ये कैसा शिक्षा का अधिकार!
| -RN. Feature Desk - Apr 6 2020 2:21PM

-फ़ैज़ मोहम्मद कुरैशी

मेरी लड़की का ‘RTE से प्राइवेट स्कूल में फ्री एडमिशन हो गया, कोई फीस नहीं लगी’, तू भी करवा दे l आरटीई-09 को आम व्यक्ति ऐसे जानता है l और शिक्षा से जुड़े लोग इन लाइनों में आरटीई-09 के बारे में कुछ कहते हैं - आरटीई से सारे बच्चे प्राइवेट स्कूलों में चले गए, सर ये शिक्षा के निजीकरण करने का कानून है, आरटीई जब से आया है तब से शिक्षा का स्तर गिर गया है, अरे आरटीई ने तो सत्यानास कर रखा है; हर किसी को पास करना पड़ता है चाहे उसे कुछ आए या नहीं, जबसे आरटीई आया है तब से बच्चों को मार ही नहीं सकते, इस कारण बच्चे हमारी सुनते ही नहीं, स्कूल खोल लो और आरटीई वाले एडमिशन कर लो - बहुत बचत है, आदि l यह अपने आप में बिरला कानून है जिसके बारे में अपने काम की हमारी समझ 2-3 सालों में ही बन गई और दस साल होते-होते हर वर्ग के तात्कालिक फायदे इससे मिलने लगे l 

आरटीई या शिक्षा का अधिकार कानून क्यों और कैसे बना? इसे समझने के लिए हमें कुछ शब्दों को गौर करना चाहिए जैसे अनपढ़, निरक्षर, गंवार, ढोर, आदि l ये सारे शब्द समाज में तिरस्कार के प्रतीक माने जाते रहे हैं l और ये सभी शब्द उन लोगों के लिए उपयोग किए जाते रहे हैं जो किसी तरह की स्कूल/गुरुकुल वाली शिक्षा के दायरे से बाहर रहे हैं l इन सभी लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है, फिर भले ही उनकी दुनिया के बारे में समझ कितनी ही बेहतर क्यों ना रही हो l दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1910 में अंग्रेज़ी शासन के समक्ष गोपाल कृष्ण गोखले ने पहली बार सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा की वकालत की, 1950 में संविधान में 10 वर्षों का प्रावधान किया गया, 1993 में उन्नीकृष्णन फैसले से इसे मानवीय गरिमा – मौलिक अधिकार (उत्तोत्तर धारा 21 ए) से जोड़ा गया और अंततः 100 वर्षों लम्बी कवायद के बाद 2009 से ये अस्तित्व में आया l सार रूप में शिक्षा मानवीय गरीमा का विषय है और सभी बच्चे स्कूल जाकर अपनी आरंभिक शिक्षा पूर्ण करें; ये उनका अधिकार है l जो RTE द्वारा सुनिश्चित किया जाता है l इस सुनिश्चितीकरण के लिए आरटीई में कई प्रावधान किए गए हैं जिनमें से कुछ को उपरोक्त कथनों में व्यक्त किया गया है l

प्रस्तुत है उपरोक्त कथ्यों के बारे अनुभव और तथ्यों से जुड़ा विश्लेषण –

हम सब अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं जिसके लिए हम शासकीय और निजी किसी भी तरह के ऑप्शन को चुनते हैं l हम किस ऑप्शन को चुनेंगे यह हमारे गुणवत्ता के मानकों पर निर्भर करता है और यह सामाजिक-आर्थिक वर्ग की उंच-नीच पर निर्भर करता है l हमारे समाज में प्राइवेट स्कूल में बच्चे को पढ़ाना स्टेटस सिम्बल तो है ही, साथ ही एक मान्यता भी है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती l यह किसी सीमा तक सच भी हो सकता है, मगर कितना यह अलग प्रश्न है l बहरहाल आरटीई-09 का अध्याय 2 पड़ौस के विद्यालय में किसी भी बच्चे की शिक्षा को सुनिश्चित करने का मार्ग खोलता है, जिसे हम बहुत ही सीमित अर्थों में प्राइवेट स्कूल में एडमिशन से जानते हैं l इस प्रावधान के तहत यह मान्यता रही होगी कि सभी वर्गों के बच्चों के एक साथ पढ़ने से कई तरह की सामाजिक वर्जनाएं टूटेंगी और प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित हो पाएगी l ये वर्जनाएं हैं, भाषा, धर्म, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं की l 

अप्रेल 2011 के बाद से छोटे-बड़े निजी विद्यालयों में मांग कर खाने वाले, घरेलू मज़दूर, काम में मदद करने वाले, दिहाड़ी मज़दुरों, पुताई-वेल्डिंग, सफ़ाई आदि का काम करने वाले परिवारों आदि के बच्चे जा रहे हैं. वर्ष 2011 से 2019 तक मध्यप्रदेश में 3416550 बच्चों ने निजी विद्यालयों में पढ़ने की रूचि ज़ाहिर की है जिसमें से वर्ष 2016 तक शासन ने 2147709 बच्चों के लिए निजी विद्यालयों को भुगतान भी किया है l इस बात के दो जटिल पहलू हैं; पहला यह कि ‘ये बच्चे संभवतः शासकीय विद्यालयों में जा सकते थे जो की नहीं गए और इस वजह से शासकीय विद्यालयों के नामांकन में गिरावट आई l इसके दूसरे पहलू के रूप में यह सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण की ओर एक आत्मघाती कदम भी है जो आंकड़ों में भी परिलक्षित होता है l इस प्रक्रिया के चलते शासकीय शिक्षकों का मनोबल भी लगातार टूट रहा है और यह भ्रम लगातार बढ़ रहा है कि ‘सरकार शासकीय विद्यालयों को बंद करना चाहती है’ l क्योंकि जनमानस में निजी विद्यालयों की यूनिफार्म, गले में लटकती पानी की बोतल, बस से जाना आदि की फेंटेसी भी है, जो उन्हें निजी विद्यालयों की ओर ले जाती है l

प्रत्येक बच्चे के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने याने स्कूल पहुँचाने का यह भागीरथी प्रयास ‘सर्व शिक्षा अभियान (2001)’ से शुरू हुआ और आरटीई-09 ने इसे स्वरुप दियाl बच्चे स्कूल तो पहुँच गए, मगर शिक्षा का क्या ? इसके लिए आरटीई-09 का अध्याय 4 अपनी भूमिका निभाता है l यह बताता है कि विद्यालय में कितने शिक्षक हों, कितने दिवस पढ़ाई तो हो ही, पढ़ाई ही हो या आकलन भी कैसे हो जिससे बच्चों का सीखना सुनिश्चित किया जा सके, आदि l यह अध्याय एक बड़ी विवादास्पद बात को समाहित किए हुए है जिसे हम ‘फेल ना करने की निति’ से जानते हैं l जिससे सम्बंधित कथन आलेख के आरम्भ में उद्घृत किया है l इस सम्बन्ध में आरटीई-09 की कुछ धाराएं ये कहती हैं - स्कूल में भर्ती किसी भी बच्चे को किसी भी कक्षा में रोका नहीं जाएगा, जब तक कि वह प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण न कर ले  (धारा 16) (इसमें वर्ष 2019 में संशोधन करके कक्षा 5 व 8 के लिए नए प्रधान जोड़े हैं)।, धारा 29 (एच) अकादमिक (एकेडमिक) प्राधिकारी सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को सुनिष्चित कराएंगे और यह भी ध्यान रखेंगे कि बच्चे द्वारा अर्जित ज्ञान और उसके व्यवहारिक उपयोग की क्षमता की जांच हो सके।

धारा 30(1) प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने तक किसी भी बच्चे को बोर्ड परीक्षा पास करने की ज़रूरत नहीं होगी (इसमें संशोधन करके कक्षा 5 व 8 के लिए नए प्रधान जोड़े हैं)। इस अध्याय की अनुपालना प्रत्येक बच्चे के शिक्षा के अधिकार को वास्तविक अर्थों में सुनिश्चित करती है l जिन-जिन विद्यालयों में मात्र सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा को ही अपने पूर्ण सन्दर्भों में लागू किया गया हैं वहाँ के छात्रों में हम आशातीत प्रगति देख सकते हैं l विडंबना यह है कि धारा 29 और 30 की गलत व्याख्या ने इस हद तक काम किया कि शिक्षा का अधिकार कानून में बदलाव कर इन धाराओं में संशोधन (जनवरी 2019) करना पड़ा और शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जगह बच्चों को फेल करने की निति विजय होकर पुनः समाज में काबिज हो गई l शिक्षा के इस पूरे उपक्रम में ‘शिक्षक’ की भूमिका सबसे अहम है, जिसे हम पुराने दोहे ‘ गुरु गोबिंद दोऊ खड़े...’ से समझ सकते हैं l शिक्षा का अधिकार क़ानून 2009 की नियमावली के अंतर्गत प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षकों के शैक्षणिक कार्य के लिए कक्षा पहली से पांचवी तक एक शैक्षणिक वर्ष में 800 तथा छटी से आठवीं तक के लिए 1000 घंटे या 220 शैक्षिक कार्यदिवस का प्रावधान है l  यह प्रावधान शिक्षा की गुणवत्ता और गंभीरता को दिखाता है l 

इसके बरअक्स धारा 27 के अनुसार “किसी शिक्षक को दस वर्षीय जनगणना, आपदा राहत कर्तव्यों, या यथास्थिति, स्थानीय प्राधिकारी या राज्य पा राज्य विधान मंडलों या संसद के निर्वाचन से सम्बंधित कर्तव्यों से भिन्न किसी गैर-शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए अभियोजित नहीं किया जाएगा” l व्यवहारिक परिस्थितियों में ये दो विरोधाभासी नियम हैं l उक्त दो नियमों के साथ स्कूलों में शिक्षकों की संख्या के नियम या कानून की बात को समझ लेते हैं l आरटीई प्राथमिक कक्षाओं तक 60 बच्चों पर 2 शिक्षक व माध्यमिक विद्यालयों में प्रति कक्षा 1 (याने कम से कम 3 शिक्षक) शिक्षक के होने की बात करता है l मगर व्यावहारिक परिस्थितियों में वर्तमान में भी मध्यप्रदेश में कक्षा 1 से 8 के लिए 46637 अतिथि शिक्षक अध्यापन कराते हैं, अर्थात विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की कमी है l 

व्यवहार के स्तर पर पिछले वर्षों में तथा वर्तमान तक भी मध्यप्रदेश में शिक्षक किसी एक शिक्षण सत्र में; शिक्षण के साथ या अतिरिक्त तौर पर बूथ लेवल ऑफिसर, विविध सर्वे, पशु गणना आदि में 3 माह से अधिक समय के लिए रहे हैं और कई शिक्षक दंड के पात्र भी हुए हैं l अधिकतर शिक्षकों ने वो सब किया है जो उनसे शिक्षण के अलावा गैर शिक्षकीय रूप में अपेक्षित है, बस वे स्कूल में बच्चों को पढ़ा ही नहीं पाए हैं l अंत में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के वैधानिक प्रावधान व व्यावहारिक परिस्थितियों के विरोधाभास में सबसे अधिक नुकसान 6 से 14 वर्ष के वंचित तबकों के बच्चों का ही हुआ है l जबकि वर्किंग क्लास या मिडिल क्लास से आने वाले बच्चों के लिए अवसर सदैव से ही उपलब्ध थे l कानूनी रूप से देश के सभी वर्गों के बच्चे अपने अधिकार का उपयोग करते हुए सम्मानजनक और समझदार नागरिक बनने की ओर बढ़ रहे हैं, मगर वास्तविक स्थितियों का अंदाज़ा इस छोटे विश्लेषण व स्वयं के विवेक से लगाया जा सकता हैl

फ़ैज़ मोहम्मद कुरैशी 
वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथ शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरतl 



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