गण से दूर होता तंत्र
| -RN. Feature Desk - Jan 28 2020 12:57PM

‌गणतंत्र दिवस, एक राष्ट्रीय त्योहार जो हमारे अंदर गर्व की श्रेष्ठ राष्ट्रीय भावना को पैदा करता है। इस दिन हमने बरसो  की गुलामी को त्याग कर स्वतंत्र संविधान को प्राप्त किया और हम अपने देश के नियमों में बंध कर रहने लगे ।कितनी पवित्र भावना और सोच ।डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और उनकी समिति ने 2 वर्ष 22 माह 8 दिन के अथक मेहनत से भारतीय संविधान का गठन किया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू करवाया । कितना गर्व का समय रहा होगा जब भारत संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बना होगा हमें अपने ही  तिरंगे के नीचे रह कर ,अपने बनाए हुए संविधान का अनुसरण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। किंतु आज तंत्र, गण से बहुत दूर होता जा रहा है और मात्र तंत्र कर जनता के निस्वार्थ भावनाओं को विकास के नाम पर लूट रहा है।

विकास भी इतना भयावह होता जा रहा है कि इन्वेस्टर्स मीट के नाम पर करोड़ों रुपए की एमओयू भरा कर  के उनको ना तो जमीन दी जाती है और ना ही आवश्यक संसाधन। जो उनके स्थायित्व के लिए आवश्यक हो और लाखों बेरोजगारों को रोजगार और स्वाबलंबी बनाया जा सके ।सिर्फ ख्वाब दिखाकर भविष्य में करेंगे कह दिया जाता है। विकास के नाम पर  सरकारें किसानों की जमीन हथिया लेते हैं और वह वर्षों तक अनुपयोगी पड़ी रहती है जिससे हमारा कृषि उत्पादन दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है और ऊपर से मानसूनी परिवर्तन हमारी कृषि को नष्ट कर रहा है और हम आयात पर निर्भर होते जा रहे हैं।

उत्पादित अनाजों का उचित मूल्य ना मिलने पर हमारा किसान आत्महत्या जैसा पाप करने पर मजबूर हो रहा है किंतु सरकारों का क्या विदेशी आयातित अनाजों से राष्ट्र की पूर्ति कर दी जाती है और जनता को खामोश कर दिया जाता है ।कैसा यह लोकतांत्रिक गणराज्य होता जा रहा है ?जहां अभिव्यक्ति को या तो बिका हुआ कह देते हैं या उसको खामोश खामोश कर दिया जाता है किंतु विकास फिर भी नजर नहीं आता ।कुछ ही क्षेत्रों के विकास को संपूर्ण राष्ट्र का विकास का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है ।हमें समग्र विकास की जरूरत है उसके लिए उचित और ईमानदार प्रबंधन और उसके लागू करने की जरूरत है।

मेरा देश कराह रहा है और सरकारें अपनी स्वार्थ की रोटियां सेक रही हैं।आखिर जनता जाए तो जाए कहां ? सारे के सारे विभाग भ्रष्टाचार की कमाई में डूबे हुए हैं। सरकारी कर्मचारी जो कि सबसे अधिक शिक्षित और बुद्धिमान माना जाता हैं और जब वही शोषण करने लगे तो आवाम का हाल सिर्फ खुदा ही जान सकता है ।हमारी प्यारी सी जनता जो सब कुछ  देखती है, जानती है। फिर भी  विरोध नहीं करती है मात्र अपनी थोड़ी सी असुविधा के लिए।

आखिर  हम किस गणतंत्र की  ओर जा रहे हैं जिसकी ना दिशा हैं और ना ही दशा है। मात्र देश को चलाया जा रहा है। जैसे कंपनी के सीईओ बदल दिए जाते हैं और वह कंपनी को अपने अनुसार चलाते हैं। उसी तरह चुनावों में एन केन प्रकारेण विजय प्राप्त करके 5 साल तक के सीईओ सरकारें देश की बन जाती हैं  फिर अपना और अपनों को अमीर बनाने में व्यस्त हो जाते हैं ।सचमुच हम लोकतंत्र में हैं या लूट तंत्र में अंतर करना सचमुच में मुश्किल होता जा रहा है।

अंत में गणतंत्र दिवस की  आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं।

                                         आपकी स्मिता जैन



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