निर्भया और बलात्कारी सोच
| -RN. Feature Desk - Mar 21 2020 1:58PM

12 दिसंबर 2012 की वह काली रात जहां दिल्ली जैसे महानगरीय जीवन शैली के बीच 22-23 साल की लड़की के साथ दरिंदों ने अपने दरिंदगी को अंजाम दिया था वह भी उसके दोस्त के सामने। यह सोचकर रूह कांप जाती है और सोचने लगती हूं कि हम और हमारा समाज कितना पतित हो गया है जहां हैवानियत की सारी सीमाएं ही टूट गईहैं। हम कितना दोगला जीवन जीने लगे हैं। एक और हम अपने बच्चों, बेटियों और परिवार की महिलाओं को कितना महत्व देते हैं और दूसरी ओर अन्य को मात्र शोषण करने के लिए इच्छुक किसी भी रूप में रहते हैं। हमारी यही सोच ही हमारे समाज के असुरक्षित होने की कहानी बनती है। आज हर तबका समाज का यदि असुरक्षित महसूस करता है तो यही शोषण की भावना प्रमुख होती है जिसे हम कभी भ्रष्टाचार, अत्याचार और अपराध का नाम देते रहते हैं। 

                महिला सुरक्षा की बात जब आती है तो सबसे प्रमुख कारण हमारी पुरुष प्रधान समाज की कुष्तिष सोच को  जाता है। जहां पुरुषों को हर जायज-नाजायज कार्य करने की आजादी है और महिलाओं को उनकी भोग्या बनने की सोच। हम भले ही अभी 21वीं सदी में जी रहे हैं सिर्फ तकनीक के उपयोग में किंतु हमारी नैतिकता और संस्कार तो और भी पाशविक होते जा रहे हैं। जन संहारक खतरनाक हथियारों का आधुनिक तकनीक के रूप में दिन प्रतिदिन बढ़ती होड़ की हवस भी उसी असुरक्षित समाज को प्रदर्शित करती है। 

                   इतना आधुनिक होते हुए भी हम अपने बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित नहीं कर पा रहे हैं निर्भया कांड के बाद जैसे सामूहिक बलात्कार के केसों की समाज में बाढ़ सी आ गई। हर दिन अखबारों, न्यूज़ चैनलों में बस रोज की खबर कोई हल नहीं। हमारा समाज नई टेक्नोलॉजी 2G, 4G का मजा ले रहा था या है जिसमें जिसमें सारी दुनिया का खुलापन बिना किसी पाबंदी के निरंतर चल रहा है और अपराध भी उसी गति से आगे बढ़ रहा है। 

                  अत्यधिक आर्थिक संपन्नता भी हमें अपराध करने की आजादी देती है जहां कानून और सत्ता का अपने-अपने तरीकों में इस्तेमाल किया जाता है। बढ़ती बेरोजगारी और नशाखोरी भी इसी सोच को बढ़ावा दे रही है। आधुनिक समाज नैतिक संस्कार रहित अपनी मौलिक जवाबदेही रहित होता जा रहा है। जहां हम सिर्फ और सिर्फ मैं तक ही सीमित होते जा रहे हैं।

                  किसी भी रिश्ते का मूल्यांकन सिर्फ उसकी आर्थिक संपन्नता और राजनीतिक रूप से पहचाना जाता है और दोष महिलाओं की आजादी और फैशन को दिया जाता है। महिला समाज भी स्वछंदता की उड़ान में अपने संस्कारों की तिलांजलि दे चुका है। सचमुच दोष उन लड़कों का नहीं हमारे संस्कारों और समाज की मानसिकता के बलात्कार को प्रतिपादित करता है। जहां सिर्फ वासनाएं ही प्रमुख हैं। अन्य व्यक्ति की भावनाएं और सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है। 



Browse By Tags



Other News