मेरा बचपन और मेरे गधे इस लॉकडाउन में
| -RN. Feature Desk - Apr 26 2020 2:26PM

-रामविलास जांगिड़

बहुत पुरानी बात है कि जब मैं बहुत छोटा हुआ करता था। हालांकि बौद्धिक तौर पर अब भी मैं बहुत छोटा ही हूँ, लेकिन जाने क्यों यह बात अब तक किसी को पता नहीं है। छुटपन में मुझे गधों पर बैठने का बहुत शौक था। हालांकि अब भी मुझे गधों पर बैठने का इतना ही शौक है, लेकिन कमबख्त गधे अक्सर मुझ पर सवारी करने में नहीं झिझकते। मैं गधों की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता कि कोई गधा मिले तो उस पर सवारी गांठ लूं। मैंने सुना कि गधा बेचारा भोला-भाला, सीधा-साधा सा घूरे किनारे चीं-पौं,चीं-पौं करता रहता है। मेरे गांव में गधे बहुत थोड़े थे और कुत्ते बहुत ज्यादा थे। जब मैं गधों को ढूंढ़ने निकलता तो मुझे कई सारे कुत्ते दिखाई देने लगते। कालांतर में उनमें से कई कुत्ते एक खास किस्म के चमचे बनकर दिल्ली में सैटल हो गए, तो कुछ गधे भी पीछे नहीं रहे। कुछ कुत्तों ने अपने-अपने मालिक पाल लिए और वे बड़े शान से बंगलों में रहने लग गए। जहां वे उनके मालिक को सुबह-सवेरे सड़क किनारे घुमाने ले जाया करते हैं।

हालांकि यह सब उन कुत्तों की अपनी एक जीवन यात्रा ही है। लेकिन मुझे हमेशा गधों की तलाश ही रहती। कई बार मैं सुबह-सवेरे उठता और देर रात तक गधों की तलाश करता रहता। पहले मैं सोचा करता था कि गधे बिल्कुल बेवकूफ किस्म के होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे मेरी गधों से नजदीकियां होती गई तब मुझे यह विचार बदलना पड़ा। गधे मुझे पहचानने लग गए और मैं गधों को। वे मेरी आवाज से ही मुझे पहचानने लगते। मेरी चाल, चरित्र और चेहरे को देखकर वे मेरे साथ मुस्कुराने लगते। मुझे देखते ही समस्त किस्म के गधे घूरे में लौटने लगते। मुझे पहचान कर स्वागत कथन में चीं-पौं,चीं-पौं का ध्वनि नाद करने लगते। जोशपूर्वक मैं भी उनका साथ देता। तब गधों के साथ मेरा अच्छा खासा संबंध, बल्कि अवैध-सा संबंध स्थापित हो गया।

लॉकडाउन की इस घड़ी में आज भी जब मैं अपने गांव के गधों को की याद करता हूँ तो सहसा आंखों से आंसू आ जाते हैं। क्योंकि इधर के शहरी गधे बहुत हिसाबी- किताबी होते हैं। जब भी मैं इन गधों के करीब जाता हूँ तो वे कान में खौंसी पेंसिल निकालकर मेरे मिलने- मिलाने के लिए गणित लगाने लगते। जब मुझे ये गधे किसी सेमिनार, मीटिंग या सभा समारोह में व्यस्त मिलते तो मुझे मेरे गांव के कालू कुमार के गधे की याद दिल में आग लगा जाती। कालू कुमार का गधा खूंटी से बंधा हुआ संतुष्टि के गीत गाया करता। भूसे में अपनी थूथन जमाए तृप्ति की राग ढेंचूं-ढेंचूं गाते हुए, अपने अदृश्य सीगों को हवा में तैराते, कालू कुमार का गधा मेरा भरपूर स्वागत करता। मेरे पद चाप जब भी कालू कुमार के बाड़े के करीब होते, तो वह सुहानी-मोहिनी राग में ढेंचूं-ढेंचूं का गीत गाने लगता। इससे यह सिद्ध हो गया कि मेरा उस गधे के साथ एकदम जायज सा अंतरंग संबंध था। पहले पहल मुझे लगता कि ये सारे गधे बिल्कुल मूरख हैं। सारे गधे बिल्कुल ही गधे हैं। लेकिन मेरी यह धारणा बदल गई।

मैंने देखा कि गधे बिल्कुल भोले-भाले, सीधे-साधे हैं लेकिन जबरदस्त दार्शनिक व तार्किक भी हैं। बड़े चिंतनशील, विचारवान गधों की कोई कमी नहीं है। सब तर्क कर रहे हैं कि कोरोना मैटर पर चाइना और अमेरिका में युद्ध होता है कि नहीं। कोरोना की वैक्सीन कितने दिनों में आ जाएगी। लॉकडाउन को खोलने के लिए अब कितने तरीके हो सकते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग के क्या पैमाने हो सकते हैं। इन सभी सवालों पर गहन-मनन चिंतन करते गधों के समूहों को जब देखता हूँ तो मन में एक जबरदस्त गधापंथी मच जाती है। मैं स्वयं भी इस गधापंथी में बैठकर बड़ी गधाई किस्म का चिंतन कर रहा हूँ कि लॉकडाउन को अब कितने समय तक जारी रखना चाहिए। जब कि मुझे अब तक न तो लॉक का मतलब पता है और डाउन का ड भी नहीं जानता। बहुत याद आता है, मेरा बचपन और मेरे गधे इस लॉकडाउन में। लगता है कृश्नचंदर का गधा खुल्ला छूट गया है इस लॉकडाउन में।



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