देश की समस्याओं का हल सामाजिक राष्ट्रवाद से संभव
| -RN. Feature Desk - Feb 21 2020 1:28PM

पिछले कुछ सालों से व्यक्तिवाद ने सामाजिक विकास के मुद्दे को गोल कर दिया है।अब हर पल व्यक्ति विशेष की चर्चा होने लगा है।कुछ लोग उसे अच्छा बताते हैं तो बाकी अयोग्य।अब लोग शिक्षा स्वास्थ्य बिजली पानी सड़क सुरक्षा व्यवस्था सामाजिकता भाईचारा शांति प्रेम मेल भाव गरीबी वंचित पीड़ित किसान मजदूर कर्मचारी वेतन पेंशन मजदूरी कृषि खनन उद्योग व्यवसाय रिक्शावाले खोमचे वाले फुटपाथ वाले पशुपालक आदि की बात नहीं करते।अब बात सिर्फ और सिर्फ व्यक्ति विशेष की महिमामंडन और बुराई की होने लगी है।कुछ साल पहले तक परिवारवाद से बचने का नारा लगता था।अब व्यक्तिवाद हावी हो गया।जातिवाद और संप्रदायवाद का पकड़ जब ढीला हुआ तो उसकी जगह व्यक्तिवाद और संकुचित राष्ट्रवाद ने ले लिया।जैसे पूरे सवा सौ करोड़ भारतीयों में चंद व्यक्ति समूह और राजनीतिक दल के पास ही भारत के नेतृत्व करने की क्षमता है।लगता है मानो हिंदुस्तान का विकास सिर्फ उनके विचारधारा और दृष्टिकोण से ही संभव है!

मुझे तो  लगने लगा है भारत कहीं नाजीवाद फासीवाद के रास्ते पर तो नहीं चल पड़ा।राष्ट्रवाद के नाम पर कट्टरवाद हावी तो नहीं होने लगा।बदलाव के नाम पर विकृत सोच तो नहीं लादा जाने लगा ? जब फिर से लोगों को मजबूर कर दिया जाएगा कि सत्ताधारी लोगों द्वारा जो कुछ भी कहा जाए चाहे वह सही हो या गलत संविधान और विधि सम्मत हो या इसके विरुद्ध नैतिक हो या अनैतिक लोग बिना चर्चा के स्वीकार कर लें।पिछले दिनों जिस प्रकार से देश में बने कुछ कानून के कुछ प्रावधानों पर जब कुछ लोगों ने अपना विरोध दर्ज कराया तो उसके बदले उन्हें कानूनी लफड़े में फंसाया जा रहा है। सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर पत्रकारों कवियों लेखकों कलाकारों बुद्धिजीवियों तक को कानून के शिकंजे में कसा जा रहा है।यह कहीं से भी लोकतांत्रिक देश मे जायज नहीं ठहराया जा सकता। कुछ लोग अगर विरोध दर्ज कराते हैं तो उन्हें अपनी बात रखने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए उस पर विशेषज्ञ समिति बनाकर गंभीरता पूर्वक चर्चा हो और फिर एक बीच का रास्ता निकाला जाना चाहिए ताकि सभी लोगों का विश्वास संवैधानिक प्रावधानों कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रणाली में बनी रहे।

आज हम विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं।रक्षा के क्षेत्र में नई तकनीक और रक्षा उपकरणों के लिए विदेश पर निर्भर है।कृषि के क्षेत्र में हालत खराब है।आधारभूत संरचना चरमरा रहा है।आज भी आधे अधूरे.सड़क गाड़ियों से अटे पड़े हैं।प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है पर्यावरण की चिंता नहीं है नदिया मैली हो रही है पर्वतों का अस्तित्व मिटाया जा रहा है जंगल संकट से जूझ रहे है।अस्पतालों का हाल सर्वविदित है शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो चुका है।इस पर गंभीरता पूर्वक चर्चा नहीं किया जा रहा।गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की जगह अब केवल परीक्षा पास करने के लिए और करवाने के लिए होता है।अधिक बच्चे पास हो इसके लिए बहुविकल्पीय व्यवस्था किया गया बच्चे अच्छा करें इसके लिए लघु और दीर्घ उत्तरीय सवाल नहीं दिए जाएंगे।अब सब कुछ रेडीमेड होने लगा है।

बहुत वर्षों बाद फिर से चारों तरफ आडंबर को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि लोग शिक्षा से विमुख हो मूलभूत समस्याओं की ओर उनका ध्यान न जाए। युवाओं के हाथ में रोजगार हो व्यवसायिक जानकारी हो इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।पर बेरोजगारी पर बात ना हो न्यूनतम मजदूरी की बात ना हो इसके लिए हर दिन अलग-अलग राग छेड़ा जाता है और युवाओं को दिग्भ्रमित कर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास हो रहा है।सरकारी संस्थाओं में लोगों को जाने और रोजगार प्राप्त करने से रोकने के लिए निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।नियोजन कॉन्ट्रैक्ट पेंशन आदि की बात नहीं हो रहा।सिर्फ और सिर्फ लोगों में गलतफहमी फैलाकर डर पैदा कर कभी किसी समुदाय विशेष के बारे में कभी किसी देश के बारे में भावनात्मक रूप से देशवासियों को ब्लैकमेल कर वोट लेने की राजनीति पर काम चल रहा है।इस हालात में विकास की बात बस गोलम गोल हो गया है.संघवादी मानसिकता के कारण आज सामाजिक भेदभाव बहुत तेजी से पैर पसार रहा है एक बार फिर देश में सामंतवादी प्रवृत्ति सर उठाने लगी है।अब समाज के उत्थान के बात करना भी गुनाह माना जाने लगा।

जो लोग समाज और देश के उत्थान की बात करते हैं उन्हें विखंडनवादी सोच वाले लोग गलत ठहराने का काम करने लगते हैं।वे हर हाल में अपनी ठसक बनाए रखना चाहते हैं।इन्हीं सब कारणों से विकास की बात कहीं कोने में सिसकी लेने लगा है।जिस देश में कभी विवेकानंद महात्मा गांधी सुभाष चंद्र बोस डॉक्टर भीमराव अंबेडकर सरदार पटेल बी पी मंडल कर्पूरी ठाकुर जगदेव प्रसाद आदि के नाम पर चुनाव में चर्चा होता था।उनके विचार पर वाद विवाद होता था।लेकिन आज किन लोगों के नाम पर चर्चा हो रही है इसी से समझा जा सकता है हम किस ओर जा रहे हैं।क्या हम समतावादी विकास की तरफ बढ़ रहे हैं या पूंजीवादी विकास की तरफ ?

आज देश में जिस तरह से पूंजी का केंद्रीकरण मुट्ठी भर लोगों के पास हो रहा है वह क्या बताता है? हर महीने सुनने को मिलता है कोई सरकारी फार्म एजेंसी कंपनी किसी निजी व्यक्ति और समूह को सौंप दिया गया।यह क्या हो रहा है क्या यही विकास है ? जिस देश में एक दशक पहले तक राष्ट्रीय संपत्ति बनाने पर जोर दिया जाता था आखिर क्या हो गया कि अब दिन रात राष्ट्रीय संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने के लिए उतावलापन दिखाया जा है।

जिस देश के निजाम चुनाव जीतने के लिए अपने प्रांतों के निजामों को भला बुरा कहता हो वहां किस बात की गुंजाइश है समझा जा सकता है।अगर किसी प्रांत का निजाम गलत कर रहा है तो उसे हटा दिया जाना चाहिए ना की देश के निजाम उस प्रांत के निजाम को जलील करे।अगर वह गलत है तो उसे न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।निजाम को अपने सारे प्रांतों के मुखिया पर एतबार करना चाहिए।मगर यहां क्या हो रहा है उनके द्वारा किए गए विकास को कभी महत्व नहीं दिया जा रहा बस किसी प्रकार से सत्ता हासिल हो जाए इसके लिए सरकारी धन खुले हाथ लुटाया जा रहा है।

वर्ष का शायद कोई ऐसा महीना ना हो जिसमें हमारे देश में किसी न किसी प्रांत में प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा यहां तक की प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री और मंत्रियों द्वारा रैली नहीं किया जाता और उसमें धन को पानी की तरह बहाया नहीं जाता।आखिर क्या मजबूरी है राजनीतिक दल डिजिटल युग में भी गली गली नुक्कड़ नुक्कड़ और शहर शहर वोट मांगने के लिए रैलियां करते हैं।अपने झूठे वादों के सहारे चुनाव जीतने का दंभ भरा जाता है वैसे हालत में विकास की बात करना बेमानी नहीं तो और क्या? इसलिए मेरा मानना है कि विकास के लिए व्यक्तिवाद परिवारवाद जातिवाद संकीर्ण राष्ट्रवाद धर्मांधता संप्रदाय वाद संघवाद विखंडन वाद और अंधविश्वास जैसे विचारधारा से सर्वप्रथम छुटकारा पाना होगा,और देशवासियों को समाजवादी राष्ट्रवाद समतावाद के साथ विकास का नारा बुलंद करना होगा।



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