विद्युत विभाग मनमाना बिल भेजकर उपभोक्ताओं का करता है शोषण
| Rainbow News - Jun 14 2017 3:33PM

बिज़ली विभाग की कार्यप्रणाली हर किसी की समझ से परे ही है। बिज़ली विभाग के विद्युत देयकों को पढ़ पाना अपने आप में टेढ़ी खीर ही साबित होता है। पच्चीस तरह के सरचार्ज़ लगाकर बिल तैयार होते हैं। अधिभार इतने सारे हैं कि उपभोक्ता पढ़ते-पढ़ते ही थक जाये। उपभोक्ताओं को किस दर से बिज़ली दी जा रही है, यह बात भी शोध का ही विषय है। उपभोक्ताओं को बिज़ली की प्रति यूनिट दर और अधिभार के साथ दरों में भारी अंतर मालूम होता है। जब बिज़ली का बिल अधिक आता है तो बिज़ली विभाग के अभियंताआ द्वारा देयक में गोला लगाकर उसे कम कर अदा करने की सुविधा प्रदान कर दी जाती है।

मज़े की बात तो यह है कि जब अगले बिल आते हैं तो उसमें पहले कम की गयी राशि का अपने आप समावेश कर लिया जाता है। यह बात आम उपभोक्ता आसानी से समझ नहीं पाता है। वह अपनी व्यस्त दिनचर्या से बार-बार समय निकालकर बिज़ली कार्यालय के चक्कर लगाने से बचने के चलते ज्यादा आये देयकों का भुगतान भी कर देता है। देखा जाये तो उपभोक्ताओं की दोहरी मरण सामने आती है। एक तो वह बिज़ली का निर्धारित से अधिक बिल अदा करता है और ऊपर से अघोषित बिज़ली की कटौती का उसे सामना करना पड़ता है। बारिश का मौसम आने को है। बारिश मेें जरा सा पानी गिरने, आंधी तूफान आने से घंटों बिज़ली बाधित रहती है।

पता नहीं मई जून माह में बिज़ली विभाग, बारिश पूर्व का रखरखाव किस तरह करता है कि बारिश के मौसम में अक्सर ही बिज़ली गोल हो जाया करती है। उपभोक्ताओं के मत्थे एक और सिरदर्द है। अपने घरों या प्रतिष्ठान में अघोषित बिजली कटौती से बचने उन्हें इन्वर्टर भी लगाने होते हैं। इन्वर्टर की संस्थापना पर पंद्रह से पच्चीस हज़ार रूपये की चपत उपभोक्ता पर पड़ती है। इतना ही नहीं हर दो साल में बारह से पंद्रह हज़ार रूपये की बैटरी उसे बदलना होता है सो अलग। जिनकी क्षमता के बाहर इन्वर्टर होते हैं उन्हें अघोषित बिज़ली कटौती के समय में अपने उपकरणों के खराब होने का भय सताता रहता है।

 



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