महिला दिवस क्या एक फैशन..?
| -RN. Feature Desk - Mar 8 2020 4:10PM

मैं वोमे्न्स डे वाले दिन कुछ नहीं कहती एक चिढ़ सी होती है, इसलिए नहीं कि लड़कियां अभी भी पीछे हैं। सामाजिक रूप से गौर किया जाए तो कई पहलू दिखाई देते हैं कहीं आर्थिक स्थिति, कहीं अशिक्षा, कहीं धर्मांधता या परिवेश ऐसा होता है कि लड़कियां आगे बढ़ नहीं पाती हैं। लेकिन मुझे क्रोध इसलिए आता है महिला सम्मान या महिला दिवस सिर्फ मीटिंग, फंक्शन मात्र तक सिमट रहे हैं और जमीनी हकीकत से दूर हो रहें हैं। मैं ऐसा नहीं कह रही कि लड़कियों का विकास नहीं हो रहा है या वह नए कीर्तिमान नहीं स्थापित कर रही हैं, लेकिन अभी भी कहीं न कहीं स्त्रियां दुखी और पीड़ित हैं। उनकी भावनाओं की कद्र नहीं होती है और उन्हें दोयम दर्जा मिलता है। अखरने वाली बात यह भी लगती है कि महिला का सम्मान किसी एक दिन का मोहताज क्यों? जब वो सम्माननीय है तो उसे सहयोग कर उसका सम्मान बढ़ाइये। 

महिला दिवस क्यों मनाया जाता है इसकी जानकारी भी सही तरीके से लोगों नहीं होती है। लेकिन प्रचार-प्रसार करने में लोग आगे रहते हैं। एक नजर इस बात पर कि महिला दिवस क्यों मनाया जाता है? 8 मार्च को पूरी दुनिया में महिला दिवस मनाया जाता और करीब 29 देशों में इस दिन सार्वजनिक छुट्टी होती है। साधारणतया इस दिन लोग महिला के त्याग, समर्पण या किसी उपलब्धि की सराहना करते हैं। स्त्री को कोई उपहार देकर महिला दिवस की खुशी जाहिर करते हैं। सही है, लेकिन ये सिर्फ एक मनोरंजन का साधन भर होता है। स्त्रियों को पूजना या उपहार देना महिला दिवस नहीं है बल्कि सही मायनों में उनका आत्मबल बढ़ाना और और जमाने के साथ कदमताल मे सहयोग करना, उनके लिए सम्मान से कम नहीं है।

महिला दिवस मजदूर दिवस की तरह ही अस्तित्व में आया। जब एक आम इंसान की तरह अपना हक और सम्मान पाने की इच्छा स्त्रियों में जगी। 8 मार्च 1857 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में कपड़ा मिलों में काम करने वाली महिलाओं ने बहुत बड़ा प्रदर्शन किया और दो साल बाद उनके विरोध प्रदर्शन की वजह से उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार मिला। यह महिला आंदोलन काम करने की खराब परिस्थितियों, कम वेतन और काम के घंटे को 12 घंटे करने की मांग को लेकर था और करीब 50 साल बाद 8 मार्च 1908 में ही न्यूयॉर्क में करीब 15000 महिला मजदूरों की वेतन बढ़ाने, काम के घंटे को कम करने, महिलाओं को वोट का अधिकार और बाल मजदूरी को खत्म करने की मांग की और उसके विरोध में प्रदर्शन किया।

करीब 20 से 30 हजार महिलाओं ने इस हड़ताल में हिस्सा लिया और यह हड़ताल 13 हफ्तों तक चली। 1910 में कम्युनिस्ट महिला नेता क्लारा जेटकिंग ने कोपेनहेगन में आयोजित किए गए दूसरे इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑफ वर्किंग विमेन में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का विचार दिया था। यह विचार उन्हें 1909 में न्यूयॉर्क में हुए महिला दिवस से आया। इस कांफ्रेंस में 17 देशों के 100 महिलाओं ने भाग लिया।

1911 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। आस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में बहुत बड़े स्तर पर महिला दिवस मनाया गया। प्रथम विश्व युद्ध की संभावनाओं को देखते हुए 1913 में विचार-विमर्श के बाद शांति की अपील के साथ 8 मार्च 1914 को महिला दिवस मनाने का फैसला लिया गया। तभी से महिला दिवस मनाने की परंपरा शुरु हुई। महिला दिवस मनाने की शुरुआत जिन मांगों को लेकर हुई थी उन  मांगों को आज कई देशों ने मान लिया है, लेकिन अभी भी कई ऐसे मुद्दे हैं जिसके लिए महिलाएं संघर्षरत हैं लेकिन हम मुद्दों से भटक कर सिर्फ दिखावे की ओर बढ़ रहे हैं।

आज राजनीतिक क्षेत्र में भी महिलाएं आगे आ रही हैं और अपने आप को साबित कर रही है लेकिन इतने सशक्तिकरण के बावजूद महिलाएं पुरुषवादी समाज के प्रहार को झेल रही है, जिसे "बेलो द बेल्ट" कहा जाता है। ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। बेहतर होगा कि हम दिखावा करने के बजाय महिला दिवस के सही रूप को पहचाने और उसे बढ़ावा दें। महिला दिवस  कहीं फैशनपरस्ती का शिकार ना बन कर ना रह जाए...?



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