कर्नाटक मॉडल : कुर्सी प्राप्ती का फसली फार्मूला
| -RN. Feature Desk - Mar 12 2020 2:05PM

आपके हमारे वोट देने मात्र से किसी की सरकार बन जाएगी तो यह वोटर देवता जी आपका सिर्फ भ्रम है। चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें लेकर कोई चुनावी दल आगे आता है, तो वह यह भी भरोसा ना करें कि वह अपनी सरकार बना ही लेगा। सच तो यह है कि आजकल सरकार बनाने का कार्यक्रम विभिन्न मॉडलों पर निर्भर है। गोवा, महाराष्ट्र, मणिपुर, कर्नाटक आदि ऐसे मॉडल हैं जिनके आधार पर सरकार बनाई जाती है। इन्हीं मॉडल पर सरकारें गिराई जाती है। इन सब मामलों में कर्नाटक मॉडल सबसे आगे है और प्रभावशाली भी बन पड़ा है। महाराष्ट्र मॉडल भी इस रेस में मौजूद है। शुरू में ही कर-नाटक के फंडे द्वारा ही कर्नाटक ने कुर्सी झपटने में एक नई राह दिखाई।

इस मॉडल में होटल और रिसॉर्ट में नेताओं की बाड़े बंदी की जाती है। होटल और रिसॉर्ट में कुर्सियों का आपस में बंटवारा किया जाता है। एक परफेक्ट डीलिंग होती है। जब मिल बांटकर कुर्सियों की आपस में बंदर-बांट कर ली जाती है, तो फिर कर्नाटक मॉडल अपना रंग दिखाना शुरू करता है। कर्नाटक मॉडल इतना तिलिस्मी है कि इससे कोई पता ही नहीं चलता है कि कौन किसके साथ है और कौन किसके साथ नहीं है। जो आज आपकी थाली में खाना खा रहा है वह पहले से ही थाली में छेद करके बैठा हुआ है। वह थाली का बैंगन बना बैठा है। मुंह में राम-राम और बगल में छुरी-तलवार लिए बैठा हुआ है। जो अल्पमत में है वह सीएम हो सकता है और जो बहुमत में है वह किनारे बैठ ताश के पत्ते फैंटते देखा जा सकता है।

कुर्सी तू बड़ी भाग्यवान कौन तपस्या कीन? बहुमत, अल्पमत, अमत सब तेरे आधीन। कुर्सी देखते ही हर किसी के मुंह में पानी का टैंकर समा जाता है। कर्नाटक मॉडल यह कहता है कि जब किसी की कोई महत्वाकांक्षा हो तो वह असंतुष्टि का झुनझुना बजाते- बजाते कुर्सी पर बैठ सकता है। इन सब तथ्यों में यह नहीं कहा जा सकता है कि यह सब कुर्सी का भाग्य है या भाग्य की कुर्सी है। चेयर रेस का यह कायदा होता है कि जब म्यूजिक बंद हो जाता है तो जल्दी से कुर्सी झपट नहीं होती है, लेकिन पॉलिटिकल चेयर में म्यूजिक बंद होने के बाद भी कुर्सी पर चढ़ने का कार्यक्रम बेकायदे से जारी रहता है।

महाराष्ट्र मॉडल का तो आपको ध्यान ही है कि जब कुर्सी सामने दिखाई पड़े तो जो एक दूसरे के सामने तलवारें लेकर गरदन काटा करते थे वे एक दूसरे को फूल देकर सामूहिक रूप से कुर्सी पर विराजित हो जाते हैं। जो लोग एक दूसरे के साथ गलबहियां डाले हुए आपस में फूल सुंघाया करते थे, उन्होंने अपने हाथों में कटारें निकाल ली। यह सब आधुनिक बैंगलोरी रिसॉर्ट और होटलों का कमाल है। इन होटलों और रिसॉर्ट में ही आधुनिक राजनीति तय होती है। आजकल सीएम की कुर्सी इनसे ही निकलती है। मंत्री पद होटलों में तय किए जाते हैं। तो वोटर भैया! अब तो तुम समझ जाओ क्योंकि तुम्हारे वोट देने मात्र से कोई सरकार बन जाएगी और कोई मंत्री बन जाएगा, यह केवल तुम्हारा वहम है। फिलहाल देश में कर्नाटक मॉडल कुर्सी प्राप्त करने का फार्मूला पूरे देश में दिखाई पड़ रहा है। कुर्सी का रास्ता रिसॉर्ट से होकर निकलता है सिरी मान जी!



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