हिंदी भाषा : साहित्य की ओर पहला कदम...
| -RN. Feature Desk - Mar 28 2020 3:11PM

कोई भी भाषा खराब नहीं होती। हर भाषा अपने आप में समृद्ध है लेकिन जो भाषा बातचीत में सरल और स्पष्ट हो वही मान्य है। आम बोलचाल की भाषा में हिंदी सबसे सरल भाषा है। आप कहीं भी जाइए किसी भी प्रांत में वहाँ की भाषा न समझने पर हिंदी के जरिए हम अपनी बात आसानी से कह समझ लेते हैं लेकिन आधुनिकीकरण और समय के साथ समाज में हो रहे बदलाव ने हिंदी को नगण्य बनाकर रख दिया है। आज बच्चे हिंदी ठीक से पढ़ नहीं सकते, बोल नहीं सकते। यहाँ तक कि शिक्षक भी ठीक से हिंदी नहीं पढ़ाते। शिक्षकों को जानकारी का अभाव और अनुभव का न होना हिंदी जैसे विषय के लिए एक दुखद प्रश्न बनकर खड़ा है। बच्चे जब हिंदी ही सही तरीके से नहीं पढ़ सकते तो हिंदी साहित्य के बारे में क्या जानकारी हासिल करेंगे?

अक्सर भाषा के साथ धर्म की राजनीति शुरू हो जाती है। ये सही है कि भाषा हमे हमारे धर्म या मजहब का परिचय करवाती है मगर इस पर धर्म की राजनीति उचित नहीं। भाषा हमें हमारी मिट्टी से जोड़े रखती है और वैसे भी भारत में कोस कोस पर पानी और जबान दोनों बदल जाती हैं और ये हमेशा से स्वीकार्य रहा है फिर अब भिन्नता क्यों? क्यों आम, सरल और सहज भाषा को अनदेखा किया जा रहा? एक आम आदमी से बातचीत करते समय आप सबसे पहले हिंदी भाषा को ही अपनाते ताकि आपकी बात सामने वाला आसानी से समझ जाये। तो अपनी मातृभाषा की अनदेखी क्यों?

हमारे यहाँ अंग्रेजी भाषा महामारी की तरह फैल चुकी है। आजकल के बच्चे हिंदी को छोड़कर अंग्रेजी में ही बातचीत करना पसंद करते हैं और प्रमुखता भी उसी भाषा को देते हैं। उन्हें हिंदी बोलने में शर्म महसूस होती है। माता पिता भी अपने बच्चों को अंग्रेजी सीखने और बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। अंग्रेजी में बातचीत को लोग स्टेटस सिंबल समझते हैं। यानि कि साबित करने में लगे रहते हैं वो कितने रॉयल और सभ्य परिवार से हैं और अपने आप को उच्च शिक्षित साबित करते हैं। सवाल ये उठता है कि अंग्रेजी दासता स्वीकार करने वाले लोग जिस समाज और परिवेश में रह रहे हैं वो वहां की सभ्यता और संस्कृति से कैसे मुंह मोड़ सकते हैं? और यह दासता हमें कितना आगे ले जाएगी? हम अपनी मिट्टी से कितना और कितने समय तक जुड़े रह सकेंगे? और इस मानसिकता से कब बाहर आएंगे कि अंग्रेजी पढ़े लिखों की भाषा है और हिंदी गंवारों की?  

महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु और बंगाल समेत कुछ अन्य प्रांतों में भी छात्रों को विकल्प किए जा रहे हैं कि वह चाहें तो अपनी पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी रख सकते हैं जबकि यह सही नहीं है यह अपनी भाषा से मुंह मोड़ने वाली स्थिति है। हिंदी सर्वमान्य भाषा के रूप में रहनी चाहिए। तमिलनाडु में कट्टर हिंदू विरोधियों की वजह से आज भी सरकारी कामकाज अंग्रेजी में होता आ रहा है स्वयं हिंदीभाषियों की मौजूदगी के बावजूद। मौजूदा वक्त में अब धीरे-धीरे हिंदी का विकास देखने को मिल रहा है। आज जरूरी हो गया है कि हिंदी के विस्तार के लिए लोगों को जागरूक किया जाए। हिंदी वाद-विवाद प्रतियोगिता और सामान्य बातचीत के द्वारा हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और अंग्रेजी दासता से बाहर आना चाहिए। हिंदी का विस्तार यानी हमारे साहित्य का विस्तार है आज के बच्चे पुराने लेखकों, कवियों को कितना जानते, पढ़ते और समझते हैं।

हिंदी का विस्तार आज की पीढ़ी को हमारे साहित्य से परिचय करवायेगा। एक जानकारी के अनुसार बीबीसी के संवाददाता मार्क टली भारत में ही जन्मे थे और लोगों से हिंदी में बातचीत किया करते थे। लोग उनकी बात का जवाब अंग्रेजी में देते थे। उन्होंने परेशान होकर कहा कि भारतीयों को हिंदी भूलकर अंग्रेजी ही बोलनी चाहिए। ये जवाब हमारे हिंदी भाषा पर एक तमाचा है। आज भी हमारे देश से ज्यादा विदेशों में हिंदी की पूछ है। लोग हिंदी में बातचीत करना और उन्हें अपनाना पसंद करते है। लघु भारत कहे जाने वाले मॉरीशस में हिंदी के उच्च शिक्षा के लिए कई व्यवस्थाएं हैं। डिप्लोमा कोर्स,  बी.ए.आनर्स हिंदी, एम ए हिंदी की व्यवस्था है। भारत के पड़ोसी देश नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में और श्रीलंका के कोलंबो विश्वविद्यालय में हिंदी का एक अलग विभाग है।

जापान में भी कम से कम आधा दर्जन विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी पाठ्यक्रम चलता है जिनमें से कई में उच्च शिक्षा की व्यवस्था है। अमेरिका में रह रहे सभी हिंदीवासी हिंदी भाषी नहीं है फिर भी वहाँ हिंदी की अच्छी मांग है। इसी वजह से अमेरिका के 75 विश्वविद्यालयों में हिंदी की शिक्षण व्यवस्था है। भारतीयों की तीन प्रमुख संस्थाएं अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, विश्व हिंदी समिति और हिंदी न्याय- अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम करती है। हिंदी की चार प्रमुख पत्रिकाएं भी प्रकाशित होती हैं- विश्व, सौरभ, क्षितिज और हिंदी जगत। विदेशों में हिंदी का रूतबा बढ़ता जा रहा है लेकिन हमारे देश में अभी भी इसके विस्तार की जरूरत है। आज जरूरी हो गया है जब तक हम अपनी भाषा को आगे नहीं बढ़ाएंगे तब तक हमारा साहित्य पनपेगा नहीं। सबसे पहले हमें अपनी मातृभाषा को सम्मान देना होगा। आज हिंदी किसी पर थोपी नहीं जा रही है मगर अनदेखी करना भी उचित नहीं?



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