बड़े घर की बहु
| -RN. Feature Desk - Feb 24 2020 1:35PM

सोचती हूं एक महंगे आभूषणों में सजी सवरी सुंदर वस्त्रों में लिपटीसी बड़ी शालीन सी महिला नजर आती है। ढेर सारी परंपराओं का निर्वाहन करती है। अपनी महिला रूपी स्वाभाविकता को बरकरार रखती है। अपने परिवार की हर छोटी-बड़ी सुविधा का ध्यान रखती है और उनके जीवन को श्रेष्ठ बनाने में ही अपने जीवन की खुशियों को ढूंढती हैं। पति का साथ देती है। उसकी जरूरतों को पूरा करती है ताकि वह एक सफल व्यक्ति बन सके और आर्थिक, सामाजिक रूप से सुदृढ़ हो सके। सभी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है । लेकिन जब वह बेटी के रूप में हमारे घर में जन्म लेती है तो पुरुष सत्ता प्रधान समाज उसके आगमन पर इतना खुश नहीं होता।

कई बार तो वह भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध भी करता है। कभी गरीबों की बेटियां की भ्रूण हत्या होती है क्या? तो हमारा मध्यम और अभिजात्य वर्ग उसको धरती पर अवतरित ही नहीं होने देना चाहता है। वजह होती है पराया धन और दहेज रूपी  दानव जो हमारी बेटियों को पैदा करना ही नहीं चाहता है फिर जन्म हो भी जाए तो बचपन से उसे परंपरा और मर्यादाओं की घुट्टी देना शुरू हो जाती है। यह एहसास कराया जाता है कि तुम बेटी हो तुम्हारा कर्तव्य, समर्पण, सिर्फ पुरुष के लिए है। जैसे-जैसे वही गुड़िया परिपक्व होती है। सामाजिक परंपराएं, निषेध उसको जकड़ते जाते हैं और वह घर की देहरी से बाहर जब कदम रखती है तो ढेर '''सारी बंदिस उसको दी जाती हैं क्योंकि हमारा समाज बेटियां को गंदी दृष्टि से देखता है और उनका शारीरिक शोषण करना चाहता है।

हम सभी इस असुरक्षा से ग्रसित हैं किंतु फिर भी अपनी अपनी बेटियों को सुरक्षित नहीं कर पा रहे हैं। वजह है हमारा पुरुष प्रधान समाज और उसका नजरिया अपनी बेटी और पराई बेटी के प्रति प्रथक सोच। फिर जब बेटी की शिक्षा की बात होती है तो भाइयों को पूरी आजादी के साथ कहीं भी पढ़ने भेज दिया जाता है पर बेटियों को सीमित क्योंकि परिवार सोचता है कि वह नाजुक है और आत्मविश्वास का अभाव है। क्या कोई फुल छोटे से गमले में लगा देने से अपने स्वाभाविक रूप से खिल पाएगा? नहीं ना, तो फिर बेटियों के साथ ऐसा क्यों? बेटी की विदाई करने की बात आते ही हर माता-पिता के माथे पर चिंता की लकीर है खींची जाती हैं। उनकी मुस्कुराहट गायब हो जाती है क्योंकि उसका जीवनसाथी ढूंढना है। पूंजीपति होती हमारी देश की सोच और दहेज रूपी दानब की मांग मजबूर करके  हताश कर देती है परिवार को ।कैसे पीले होंगे हाथ बेटी के ।बर कैसा होगा ।फिर कई समझौतों और फिजूलखर्ची के बीच शादी संपन्न हो जातीहैं।

अब एक बच्ची एक महिला के रूप में जन्म लेकर ढेरों सपनो को मन में बसाए अपने पिया के घर आ जाती है। जहां उसे नाना प्रकार के अवलोकनों से  परिभाषित किया जाता है। उसके समर्पण की सीमा में कब उसके चंचलता समाप्त हो जाती है पता ही नहीं चलता। शनै-शनै वह पराए घर और पर को अपना बनाने का प्रयतन करती है। अपने सपनों की तिलांजलि दे देती है। वह सपने जो उसके अपने माता पिता के द्वारा दी गई शिक्षा से प्राप्त किए थे। डॉक्टर इंजीनियर, वैज्ञानिक, जज, शिक्षक, नेता आदि आदि बननेके। अपनी योग्यता को जीजान लगाकर साबित किया था। कितनी खुशी मिलती थी उसे कक्षा में उच्च अंक पाने में ।पड़ोस में भाई बहनों से आगे निकलने में, अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में। माता पिता के खून पसीने की गाड़ी कमाई से प्राप्त शिक्षा में यह सोच कर की एक दिन मेरा भी नाम होगा पहचान हो गी। देश के, समाज के, विकास हेतु, मेरा भी कुछ योगदान होगा 

किंतु यह क्या पति के दहलीज चढ़ने के बाद सारे सपने तारतार खो गए और वहीं रोटी, चौकी, बेलन और परिवार। मेरा एक प्रश्न है सभी महिलाओं और बहू से क्या वास्तव में हमें अपने अस्तित्व को इस तरह खो देना  जायज है क्या ?हमारी योग्यता बिल्कुल ही अपाहिज है। क्या हम वाकई में असमर्थ है या हमने परिवार की आड़ में अकर्मण्यता की चादर ओढ़ ली है की कौन दुनिया का संघर्ष करें। जब हमें एक सीधी साधी जिंदगी मिल रही है तो क्यों हम ऊर्जा को बर्बाद करें। हम अपने योगदान को विलासिता भोगने में लगा देते हैं और आने वाले कल को समाज को श्रेष्ठ बनाने में असमर्थ हो जाते हैं। कायर एवं स्वार्थी है वह बड़े घर की बहू जो सिर्फ अपने लिए जीना चाहती है।



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