नरक यात्रा
| -RN. Feature Desk - Feb 16 2020 4:32PM

कहते हैं भोगा हुआ यथार्थ जब लेखनी के माध्यम से कथाओं मे उतरता है तो वह बहुत ही मारक होता है। डा. ज्ञान चतुर्वेदी जी का उपन्यास" नरक यात्रा" सरकारी हस्पतालों का कठोर यथार्थ है, जहाँ हस्पतालों और डाक्टरों का काला पक्ष खुलकर सामने आ जाता है। उपन्यास मे लेखक ने मुर्दाघर, आपरेशन थियेटर से लेकर, ओपीडी और रसोईघर तक, नर्स, वार्डव्याय, एंबुलेंस चालक, जूनियर डाक्टर से लेकर सर्जन तक के चरित्र, कुटिलता, मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने की प्रवृत्ति को निर्ममता पूर्वक उकेरा है। उसपर से हस्पताल की अंदरुनी राजनीति, लूटखसोट, भ्रष्टाचार, नर्सों के यौन शोषण इत्यादि के बारे मे भी जमकर लिखा है। लेखक चुंकि स्वयं एक डाक्टर हैं ,इसलिए उन्होंने अनेक जगहों पर डाक्टरों के मध्य बहस मे मेडिकल टर्म्स का प्रचुरता से उपयोग किया है, जो उपन्यास के प्रवाह को धीमा करता है।उन्होंने यह भी दिखाया है कि ये बड़े बड़े जो सेमीनार होते हैं, बस खानापूर्ति किए जाते हैं। 

-अविनाश

मरीजों को दिए जानेवाले खाने की बनने, बांटने और मरीजों द्वारा उसको भी किसी भी तरह पा लेने की होड़, यह दर्शाती है कि नरक मे भी ठेलमठेल है। उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पात्र एक कुत्ता है ,जो शुरू से अंत तक उस गरीब मरीज की तरह है, सबजगह पीटता, दुत्कारा और लतियाया जाता रहा है, इसके माध्यम से लेखक ने सबलटर्न की स्थिति को रेखांकित करने का सफल प्रयास किया है। पोस्टमार्टम हाऊस मे मुर्दे का हाल... हृदयविदारक है। एक बार तो खुद मुर्दे को उठकर स्वयं अपनी रक्षा करनी पड़ती है। वैसे तो गिद्ध लुप्तप्राय हैं परंतु यहाँ गिद्धों की भरमार है। स्वयं नेताजी गिद्ध दृष्टि जमाये रखने की सलाह देते मिलते हैं।  आपरेशन थियेटर तो इस उपन्यास मे जैसे वाकई मे ड्रामा का थियेटर बनकर उभरा है, यहाँ नौटंकी होती रहती है।

आपरेशन के दौरान मरीजों के पेट छूट जानेवाले कैंची, सूई, तौलिया, घड़ी, चश्मा... लापरवाही की पराकाष्ठा है।। जैसा कि लेखक भी मानते हैं कि सभी डाक्टर उपन्यास मे चित्रित पात्रों के समान नही होते परंतु यहाँ लेखक को सिर्फ नरक यात्रा ही दिखानी थी, और वह इसे दिखाने मे सफल रहे हैं। रसोई घर मे अनहाइजेनिक खाने बनाने का बड़ा ही वीभत्स चित्रण किया गया है। उपन्यास मे डा. भागवत एकमात्र ईमानदार, कर्मठ ,या लेखक के शब्दों मे डाक्टरी का उजला पक्ष दिखानेवाला किरदार है परंतु जिसतरह से वह आपसी राजनीति से डरते हुए पूरे उपन्यास मे पेशाबघर/ बाथरूम मे छुपा रहता है, उससे शायद लेखक यह दिखाना चाहता है कि इमानदार डाक्टर बहुत ही डरपोक होता है। वाकई मे  मेडिकल प्रशासनगिरी ने इन डाक्टरों की डाक्टरी भुला दिया है।

एक ए सी एम ओ साहब अपने फील्ड की दुर्दशा पर रो तो सकते नही ,इसलिए हंसकर के गम हल्का करते हैं। कहते हैं जब हम दिन भर नक्शेबाजी( प्रारुपों पर सूचना प्रेषण) मे लगे रहेंगे, तो मरीज को कब देखेंगे। बस टारगेट पूरे किए जाने है, जैसै "नरक यात्रा" मे डा. साहब ने नसबंदी का कोटा पूरा किया.. 75 साल के बूढ़े का आपरेशन कर दिया। वह भला इस उम्र मे खाक जनसंख्या बढ़ा पाता! सरकारी हस्पतालों की स्थिति अगर अच्छी होती तो ये प्राइवेट हस्पताल और नर्सिंग होम की भरमार यूंही नही होती। चले जाइये मेदांता, अपोलो, एस्कार्ट मे ,ये फाइव स्टार होटल ही हैं, वहीं के जी एम सी और लोहिया का क्या हाल है? 

जनपद स्तरीय हस्पताल, पीएच सी, सीएच सी, सभी बस चले जा रहे हैं। यहाँ लगी लंबी लाइनों मे दम तोड़ती मानवता को देख यमराज भी एकबार शर्मिंदा हो जायेंगे।" नरक यात्रा" गरीबो, वंचितों और सबलटर्न की ऐसी नरक यात्रा की दास्तान है। एक तथ्य और भी उभर कर सामने आता है जब नेताजी डाक्टर साहब के सहयोग से अपने बेटे को बीमार सिद्ध कर जेल से हस्पताल मे शिफ्ट करा लेते हैं। यह दृश्य देखकर आजकल हर जेल जानेवाले नेताओं के सीने मे उठनेवाले दर्द और तबीयत खराब होने की कहानी मे झोल नजर आने लगता है।



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