अनोखी परंपरा : यहां प्राकृतिक फूलों से खेलते हैं होली, तय करते हैं शादियां
| -RN. Feature Desk - Mar 9 2020 3:51PM

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मीरजापुर, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रंगो की बजाय कंकड़ मार होली खेलते हैं आदिवासी समाज के लोग

भारत देश विविध परंपराओं और पर्वों वाला देश है. जहां की  संस्कृति और पर्वों की पौराणिकता भी विविधता से भरी हुई है. यहां अपनी संस्कृति और पर्वों को भी कुछ अनूठे ढंग से मनाने की तरह तरह की परंपराएं हैं. इन्हीं में से एक होली का पारंपरिक त्यौहार भी शामिल होना बताया जाता है जिसे आदिवासी समाज के लोग कुछ अलग हटके अपने ही अंदाज से मनाते हैं. होली के अनेक रंग होते और इसे मनाने का तरीका भी अलग अलग होता है कहीं पर यह रंग मार होली के रूप में तो कहीं पर लट्ठमार होली के रूप में मनाई जाती है. वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज के लोग इस दिन कंकड़ मार होली खेलते हैं.

जहां पर केमिकल युक्त रंग एवं पानी का बिल्कुल प्रयोग नहीं होता. योग कहें कि यह पूरी तरह से आधुनिकता सेे कोसों दूर होते हैं. इस दिन आदिवासी समुदाय के किशोर अपने बल पौरुष का परिचय देकर शादियां पक्की करते हैं. छत्तीसगढ़. मध्य प्रदेश तथा  उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, घोरावल, मीरजापुुर जिले के पास वाले कुछ गांव में भील आदिवासी के गांव हैं जहां आज भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं होली के दिन इस समुदाय के लोग सबसे पहले अपने कुलदेवता और अपने धनुष बाण की पूजा करते हैं फिर घरों में पकवान बनाते हैं और दोपहर के समय मानर की थाप पर करमा नृत्य करते हुए एक दर्जन की झुंड में जंगली फूलों एवं अन्य सुगंधित फूलों की मदद से युवक-युवतियों पर फूलों से मारकर के होली खेलते हैं.

गुलाल की जगह यह गुलाब एवं अन्य सुगंधित फूलों को उनके शरीर पर मलते हैं. इस समुदाय के श्यामल, मींज, जैकलिन ने बताया कि इस दिन हम लोगों के घरों में भी पकवान बनता है. पूजा के बाद मानर की थाप पर करमा नृत्य करते हुए पंडवानी, पांडवों की वीर गाथा के गीत गाते हैं. इस दौरान महिलाएं पुरुषों पर कंकड़ बरसाती हैं, जैकलिन और श्यामल ने बताया कि होली में पानी का बिल्कुल प्रयोग नहीं होता. अबीर गुलाल की जगह प्राकृतिक फूलों का प्रयोग होता है.

उसने यह भी बताया कि पांडवों की वीरगाथा से प्रेरित होकर कुंवारे लड़के किशोरियों के हाथ पकड़ते हैं जो किशोर किशोरी के कंकर का बचाव करते हुए उसका हाथ पकड़ लेता है और किशोरी के लाख प्रयास करने के बाद भी हाथ नहीं छोड़ता समुदाय के लोग उससे उसकी शादी करने का फैसला कर लेते हैं और मुहर लगा देेेेते हैं. मीरजापुर में इस समुदाय के लोग नगण्य हैं. एक ‌दो परिवार जो भी होते हैं वह छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश चले जाते हैं अपनी लड़कियों को साथ लेकर और वहीं पर जाकर के विधिवत इस त्योहार को मनाते हैं और शादियों को पक्की करते हैं.

"जड़ी बूटी एवं तंत्र मंत्र से करते हैं उपचार"

जंगलों में रहने वाले आदिवासी भील समुदाय के लोग अत्याधिक धार्मिक प्रवृति के होते हैं. देवी-देवताओं पर इनका अधिक विश्वास होता है. यह अपने किसी भी बीमारी का इलाज जंगली जड़ी बूटियों एवं देवी उपासना से करते हैं. अत्यधिक बुखार आने पर अपने शरीर को गर्म लोहे से दागते है. विज्ञान के युग में आज भी यह अपने पुराने परंपरा पर कायम है पर अब कहीं कहीं ही ऐसा है.



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