उमा देवी से टुनटुन बनने तक का अफसाना
| -RN. Feature Desk - Feb 11 2020 1:21PM

टुनटुन मोटी और भद्दी कही जाने वाली भारतीय महिलाओं के लिए पर्याय बन गईं। भारतीय सिनेमा की पहली हास्य अभिनेत्री के रूप में उन्होंने पर्दे पर भारतीय मानस के सौंदर्यबोध का पहला खुला परिचय दिया। रेडियो पर उद्घोषणा सुनते हुए हमने टुनटुन को एक मोटी, थुलथुल देह वाली कॉमेडियन और उमा देवी खत्री को एक पुरानी गायिका के रूप में ही जाना था। बहुत बाद में यह मालूम पड़ा की टुनटुन ही ज़हीन गायिका उमा देवी हैं।

उत्तर प्रदेश के तंगदिल और संगदिल परिवार की 19-20 बरस की अनाथ लड़की पचास के दशक में घर से भाग निकलती है बम्बई! (हालांकि बाद में चाचा और भाई साथ देते है) सीधे नौशाद से मिलती है, यह कहती है कि मुझे काम दीजिये वर्ना में नदी में कूदकर जान दे दूंगी। मैं गाना गा सकती हूं। "यह परिस्थिति कैसे आयी होगी, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है।

उमा देवी ने प्रख्यात संगीतकारों के साथ बेहतरीन लोकप्रिय गीत गाये, उस दौर में जब शमशाद बेग़म पेशेवर गायिका के रूप में आ गईं थीं। लता मंगेशकर और आशा भोसले के आने तक उमा देवी ने गाना एकदम छोड़ दिया। वे जानती थीं कि आने वाली पीढ़ी संगीत की परंपरा और अभिजात्यता के साथ तैयार होकर आ रही है। ऐसे में अपने संघर्षों और भावनाओं के आधार पर गाने वाला... जिसमें अभाव की ख़राश हो, संघर्षों की मुरकियाँ पड़ती हों, अपमान को पार कर जाने वाला कभी न दिखाई देने वाला दर्द उभरता हो, उन्हें नई-नई बनी इंडस्ट्री कब तक सुनेगी?

थुलथुल देह के कारण उन्हें कॉमेडियन का रोल करने की सलाह देने लगे लोग तब जबकि महिलाओं के लिए ऐसे चरित्रों की कल्पना भी नहीं थी। उमा देवी से वे टुनटुन बन गईं। उनकी फिल्मों में नायक/सहनायक/खलनायक/नायिकाएं और कॉमेडियन तक उनके चरित्र का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। कोई पैसे के लिए, कोई प्रेमिका को पाने के लिए, कोई कुछ अन्य घपलों के लिए। सब समझती हुई भी टुनटुन उनके पीछे दौड़ती भागती हैं। एक भिन्न किस्म की बे-असरगी, लापरवाही उनके व्यक्तित्व को सबसे काटती है और अभिनय में सरल असर भी पैदा करती है।

महान हास्य अभिनेताओं और विदूषकों ने पर्दे पर अपने चरित्र को त्रासदी में रूपांतरित किया है लेकिन टुनटुन जैसे महानता के इस राह से भी हट सी गयीं। किसी ने उन्हें कभी उदास या दुखी नहीं देखा। अकेले में भी नहीं। उनका दुख उभरा ही नहीं। उनकी छोटी छोटी भूमिकाओं में जिस तरह दूसरे पात्र उनका इस्तेमाल करते हैं और जो उनकी मुद्राएं होतीं हैं, दर्शक टुनटुन के अभिनय के स्तर पर कम उनकी दैहिक स्थूलता के मज़ाक पर ज़्यादा मगन होते हैं। जिस तरह की टिप्पणियां उभरती है, वह भारतीय मानस का सौंदर्यबोध उजागर करती हैं। टुनटुन अपनी भूमिका में पर्दे पर इतनी सहज स्वाभाविक हैं कि संजीदा पाठक उस सहजता से बंधता है। ऐसी निर्लिप्तता की 'अभिनय' जैसा अभिनय भी नहीं दीखता।

सामाजिक भेदभाव, आर्थिक अभाव से नहीं अपमान को पीकर सब कुछ निरर्थक में बदल जाने के बाद पर्दे पर एक हास्य अभिनेता में यह निर्लिप्तता आती होगी। इंडस्ट्री में अभिनेत्रियां अपना सौंदर्य बनाये रखने में अवसादग्रस्त हो जाती हैं।आत्महत्या तक कर लेती हैं। सौंदर्य के बने मानकों में ख़ुद को बनाये रखने की जुगत और इसी सौंदर्य पर प्रेम पाने की बनी बनाई इच्छा रखती हैं।

टुनटुन कितनी मुक्त थीं इन चिंताओं से जिसमें कोई काम्प्लेक्स भी नही था न किसी की तरह बनने की कोई इच्छा। वे इस क़दर स्वाभाविक निस्पृह हो गईं कि हम उन्हें महान अभिनेत्री के रूप में याद करने का अधिकार भी खो बैठे हैं, बावजूद इसके कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का चेहरा उनके बग़ैर पूरा नहीं बनता। हास्य अभिनेता बहुत हुए, और होंगे लेकिन टुनटुन हमारे समाज में मुहाविरा बन गईं। उन्हें याद करते हुए उन्हीं का गाया यह गीत-

"अफ़साना लिख रही हूँ दिल ए बेक़रार का....."



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