शब्दों का मौन संबाद
| -RN. Feature Desk - Mar 30 2020 12:20PM

              शब्द जो कि कितनी ही वर्णों, स्वरों और व्यंजनों का मेल होते हैं मिलकर  ही वाक्यों का  निर्माण करते है। शब्दों की स्थूल से सूक्ष्म व्याख्या कर जाते हैं। हमारी नीरवता में हमारे होने का प्रमाण बन जाते हैं। हमें इंसान होने का अस्तित्व दे जाते हैं हैं। सिर्फ यह शब्द ही तो है जो हमें अन्य प्राणियों आदि से अलग करते हैं। हम इन्हीं शब्दों को स्वर देते हैं और संगीत की स्वर लहरियों का आनंद लेते हैं।

               मन के विचारों की अभिव्यक्ति ना जाने कितने ही रूपों में व्यक्त कर जाते हैं। अनंत अनुभूतियों को कलम बंद करके अनंत साहित्य का का सृजन कर जाती है। यह शब्द ही तो है जो हमें संवेदनशील होने का प्रमाण देते हैं। हम कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया किसी भी बात को लेकर शब्दों से ही तो प्रकट करते हैं। हमारे शब्दों से ही सुकून और विद्रोह दोनों के भाव प्रदर्शित होते हैं। हमारी आक्रामकता और कायरता, हमारा स्नेह और वासना आदि। सभी कुछ शब्द ही तो बन जाते हैं किंतु एक अभिव्यक्ति शब्दों की जो कही नहीं जाती, सुनी नहीं जाती, बस महसूस की जाती है।

                                वह है हमारे शब्दों का मौन संवाद जिसे हम धड़कनों में महसूस करते हैं। उसे बांसुरी के छेदों से उन शब्दों को प्रति धवनित कर देते हैं जो कहा तो नहीं किंतु जो भी कहा बहुत ही मधुर सुनाई दिया। वह मौन संवादों की  अभिव्यक्ति जिसे अनुभूति का नाम दिया जाता है उस अव्यक्त अनुभूति को महसूस करने का स्पंदन अपने आप में बड़ा ही रोमांचक होता है। उस खामोशी को कहना कभी मन से, कभी आंखों से, कभी-कभी धड़कन से, तो कभी अनंतता से फिर उसे ऐसे ही महसूस करना। मीलों की दूरी की जहां महत्वहीन हो जाती है। ऐसे बेतार के तार की तरह जुड़ी होती है हमारी चेतना से, आत्मा से, संवेदना से। उस छुअन से से जहां कोई संवाद तो नहीं किंतु उनका गुंजन हर वक्त हमें जीवित रखने की प्रेरणा बन जाती है । हमारे विचारों को ,एहसासों को पवित्र से पवित्र तम बना देती है।

                                प्रकृति का संवाद भी तो मौन होता है हमसे। जब हम खामोशी से उसको सुनते हैं तो नदी ,पहाड़ ,चांद ,सूरज तारे हमसे सभी बातें करने लगते हैं। हमारे सखा सहेली की तरह जो अपने तो नहीं किंतु शाश्वत होते हैं। कितने ही जन्म लेले किंतु यह हमेशा हमारे सच्चे दोस्त बनकर हमारा साथ देते हैं। शब्दों से तो कितने ही रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं किंतु यह संवाद एक बार शुरू हो जाए तो बस एक नशे की भांति हमारी नसों में दौड़ता है। हम चेतन -अचेतन कैसे भी हो हम अपने आप में पूर्णता को महसूस करने लगते है। प्रकृति में  भी यह संबाद सतत चलता है।

                                  नदी का जल से ,पर्वत का हवा से ,भक़्त का भगवान   से होता है और उसे भक्ति  रुप नशे में चूर होकर इस संसार में रहते हुए भी बह बैरागी सा होकर जीवन यापन करने लगता है। सभी उसके नजदीक होते हैं किंतु वह हम सब से दूर होता है। वह उन मौन संवादों की असीम शक्ति में तल्लीन होकर पूर्ण और असीमित आनंद में विचरण करता है जिसके लिए ही तो उसका जन्म हुआ है। यह संसार उसके लिए गौण हो जाता है और धीरे-धीरे वह मौक्ष् अवस्था में जाने का प्रयत्न करने लगता है। कितनी ताकत होती है इन मौन संवादों में। जो भक्तों को भगवान को बना देती है और इंसान अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठता को पा लेता है जहां ना कोई गलती, ना कोई सजा। बस आनंद, आनंद और चिर आनंद....



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