देह और भूख
| -RN. Feature Desk - May 1 2020 12:41PM

-सय्यद शबनम जहाँ

बाहर कोई बीमारी फैली हुई हैं तो पन्नी बीनने नही जा सकती बाहर निकलने का कोई रास्ता नही है उफ्फ ये सड़ाँध मारती झोपड़ी ओर मेरा मर्द उफ्फ l नाक के नथुनों में शराब का भभकाl जी मतली कर रहा हैl पेट मे आग लगी हुई हैl भूख से उबकाई आने लगी, नही भूख से उबकाई नहीं आती ये तो बदबू से आ रही है शायद l नहीं कही महीने तो चढ़ नही गए, सर भन्ना रहा हैl सुनने में आ रहा है अभी और बाहर नही जा सकतेl पसीना बदन पर लकीरें बन कर बह रहा है l मेरा मरद अभी भी आधी झोपड़ी में पड़ा हुआ है l इतनी फुर्सत है अब की अभी अभी ध्यान से उसको देखा, मेले कपड़े, पता नही किस कलर के, शायद धूल केl पेंट की चैन है ही नही, पिन लगा हुआ है, शर्ट पेट के ऊपर है, जो पीठ से छिपका है, गाल पिचके हुए है, बाल बेरंग बड़े है, अभी तो गालो पर भी हलके हल्के बाल है, हाथो में भी शल पड़ गएl

ये ऐसे पड़ा हुआ कितना निरीह प्राणी लग रहा, बेहद कमजोर, लगता ही नही, थोडी भी ताक़त होगी, इसमे पता नही l शायद शराब में ही भेड़िये की ताकत और आत्मा होती है l जबरदस्त ताकत l किसी को भी फाड़ खाने की ताकत, किसी भी शरीर और आत्मा को तहस नहस करने की ताकत l उफ्फ लगता है ये इस ताकत की वजह से ही इन्हें भगवान का दर्जा है l उफ्फ दिमाग मे कैसे कैसे विचार आ रहे है l इस भूख का क्या करूँ, सुना है मदद तो सरकार कर रही है, खूब मदद पर शायद हम इंसान नही है, नही नही ऐसी बात नही है l वो क्या कहते है, राशन कार्ड, पता नही क्या है, पर मेरे पास नही है l मेरे क्या इस बस्ती में किसी के पास नही है, वापस गावँ जाना होगा l पर कैसे, भूख बर्दाश्त के बाहर है, क्या करूँ l हाँ कुछ फ़ोन नंबर पर फ़ोन कर के मंगा लो खाना, फ़ोन तो l शायद बस्ती में है एक दो फ़ोन, पर कौन से नंबर, जाकर देखती हूं बस्ती में l शायद कुछ हो पाए l 

उफ्फ गर्मी, पानी भी उबला हुआ है l दो घूंट पीने के बाद बाहर आई पास के झोपड़ी में जाकर पूछा, अब खाने का क्या होगा, किसे फ़ोन करे l कैसे बीच मे उसने बैठने का इशारा करा l कुछ और पूछती, उसने जबरदस्ती बैठा दिया l दो पूरी पानी से दी खाने को l मैंने भी जल्दी से पानी से बड़े बड़े निवाला गटक लिया l एकदम से सीने में डुचा सा लगा l एक गिलास ओर पानी पी कर सूखी, हलक में सुखी पूरी को नीचे उतारा l पूरी सूखी है, ये बाद में समझ आया l पड़ोसन ने बताया, सुबह चौराहे पर चली जाना कुछ तो मिल ही जायेगा l मन मे ख़ुशी हुई शायद हम इंसान है, एक देह मात्र नही, खुशी का ठिकाना नही था l वापस झोपड़े में आकर फिर एक कोने में बैठकर पूरी का स्वाद दांतो के बीच मे जो हल्के टुकड़े फसे थे, उन्हें जबान से फिरा फिरा कर लेने लगी l पन्नी से बनी दीवार पर सर टिका कर कल का इंतज़ार l पर पड़ोसन के हावभाव में ख़ुशी नही थी l शायद खाना कम होगा l 

इस भेड़िये ने हरकत चालू कर दी है, पेर जमीन पर रगड़ रहा है, उफ्फ ये अब उठेगा l थोड़ी और हरकत l ये दोनों हाथों को सर पर बुरी तरह गुमाते हुए या फेरते हुए; पता नही क्या बोलना चाहिए, पर एक भभके के साथ उठ गया l और यूही झुका हुआ बैठा है, फिर उसने खा जाने वाली आंखों से गुर्राते हुए खाना मांगा l मैं और ज़्यादा सिमट कर बैठ गयी और दोनों हाथों से पूरे सर ओर चेहरे को छुपा लिया l पता था क्या होने वाला है, बोलने से अच्छा है l एक जोरदार लात, अनगिनत गलियां और भेड़िया छलांग लगता हुआ बाहर l रात जंगल मे ही गुज़ार ले, बस ये ही मांगा है l और रात गहरी ओर गहरी होती गयी l आज रात इस डर में कटी; की कहीं वो आ जाय l सुबह इसका इंतेज़ार था, अलसुबह ही चौराहे पर l अरे यहाँ तो लंबी लाइन है दूर दूर, सबसे आखिरी में l अपने आप पर खीज गई l रात में आ गयी होती l पुलिस वाले गालियां देने के साथ दूर रहने का बोलते l दुपहर चढ़ आई l पेट में मरोड़ हो रही है l हलक सूख कर कांटा हो चला है l गाड़ी आई और सब टूट पड़े l पिंजरे से छूटे जानवर हो जैसे l

जो खाना बाट रहे थे, बड़े-बड़े मोबाइल से फ़ोटो ले रहे हैं, उफ्फ अंधेरा जैसे आ रहे हैं l जब तक अंधेरा हटा खाना खत्म ओर भीड़ इतनी l इतने सारे लोगो को कुछ नही मिला l मैं भी अब क्या करूँ l कल तक का इन्तेजार, फिर सोच कर सर फिर भन्ना रहा है l जो फ़ोटो ले रहे थे, उनमें से एक चलकर एक पैकेट लेकर मेरे पास आया l पूछा ठीक है, तू बीमार तो नहीं, सर्दी खासी या कुछ और l मैंने नहीं में सर हिला दिया, उसने पैकेट मेरे पास लाकर, धीरे से पूरा शरीर लगभग मेरे शरीर से सटाते हुए पैकेट हाथ मे देकर हाथ दबाते हुए दिया l और बोला कहाँ रहती है, वही आकर तुझे दे जाएंगे l और एक सेल्फी लेते हुए, गुटके के भभकारे के साथ सारे पीले दांत होटो के बीच मे लेकर हल्का सा हस दिया । मैंने पूरी ताकत से पैकेट उसके हाथ से ले लिया, फिर लंबी दौड़ लाग दी l वैसे, जैसे भेड़ का बच्चा शेर के चुंगल से बच कर भागा हो l धड़ाम से झोपड़ी खोली, तो सामने भेडिया अपने पूरे उन्माद में था l पैकेट निचे गिर गया था और में अब भेड़िये के ......

-सय्यद शबनम जहाँ, (वर्तमान में सैफिया साइंस कॉलेज में कार्यरत), आइवरी फेज 8, D-3, अमीर गंज, ईदगाह हिल्स, भोपाल 



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