहुत सारे मच्छर एक साथ ऊपर-नीचे की तरफ उड़ने लगे। ढेरों मक्खियां हर दिशाओं में भिनभिनाने लगी। मकड़ियों में अफरातफरी मच गई। इसी कार्यक्रम में मजदूर का एक पैर उर्फ दाद व गंदगी का मांस पिंड कड़ाही में गिर पड़ा। कड़ाही का सारा कचोरी समोसा मसाला मलीदा फर्श कहलाने वाली कच्ची कीचड़ी जमीन पर गिर पड़ा। जहां पहले से ही मक्खी-मच्छर अपना अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन कर रहे थे। सारा मसाला बहकर नाली के मुहाने तक पसर गया। जहां किसी अन्य कारीगर ने बड़ी कोशिश से नाली की सफाई करते हुए उस मसाले को बेदर्दी से वापस कड़ाही में डाला। जो कुछ कचरेनुमा कपड़े नीचे गिरे थे अब उन कपड़ों को ऊपर उठाकर उस मजदूर ने पास की दीवार पर लगी कीलों पर टांग दिया।

यहां पर एक पहले से ही एक प्रमाण पत्र टंगा हुआ है जिस पर नगर पालिका ने इस हलवाई को पूरे शहर का स्वच्छ हलवाई बताकर इसकी प्रशंसा की थी। लोग कहते हैं कि इस प्रमाण पत्र पर कभी कोई कांच लगा हुआ था। इस समय इस कांच के कई-कई टुकड़े हो रखे हैं। टुकड़ों के अंदर-बाहर चारों तरफ मक्खी और मच्छर इसकी स्वच्छता पर अपना हक जमा रहे हैं। चार मक्खियों की लाशें इस समय इस प्रमाण पत्र के अंदर है जिनकी टांगे ऊपर की ओर उठी हुई है और इनका मुंह बाहर की ओर झूल रहा है। इन मक्खियों के दांत बाहर की ओर निकलते हुए हंसते-हंसते स्वच्छता के गीत गा रहे हैं। स्वच्छता प्रमाण पत्र के चारों और बॉर्डर पर मक्खी-मच्छरों की दीर्घ शंकाओं की चित्रकारी की हुई है। बीस मच्छरों की लाशें भी सुरक्षित रूप से इसी बॉर्डर पर देखी जा सकती है। इन मच्छरों के डंक हलवाई ने निकालकर बतौर चाय मसाले उपयोग ले लिए हैं। स्वच्छता व उत्तम स्वास्थ्य के ये मंदिर शहर के हर नाले व मुख्य सड़क पर तसल्ली से पसरे पड़े हैं। आसमान से अलसाया सूरज टुकुर-टुकुर झांक रहा है। -रामविलास जांगिड़



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