एकरूपता का स्वाँग क्यों  
| -RN. Feature Desk - Feb 6 2020 12:30PM

-स्मिता जैन

एक व्यक्ति और उसकी सोचसे क्या हमारा परिवार, समाज, देश संचालित हो सकता है ।जहां हर ओर सिर्फ विविधता ही विविधता बिखरी पड़ी है। वहां पर एक विशेष समाज या संगठन की सोच को क्या लादा जा सकता है। अनेकता में एकता की खुशबू ही एक विश्व की अनेकों संस्कृतियों और जिंदगीयों को जुड़े हुए हैं।

हमें उसमें ही सामंजस्य स्थापित करके रहना होगा। नहीं तो सिकंदर, बाबर, औरंगजेब ना जाने कितने ही आक्रांता आए और आकर रुखसते ऐ जहान हो गए। जब हवा, पानी, बनस्पति, जीवनीनो में प्रकृति में हर कदम परिवर्तन है। क्या वह अज्ञात अदृश्य शक्ति भी एकरूपता चाहती होगी, जिसने यह संपूर्ण ब्रह्मांड बनाया है? नियति के द्वारा पोषित ब्रह्मांड के आगे अपनी हार मान ली होगी। हमारे आचार विचार जरूरते सब कुछ तो भिन्न भिन्न है। फिर एकरूपता का स्वांगक्यों? क्या आप एक सा खाना प्रतिदिन खा सकते हैं?

एक से वस्त्र प्रतिदिन पहन सकते हैं क्या? एक ही सोच पर जीवन जी सकते हैं। नहीं ना, तो फिर और औरों से उम्मीद क्यों??? वर्तमान में समाज के लगभग सभी वर्गों का असुरक्षित हो जाना, प्रदर्शित करता है कि हमारी सरकारें सिर्फ अपनी सत्ता हासिल करना चाहती हैं जिसके लिये आम जनता को बेवकूफ बनाकर, धर्म के नाम पर बर्गलाकर अपनी रोटियाँ सेकती हैऔर आम जनता अपने रोज की जरूरतों तक ही सीमित रहना चाहती है।



Browse By Tags



Other News