खांसीमय जग संसारा, बेचारा फोन भी हारा!
| -RN. Feature Desk - Mar 16 2020 11:46AM

आजकल जब भी फोन उठाता हूं फोन बेचारा खांसने लगता है। जब किसी दूसरे को फोन लगाता हूं तो वह भी धांसने लगता है। खांसीमय जग संसारा, बेचारा फोन भी हारा! शास्त्रों में कहा गया है कि चोर को खांसी और संत को दासी मुसीबत में डाल देती है। चोर की मम्मी प्रार्थना करती है कि मेरे बेटे को चाहे हैजा, टीवी, मलेरिया, कोरोना ही क्यों ना हो जाए, लेकिन खांसी नहीं होनी चाहिए। संतो के लिए दासी की एक प्रकार की खांसी ही है। शास्त्रों में फिर से कहा गया है कि सभी रोगों की जड़ खांसी ही होती है और सभी झगड़ों की जड़ हांसी ही होती है। तभी कहा है- 'हंसी तो फंसी!' कई बड़े बुजुर्ग तो अपनी बहुओं के सामने केवल खांस-खांसके ही सारी बातचीत कर लेते हैं। घूंघट की ओट में बहू खांसी के तरीकों से सारी बातें समझ जाती है। पड़ोस में श्याम लाल जी सिगरेट पीते हैं, फिर सिगरेट इन्हें तसल्ली से पीती है।

ये ऐसे खांसते हैं जैसे तीन तबले गले में बांध रखे हों। वे पहले विलंबित ताल में बजते हैं और उसके बाद द्रुतगति में बजते ही चले जाते हैं। चौधरी जी हुक्केबाज हैं। खांसते ऐसे जैसे कोई स्टीम इंजन किसी पुल से गुजर रहा हो और साथ में जोर से सीटी भी मार रहा हो। डॉक्टर ने कई बार कहा कि दादा हुक्का छोड़ दो; बदले में ये डॉक्टर पर मुक्का छोड़ देते हैं। फिर नियमित रूप से स्टीम इंजन वाली रेलवाई खांसी वातावरण में छोड़ते हैं। खांसते-खांसते उनके फेंफड़े मुंह से निकल कर बाहर जमीन पर गिर पड़ते हैं। फेंफड़े सड़क पर गिरे तड़पते है, तब बलगम व फेंफड़ों का भरत मिलाप चलता ही रहता है। बीड़ी वाले की खांसी धीमी गति से होती है। बीड़ी वाले और हुक्के वाले की खांसी में बड़ा अंतर है, और होना भी चाहिए। अगला हुक्का पीता है तो इसकी खांसी में ज्यादा दम होना लाजमी होता है।

मेरे मोहल्ले में कई प्रकार के खांसी बाज रहते हैं। तरह-तरह की विचित्र प्रकार की खांसियां हमारे मोहल्ले का विजन एंड साउंड शो बन चुका है। रामलाल जी खांसना शुरू करने से पहले अपना पूरा हाथ गले में डालते हैं। वे ढेर सारा बलगम धरती माता पर विसर्जित करते हैं। लार की नदियां बहाते हैं और लगातार 3 घंटे तक इस तरह से खांसते व बलगमाते रहते हैं जैसे इनके पेट में कोई 15 से 20 गधे बैठे हों। ये वर्षों से खैनी बगैर रगड़े ही खा रहे हैं और खैनी अब इनको डेली रगड़ते हुए खा रही है। एक अन्य सज्जन खांसते हैं, रुकते हैं। खांसते हैं, रुकते हैं। फिर लगातार खांसते रहते हैं। इनकी कलात्मक खांसी किडनी से ही उठने लगती है।

अंदर से उनकी किडनी भरतनाट्यम करती है। फिर सामने वाले पर थूक की बारिश करने लगते हैं। थूक की बारिश और खांसना बराबर अंतराल से चलता रहता है। एक महाशय तो ऐसे खांसते हैं जैसे उनका कुत्तों से कोई कंपटीशन चल रहा हो। खांसने के मामले में कुत्ते उनसे रहम की भीख मांगते हैं कि दादा तुम जीते हो और हम हारे। लेकिन फिर भी ये नहीं मानते। माने भी क्यों? रोज देशी ठर्रा ऐसे ही थोड़े मारते हैं! अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो कोरोना के मरीज की यह खांसी सुन-सुनकर परेशान हो गए हैं तो अब और परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसका समाधान मिल गया है। सीधे नमस्ते कहो और सफाई से रहो। वरना खांसी का ये स्टीम इंजन मंगल तक दंगल करेगा।



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