भ्रष्टाचार के लिए सुर्खियों में है यूपी की नौकरशाही
| Rainbow News - Jun 14 2017 1:49PM

उत्तर प्रदेश में नौकरशाही इन दिनों कार्य कुशलता के लिए नहीं भ्रष्टाचार के एक के बाद एक उजागर हो रहे सनसनीखेज मामलों की वजह से सुर्खियों में है। पहले किसी आईएएस अधिकारी के भ्रष्टाचार के मामले में जेल पहुंचने की कल्पना तक नहीं की जाती थी लेकिन हाल के वर्षों में स्व. अखंड प्रताप सिंह, नीरा यादव, प्रदीप शुक्ला, राजीव कुमार जैसे कई आईएएस अफसर प्रदेश में एक के बाद एक जेल पहुंचे। ये सारे दिग्गज अफसर थे। जब इनका सिलेक्शन हुआ था तो ये अफसर अपने बैच के टॉपर थे। इसलिए अनुमान यह था कि ऐसे अफसरों के जेल जाने से आईएएस संवर्ग के अन्य सभी अफसरों में खौफ पैदा होगा। आईएएस संवर्ग प्रशासनिक क्षेत्र में अपने आपमें ब्रांड सेवा है, जिसके दैदीप्यमान गौरव से बढ़कर कोई पूंजी इस सेवा में शामिल होने वाले अधिकारियों के लिए नहीं हो सकती। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऊपर गिनाये गये नामी अफसरों के हश्र को देखने के बावजूद इस सेवा के अधिकारियों में अपने संवर्ग की प्रतिष्ठा और गरिमा की बेशकीमती पूंजी को बचाने की कोई चिंता नजर नहीं आ रही है।

गत 24 मई को आयकर विभाग ने तीन आईएएस अफसरों के लखनऊ सहित आधा दर्जन शहरों के करीब डेढ़ दर्जन ठिकानों पर छापेमारी की जिसमें इनकी करोड़ों की बेनामी संपत्ति के कागजात और नकदी मिली। इनमें तत्कालीन विशेष सचिव कारागार सतेंद्र कुमार सिंह, स्वास्थ्य निदेशक हृदय शंकर तिवारी और ग्रेटर नोएडा के अपर सीईओ विमल कुमार शर्मा शामिल थे। कार्रवाई के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इनसे महत्वपूर्ण विभाग छीनकर तीनों को लूप लाइन में डाल दिया लेकिन इनके खिलाफ अन्य कोई कार्रवाई अभी तक नहीं की गई है। हालांकि खबर यह है कि आयकर विभाग ने अभी तक सतेंद्र कुमार सिंह के यहां हुई बरामदगी की ही रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को भेजी है, जिस पर उऩसे स्पष्टीकरण मांगने का कदम उठाया जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार अपने भ्रष्ट अफसरों की कुंडली जानने के लिए क्या आयकर अधिकारियों के ही आश्रित है।

विमल कुमार शर्मा की पत्नी ममता शर्मा मेरठ में आरटीओ थीं। छापे में उनके नाम से भी बेनामी संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए। शर्मा दंपत्ति के एक नौकर के यहां से भी 25 लाख रुपये मिले थे। इसके अलावा यह जानकारी भी गौरतलब है कि आयकर के छापे के 2 हफ्ते पहले एंटी करप्शन की टीम ने विमल कुमार शर्मा के ठिकानों पर जांच की थी। इसलिए आयकर विभाग को परवर्ती कार्रवाई में उनके यहां से बड़ी मात्रा में नकदी की आशा वैसे भी नहीं रखनी चाहिए थी, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार की नजरें विमल कुमार शर्मा के खिलाफ एंटी करप्शन टीम से जांच करवाने के बावजूद क्यों इनायत बनी रहीं, यह एक यक्षप्रश्न है। विमल कुमार शर्मा की पत्नी ममता शर्मा के भ्रष्टाचार की कई गुमनाम शिकायतें पहले से विचाराधीन होने की बात उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारी मानते हैं। इसके बाद आयकर विभाग के छापे में जो भी मिला उससे उनकी संलिप्तता और बढ़ जानी चाहिए थी। लेकिन इन छापों के बाद उनके विभाग के आयुक्त के. रवींद्रन ने जो बयान दिया उसमें ममता शर्मा के प्रति उनका सॉफ्टकॉर्नर छिपा नहीं रह सका। रवींद्रन बोले कि ममता शर्मा ने अपनी संपत्ति का  ब्यौरा पहले से उपलब्ध करा रखा था। जिसको जरूरत पड़ने पर आयकर विभाग के सुपुर्द किया जाएगा। यानी ममता शर्मा बेदाग हैं और उनकी जो भी संपत्ति है सब लिखा-पढ़ी में है।

ममता शर्मा के बचाव के लिए परिवहन आयुक्त की दरोगाई अंदाज की इस पेशबंदी के बावजूद चंदौली के सहायक संभागीय परिवहन आयुक्त आरएस यादव के भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सामने उनके खिलाफ भी कार्रवाई को आगे बढ़ाने की बाध्यता पैदा हो गई इसलिए अब ताजा बयान में उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने चौकड़ी भूलकर यह संकेत देना शुरू कर दिया है कि ममता शर्मा और कानपुर की पूर्व एआरटीओ सुनीता वर्मा पर आरएस यादव की तरह ही कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। अब कहा जा रहा है कि ममता शर्मा के खिलाफ नियमित एफआईआर दर्ज कर ईडी को उनका मामला सौंपा जाएगा।

सीएम योगी आदित्यनाथ की ईमानदारी और सादगी अभी भी संदेह से परे है। लेकिन उनके राज मेें भी स्वच्छ प्रशासन के लिए तड़प नहीं दिखाई देती तो फिर नौकरशाही के भ्रष्टाचार में सुधार कब होगा, यह भावना लोगों को घनघोर निराशा से घेरने लगी है। योगी जब सीएम नहीं थे और सांप्रदायिक मामलों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ तेजाबी भाषण करते थे, उस समय लोगों के मन में यह धारणा बन गई थी कि हठीले योगी को अगर उत्तर प्रदेश का राजपाट मिल गया तो अच्छे अच्छों की अक्ल दुरुस्त हो जाएगी। लेकिन योगी कसौटी पर चढ़ने के बाद बहुत पिलपिले साबित हो रहे हैं। पेट्रोल पंप मालिकों की घटतौली के मामले में उनकी सरकार ने जिस तरह घुटने टेके उस पर हाईकोर्ट आगबबूला हुए बिना नहीं रह सका। इस बेइज्जती के बावजूद योगी ताव खाने को तैयार नहीं। जबकि भ्रष्टाचार के मामले में अगर वे कठोर होते हैं तो यह तामसी नहीं सात्विक क्रोध माना जाएगा। अधिकांश आईएएस अधिकारियों ने उनके पिलपिलेपन को भांपकर ही अपनी संपत्ति का ब्यौरा नहीं दिया है और योगी के फरमान की सीधी अवज्ञा पर वे लालटेन होने की बजाय बोलती बंद होने की मुद्रा में हैं। जिससे बेनामी संपत्ति बटोरने वाले अधिकारियों को अभयदान मिल गया है।

प्रमुख सचिव वन संजीव सरन के खिलाफ आईएफएस संवर्ग के एक अधिकारी ने भ्रष्टाचार के बहुत संगीन आरोप लगाये तो वन मंत्री ने उऩकी क्लास जरूर ली लेकिन उनका विभाग छीने जाने तक की नौबत नहीं आयी है। इस बीच गिरफ्तार हुए एआरटीओ आरएस यादव ने भी परिवहन विभाग में लूट की कमाई में तीन आईएएस अधिकारियों का नाम उनकी पूरी सहभागिता के लिए लिया है। लेकिन आईएएस संवर्ग में चरमसीमा पर व्याप्त हो चुके सड़ांध को प्रकट करने वाले इन किस्सों के बावजूद सरकार के कानों पर कोई खास जूं रेंगती नहीं दिख रही। बीजेपी सबसे ज्यादा रेडिकल चेंज के नाम से बिदकती है, ठीक है आप वर्ण व्यवस्था और सामंतवादी, पूंजीवादी ढांचे के संदर्भ में रेडिकल आह्वान से एतराज रखें लेकिन कम से कम भ्रष्टाचार के मामले में तो आपका रुख रेडिकल होना चाहिए था। क्योंकि भाजपा के केंद्रीय से लेकर प्रदेश स्तर तक के नेता कांग्रेस के 70 वर्ष के शासन में भ्रष्टाचार की वजह से हुई देश की बर्बादी के खिलाफ दहाड़ते समय कोई कसर नहीं छोड़ते। फिर भ्रष्ट व्यवस्था के संदर्भ में भी यथास्थिति को बचाने का रुख क्यों। क्या भाजपा के नेताओं को हर मामले में सनातनी हो जाने की बीमारी लग गई है।

आईएएस सेवा अब एक ऐसे वर्ग के रूप में पहचान बना चुकी है जो विदेशियों की तरह औपनिवेशिक मानसिकता के तहत काम करती है। इस बीच कई सुझाव आये जिनमें आईएएस संवर्ग खत्म कर नये प्रशासनिक सेट-अप का खाका खींचा गया है। केंद्र और राज्य सरकार हददर्जे की अकर्मण्यता के कारण किसी भी क्षेत्र में नवीकरण की ओर अग्रसर नहीं होना चाहती जो बहुत बड़ा अभिशाप बन चुका है। अगर आईएएस संवर्ग का विकल्प लाया जाता है तो वर्गीय गिरोहबंदी के कारण लाभ उठाने वाले भ्रष्ट अफसर काफी हद तक निरस्त हो जाएंगे और इससे व्यवस्था बदलने में बहुत सहूलियत मिलेगी। सरकार में बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि अगर आईएएस अधिकारी सुधर जाएं तो प्रशासन अपने आप काफी हद तक जवाबदेह हो जाएगा। क्योंकि बाकी सभी विभागों की नकेल इस संवर्ग के अधिकारियों की मुट्ठी में है जो छोटे मियां तो छोटे मियां बड़े मियां सुभानअल्लाह की कहावत को प्रशासनिक अराजकता के मामले में चरितार्थ कर रहे हैं। इस संवर्ग की कल्पना सुशासन के लौहकवच के रूप में की गई थी लेकिन आज इन्होंने शासन व्यवस्था में घुन का रूप ले लिया है। पहले आईएएस अधिकारी कम से कम 10-12 वर्षों तक जब कि वे छोटे जिलों में कलक्टर तैनात होते थे, पूरी तरह ईमानदार बने रहते थे लेकिन अब दूसरे संवर्ग के अधिकारी करें तो करें, आईएएस अधिकारी भी प्रोवेशन के समय से ही कमाने का फंडा जानने में लग जाते हैं। यह भयानक स्थिति है। जरूरत से ज्यादा संपत्ति एकत्र करने के बाद महंगी फीस वाले पब्लिक स्कूल चलाने से लेकर सरकारी विभागों में अरबों की सप्लाई और एनजीओ खड़ा करने का धंधा, यह लोग शुरू कर देत हैं, जिनका काम करने का तरीका सइयां भये कोतवाल अब डर काहे का जैसे अंदाज का होता है।

आज व्यापारी व्यापार नहीं कर रहे। सारा व्यापार अधिकारियों और नेताओं ने अपनी मुट्ठी में कर रखा है जिससे कानून के राज पर हथौड़ा दर हथौड़ा चलाने की श्रंखला निर्मित हो गई है। मायावती ने अपने एक कार्यकाल में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पुलिस की तमाम विंग एंटी करप्शन, ईओडब्लू व सतर्कता को एक सूत्र में व्यवस्थित करके एक स्वतंत्र तंत्र के निर्माण की कोशिश की थी लेकिन बाद में वे आईएएस अधिकारियों के बहकाने से ही इस कदम को वपस खींच बैठीं। योगी सरकार को अच्छी चीजों के मामले में विरोध के लोगों के प्रयासों से परहेज नहीं करना चाहिए। यह सरकार मायावती द्वारा छोड़े गये उक्त प्रयास को अपनाकर भ्रष्टाचार पर रोक के लिए सार्थक कोशिश कर सकती है। गुणवत्तापूर्ण प्रशासन समाज की बढ़ती जागरूकता के कारण आवश्यक है, जिसको देखते हुए शीर्ष संवर्ग के अधिकारियों के भ्रष्टाचार को लेकर योगी सरकार को दो टूक रुख दिखना पड़ेगा।

-के.पी. सिंह, उरई- जालौन (उ.प्र.)



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