प्रेम की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान 'मीराबाई'
| -RN. Feature Desk - Feb 11 2020 1:02PM

"इश्क महसूस करना किसी...इबादत से कम नहीं,

जरा बताएं ऐसे छूकर...खुदा को किसने देखा है"

मीरा, कृष्ण प्रेम में ऐसी हुई बावरी कि तन-मन, मान-मर्यादा, विषय-वासना का ही त्याग कर दिया। रहा तो उसके पास बस एक ही नाम, एक ही मन। उस मन रूपी मंदिर में अपने कृष्ण को समा लिया सदाा- सदा के लिए। कितना रुलाया होगा उसे, इस समाज के अनेकों बंधनों ने। उन बेड़ियों में फंसी रही किंतु भक्ति रूपी प्रेम  को अपवित्र नहीं किया। यह भी न चाहा कि कि कान्हा कभी उसे मिलेंगे या नहीं बस उस पूर्णता को पा लिया को पा  लिया जिसे सच मुच एकाकार होना कहते हैं। यह भी नहीं सोचा कि वह तो नारायण है, राधा प्रिय हैं, अनेकों विद्याओं-शक्तियों के धारक है।

कुछ भी तो नहीं सोचा उस ने।बस उस निराकार को आकार दे दिया, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड में विद्यमान तो है पर नजदीक नहीं। उस आसक्ति को ही त्याग दिया जहां प्रकृति और पुरुष मिलते हैं। बस अपनी ऊर्जा का एक दिव्य रूप से एकाकार कर लिया। कुछ भी तो नहीं चाहा उसने कान्हा से ना तो उनका साथ, ना तो उनकी उनकी संपन्नता और ना ही कुछ और, मात्र इसके की मेरे ह्रदय रूपी मंदिर में अगर वास रहे तो सिर्फ तुम्हारा। एक अद्वितीय अनुभूति में ही गुम रहकर कर अपना साहित्य  सृजन अपनी भक्ति से किया।

जग सोचता ही रहा की वह तो कान्हा के माया से प्रभावित होकर उनकी हुई हैं। क्या वास्तव में सच्चा प्रेम किसी आडंबर से प्रभावित होता है। किसी जरूरत की पूर्ति करना चाहता है शायद नहीं। कान्हा तो साक्षात ईश्वर थे किंतु मीरा ने अपने भक्ति  से उनके साथ अपना नाम जोड़ लिया। भक्ति रूपी प्रेम में बड़ी ताकत होती है ,जहां कुछ ना होकर भी सब कुछ प्राप्त होता है। एक दर्द जिस में  खुशी का अनमोल खजाना छुपा हुआ रहता है। अव्यक्त प्रेम में मौन का संवाद प्रवाहित रहता है। नदी के प्रवाह की  तरह खामोश, किंतु सतत से मन जिंदा रहता है। जहां शरीर अपनी सीमाएं तोड़ देता है। जहां अकेलापन संगीत के सरगम सा लगता है।

दुनिया को लगता है अकेलापन पर वास्तव में यादों के अनंत स्मृतियों में जीता रहता है मीरा का मन। प्रेम का सर्वश्रेष्ठ तो मीरा के इंतजार में ही है जहां श्याम की निर्ममता है। यह कि इतना बड़ा राजकाज देखना है, तीनों लोगों का अवलोकन करना है। मीरा ने भी कभी बाधा होने की चाह नहीं की होगी सिर्फ इसके की तुम कहीं भी रहो कान्हा किंतु मेरे मन मंदिर में सिर्फ आप ही विराजमान रहे। संसार तो आसार है, अनंत है किंतु  जीवन जीयों तो प्रेम के सर्वश्रेष्ठ प्रतिमानों में और विष का प्याला कान्हा का नाम ले उस भक्ति रूपी प्रेम की श्रेष्ठता को अमर कर दिया।



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