कृषक सुन्दरी
| -RN. Feature Desk - Mar 5 2020 4:14PM

प्रिय आइ गयी जब खेतन में, समझो हरियाली आइ गयी है
धानी चुनर सिर पर धारयो, सौन्दर्य तुम्हारि बढ़ाइ गयी है
जौ दाना पानी लै आई, सब दूरि धरयो इक कोने मा
बस एक झलक वाकी जौ दिखी, सब भूखि पियास बुझाइ गई है

देखि हंसी अधरन पै जब, तब सारी थकान भुलाइ गई है
जब होंठ खुली दुइ बात किहीं, सब ही अवसाद हेराइ गई है
जब बेगि हवा कै तेज चला, तब पल्लू सिर से उड़़ाइ गई है
केश दिखे घनघोर घटा, ज्यों बादरि उमड़त आइ गई है

अधरन कै मुस्कान से ही, मन में खुशियाली आइ गई है
धनुहीं सम ई अधरन से, ऊ तीरै अइसन चलाइ गई है
हाथ कुदाली छूटि गई, अउ घायल हमके बनाइ गई है
ए हो तनी पानी पी लीं, सुनिकै मदहोशी छाइ गई है

झुमकी पायल अब बनिहैं नया,जस अबकी फसल लहराइ रही है
आभूषण हमार तुहीं बाट्या, अस ज्ञान उ हमके बताइ रही है
प्रेम हृदय से आंखी मे आ, अखियां खुद ही भरराइ गई है
खेते मा जइसे ही पांव पड़ा, जस कवनो देवी आइ गई है

पांव महावर बाटै लगा, अउ धूरि दिखे शरमाइ रही है
पांव में पाहुन तक न जुरै, ऊ नंगे पांव ही आइ रही है
बाति करैं सुन्दरता की, रति रानी भी आंखि चुराइ रही है
नाही मिटै इतिहासौ मा,अइसन पदचिन्ह बनाइ रही है

तेज लिलार पै बा बहुतै, अउ टिकुली शोभा बढ़ाइ रही है
भोर भये जस सूरज से,अस माथे पे लालिमा आइ रही है
जब कर मा लेवै कछु खावै का, तब खावै से पहिले मनाइ रही है
भक्तिन ह्वै ऊ शंकर कै, कछु खावै से पहिले चढ़ाइ रही है

जब नीर भरल ऊ पात्र दिहीं,तब हाथे मा हाथ छुवाइ रही है
स्पर्श सुखद अनुभव कइकै, ऊ पूरी थकान मिटाइ रही है
जब गुड़ खाये वै हाथन से,इक अलगै स्वाद बनाइ रही है
पानी मा प्रेम घुली अमृत, खुद हाथन से ही पिलाइ रही है

धन्य ह्वै मेहरि कृषकों की, जौ प्रेम से पानी पिलाइ रही है
शहरी मेहरिया कै देखि दशा, दुलहीं गउवां मुस्काइ रही है
अस प्रेम देखि 'एहसास' भइल, कइसे ई घरवा बनाइ रही है
सबही परिवार का साथ लिहे, ई आगे कइसे बढ़ाइ रही है।।



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