माँ और सभी मातृशक्तियों को सादर नमन
| -RN. Feature Desk - May 10 2020 6:00PM

माँ और मौसियाँ

-सूरज गुप्ता

देशकाल की परम्परानुसार हमें अम्बेडकरनगर जनपद के प्रमुख युवा समाजसेवी (संस्थापक-संकल्प मानव सेवा संस्था) सूरज कुमार उर्फ बन्टी गुप्ता ने कुछ छाया-चित्र और एक मर्मस्पर्शी आलेख भेजकर हर माँ को नमन किया है, उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उसका हम यहाँ हुबहू प्रकाशन कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में सूरज गुप्ता से जब बात हुई उन्होंने कहा कि वह किसी भी आडम्बर अथवा ढोंग के तहत माँ को याद नहीं कर रहे हैं। क्योंकि माँ इस तरह के किसी भी दिन-दिवस की मोहताज नहीं होती। माँ के ऋण बोझ को उतार पाना सन्तान के लिए असम्भव है। 

माँ- माता, जननी, देवकी-यशोदा-पन्ना धाय। माँ के बारे में मीडिया ने इतना सब कुछ लिखा जाता है कि......पूछा न जाये। माँ की परिभाषा, माँ का गुणगान यह सब करना कितना उचित है इस पर कुछ भी नहीं कहना है। हम तो जानते हैं कि माँ किसी दिन, दिवस विशेष की मोहताज नहीं। यदि माँ न होती तो हम ही न होते। माँ का गुण-दोष इसके बारे में सोचना, लिखना, पढ़ना किसी की बौद्धिक क्षमता में नहीं। हम माँ की सन्तान हैं, हम कपूत हो सकते हैं परन्तु माँ कुमाता नहीं। इसीलिए तो हम कहते हैं कि- ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी’’। हमारी नजर में माँ हमें पैदा करती है और हमारा पालन-पोषण करती है।

हम मदर्स डे के हामी नहीं हैं। यह विशुद्ध रूप से फिरंगी संस्कृति की देन है। फिरंगियों के लिए माँ का महत्व मात्र एक दिन वह भी कुछेक घण्टे के लिए हो सकता है। हमारे लिए तो माँ सब कुछ है। माँ से वात्सल्य पाना, उससे झगड़ना, अपनी मांग रखना यह हमारी प्रतिदिन की दिनचर्या होती है। हमारा माँ-बाप, भाई, बन्धु एवं अन्य परिजनों से युक्त परिवार, समाज हमारे लिए ब्रम्हाण्ड सदृश्य है जिसके हर सदस्य में हम माँ की छवि देखते हैं, माँ की छवि खोजते हैं, पाते हैं और तदनुसार हर स्त्री को रिश्ते में बांधते हैं। विश्व की समस्त माताओं का सम्मान करने वालों को हम सलाम करते हैं। 

नानी और बुआ माँ

माँ किसी के सम्मान की मोहताज नहीं। माँ स्वयं सम्मान है। हमारे ग्रन्थों, महाग्रन्थों में वर्णन किया गया है कि- माँ की सेवा से मिला आशीर्वाद सात जन्म के पापों को नष्ट करता है। यही माँ शब्द की महिमा है। सर्वविदित है कि माँ बच्चे की पहली गुरू होती है जो आधा संस्कार उसे गर्भ में ही दे देती है और जन्म देने के बाद भी बच्चे को बहुत कुछ देती है। इसीलिए माँ को सनातन धर्म में भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया गया है। माँ शब्द एक ऐसा शब्द है जिसमें समस्त संसार का बोध होता है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर दुःख-दर्द का अन्त हो जाता है।

माँ की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता है। बावजूद इसके इस आलेख के माध्यम से माँ और उसकी प्रतिमूर्ति, छवि वाले समस्त माताओं को नमन करते हैं। हमें माँ की माँ जो मेरी नानी है बरबस याद आ रही है। यही नहीं माँ शब्द जैसे ही जेहन में उभरता है उसी क्रम में माँ के समान प्यार, दुलार, वात्सल्य देेन वाली बुआ माँ की याद आती है। याद के क्रम में माँ की तरह व्यवहार करने वाली सभी मासियाँ यानि मौसियों मेरे स्मृति पटल पर अपनी मातृत्व छवि लेकर प्रकट होने लगती हैं। 

माँ- तू धन्य है। माँ शब्द ही महान है। माँ जैसे ही आज तू याद आने लगी, तेरे साथ ही मुझे मेरी नानी श्रीमती श्यामा देवी जो तेरी माँ है यानि मेरे माँ की माँ वह और बुआ श्रीमती चम्पा देवी जो तेरी ननद हैं, श्रीमती फूला देवी, गीता देवी, अनीता देवी सभी मेरी मौसियाँ मेरे स्मृति पटल पर अपने-अपने वात्सल्य की छाया में नृत्य करती नजर आने लगीं और मैं इन माताओं को वात्सल्य नृत्य के आनन्द में डूबा हुआ अपने जीवन के अतीत में जाकर एक नन्हा शिशु बन गया। हे माँ मैं तेरा पुत्र, तूँ मेरी जननी..... हे माँ सुमित्रा देवी तुम महान हो। तुम्हें बार-बार शत-सहस्त्र एवं अनेकों बार नमन। तुम्हारा, तुम सबका- सूरज। 



Browse By Tags



Other News